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'जब मेरे मां-बाप ने दंगाइयों से एक सिख जोड़े की जान बचाई'

इस लड़की की फेसबुक पोस्ट वायरल हो रही है. आप भी पढ़ें. शायद रीढ़ की हड्डी दुरुस्त हो जाए.

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1984 के सिख विरोधी दंगे

31 अक्टूबर की सुबह इंदिरा गांधी को उनके सिख गार्ड्स ने गोली मार दी. इसके कुछ घंटे बाद ही दिल्ली से शुरू हुए सिख-विरोधी दंगों ने पूरे उत्तर भारत को अपनी जद में ले लिया. इस दौरान एक सिख जोड़ा बिहार से दिल्ली का सफ़र तय कर रहा था. इस बात से अनजान कि पटरियों से सटी सड़कों पर एक हत्यारी भीड़ घूम रही है. बनारस से कुछ दूर उनकी रेल को दंगाइयों ने घेर लिया. इसके बाद जो हुआ, वो Sam Ish
ने अपने पिता के बताए हुए संस्मरण के तौर पर फेसबुक पर साझा किया. हम सबको इसे पढ़ना चाहिए.



पहली नवंबर 1984, मेरे माता-पिता रेल से मुगलसराय से दिल्ली तक का सफ़र कर रहे थे. इधर इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देशभर में बड़े पैमाने पर दंगे शुरू हो गए थे. सफ़र में होने की वजह से उन तक इस बात की खबर नहीं पहुंच पाई. उन्हें इस बात का अंदाजा था कि दिल्ली में कुछ तनाव जैसी स्थिति बनी हुई है.

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रेल के उस डिब्बे में मेरे पेरेंट्स के अलावा एक और जवान जोड़ा था. ये मेरे पेरेंट्स की शादी की पहली सालगिरह थी. वहीं उनके साथ मौजूद सिख जोड़े की शादी हुए मुश्किल से एक महीना भी नहीं हुआ था. सिख जोड़ा काफी डरा हुआ था.

बनारस गुजरने के कुछ देर बाद ही गाड़ी रोक दी गई. बलवाइयों की एक भीड़ डिब्बा-दर-डिब्बा घुसकर सिखों की तलाश कर रही थी. आज के दौर में मुसलामानों की तरह उस समय सिख अचानक से दुश्मन बन गए थे.

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इंदिरा गांधी की अंतिम विदाई
इंदिरा गांधी की अंतिम विदाई

सरदार की पत्नी की आंखों में आंसू आ गए, लेकिन 1984 का भारत 2017 के भारत जितना कमजोर नहीं था. डिब्बे में मौजूद हर आदमी हरकत में आ गया. लोगों ने कम्पार्टमेंट के दरवाजे बंद कर दिए. सरदार की बीवी बहुत डर गई थी. ऐसे में एक बूढ़ी मुस्लिम महिला आई. इससे पहले शायद ही कभी उस बूढ़ी महिला ने सार्वजनिक जगहों पर अपना बुरका हटाया हो.


उसने सिख औरत को अपना बुरका पहना दिया. सिख मर्द अपनी धार्मिक मान्यता के चलते बाल और दाढ़ी बढ़ाकर रखते हैं. इन्हें भी काटा जाना जरूरी हो गया था और इसे तेजी से किया जाना था. डिब्बे में से ही किसी आदमी ने कैंची निकालकर दी. ये वो दृश्य था, जिसे मेरे पिता अपने जीवन में कभी भूल नहीं पाए.

उस सिख युवक ने अपनी पगड़ी उतारी और अपने बाल काटने शुरू किए. बाल, जो उसकी पहचान से जुड़े हुए थे. उसके हाथ बुरी तरह कांपने लगे. ऐसा लगा, मानो वो जम गया हो. इसके बाद मेरे पिता और एक दूसरे सहयात्री ने बाल काटने में उसकी मदद की. फिर उसकी दाढ़ी काटी गई. इस दौरान उसकी सूरत पत्थर जैसी निर्जीव हो गई थी. बस आंखो से गिर रहे आंसू ये गवाही दे रहे थे कि उसमें जान बाकी है.

मेरी मां और बुरका देने वाली बूढ़ी मुस्लिम महिला उस सिख औरत के पास जाकर बैठ गईं. उनके आस-पास और भी आदमी इकट्ठा हो गए. सिख नौजवान को टॉप बर्थ पर बिठा दिया गया.

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जब दंगाई उनके डिब्बे में घुसे, कुछ यात्री आगे बढ़कर उन तक पहुंच गए. उन्होंने दंगाइयों से बहस करना शुरू कर दिया. बहस के दौरान कई यात्री ये कहते भी सुने गए कि अगर कोई सिख इस डिब्बे में होता, तो वो खुद उसे मार डालते. ये बहस तब तक चलती रही, जब तक दंगाई उकताकर डिब्बा छोड़कर नहीं चले गए.

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उस दौरान किसी ने भी... डिब्बे में मौजूद किसी भी आदमी ने अपनी बात या हरकत से दंगाइयों के सामने ये जाहिर नहीं होने दिया कि एक सिख जोड़ा इसी डिब्बे में मौजूद है. लेकिन ये तब की बात है. अब चीजें बदल गई हैं. 1984 से 2014 के बीच भारत के लोग अपनी रीढ़ की हड्डी खो चुके हैं.

अब लोग दंगाइयों के सामने नतमस्तक हो चुके हैं. वो किसी भी मुसलमान को मारने लिए तैयार हैं. वो किसी मुस्लिम बच्चे के बलात्कार को सही ठहरा सकते हैं. कश्मीर और छत्तीसगढ़ में भारतीय नागरिकों के खिलाफ चल रहे दमन पर तालियां बजा सकते हैं. यहां तक कि अपने भगवा आका के कहने पर वो किसी भी बड़े पेड़ को धराशायी कर सकते हैं. इस तरह के बद्दिमाग और रीढ़हीन आदमियों को देखकर दिल टूट जाता है.



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