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इन पांच वजहों से सीएम की रेस में सिद्धारमैया को पछाड़ सकते हैं डीके शिवकुमार

जातीय समीकरण और लोकप्रियता के मामले में सिद्धारमैया आगे हैं, लेकिन संगठन को मजबूत करने और चुनाव में पार्टी को जीत दिलाने का बड़ा श्रेय डीके शिवकुमार को जाता है.

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मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया की रस्साकशी. (फाइल फोटो: इंडिया टुडे)

कर्नाटक विधानसभा (Karnataka assembly election 2023) का फैसला 13 मई की शाम हो गया था. लेकिन मुख्यमंत्री के नाम का फैसला अभी तक नहीं हो पाया है. सीएम की दौड़ में पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार सबसे आगे हैं. 14 मई को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने तीन पर्यवेक्षकों (महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री सुशील कुमार शिंदे, कांग्रेस के पूर्व महासचिव दीपक बावरिया और वर्तमान महासचिव भंवर जितेंद्र सिंह) की टीम बनाई थी. इस टीम ने विधायकों से उनका मन जाना था. मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक विधायक दल की बैठक में सिद्धारमैया के पास डीके शिवकुमार के मुक़ाबले दुगुना समर्थन है. इसके बावजूद शिवकुमार अपनी दावेदारी में दमदारी की कमी नहीं कर रहे.

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मल्लिकार्जुन खरगे के साथ शिवकुमार. (तस्वीर- इंडिया टुडे)

शिवकुमार ने दिल्ली के लिए रवाना होते हुए दावा किया था कि कांग्रेस आलाकमान उनके साथ है. उनके पास सभी 135 विधायकों का समर्थन हैं. हालांकि शिवकुमार ने सिद्धारमैया से मतभेद ना होने की बात भी कही थी. लेकिन ये भी कहा था कि ना तो वो विश्वासघात करेंगे और ना ही ब्लैकमेल. डीके शिवकुमार ने कांग्रेस के लिए अपने काम और बलिदान का जिक्र करते हुए, कर्नाटक की जीत में अपनी भूमिका की बात भी की थी. एक बयान में शिवकुमार कह चुके हैं कि उनके पास साहस है और जिसके पास साहस होता है वो अकेला आदमी भी अपने आप में बहुमत होता है.

कुल मिलाकर डीके शिवकुमार के दावे ठोस हैं. उनकी जड़ें मजबूत हैं. और उनकी दावेदारी में दम है. कांग्रेस आलाकमान फैसला लेने में पूरी सर्तकता बरतना और पूरा समय लेना चाहती है. हम आपको बताएंगे वो पांच बड़ी वजहें जिनके चलते डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री के पद पर दावा कर रहे हैं. 

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पहली वजह: वफादार कांग्रेसी

डीके शिवकुमार कांग्रेस के वफ़ादार नेता रहे हैं. उन्होंने शुरू से ही कांग्रेस की राजनीति की है और कभी किसी और राजनीतिक दल की तरफ नहीं देखा. साल 1989 में उन्होंने पहला चुनाव जीता था. इस बार आठवीं बार कनकपुरा सीट से जीत दर्ज़ कर चुके हैं. वो कभी कोई चुनाव नहीं हारे हैं. उनको कांग्रेस का संकटमोचन कहा जाता है. शिवकुमार तेजतर्रार राजनीति और आक्रामक रणनीति के लिए जाने जाते हैं. अपनी राजनीतिक शैली के चलते उन्हें 'कांग्रेस का अमित शाह' कहा जाता है. वहीं सिद्धारमैया जनता पार्टी, जनता दल और जनता दल सेक्युलर से होते कांग्रेस में आए हैं.

दूसरी वजह: कांग्रेस संगठन पर मजबूत पकड़

विधायक दल की बैठक में भले ही सिद्धारमैया को समर्थन की बात कही जा रही हो, पर कांग्रेस संगठन में शिवकुमार की बेहतर पकड़ है. डीके शिवकुमार छात्र राजनीति से आए हैं. उनका संपर्क संगठन में नीचे तक के कार्यकर्ताओं तक है. कांग्रेस संगठन डीके शिवकुमार की पैरवी कर रहा है. कहा जा रहा कि सिद्धारमैया की उम्र हो गई है और वो इस चुनाव के बाद संन्यास लेने की बात पहले ही कह चुके हैं. ऐसे में कांग्रेस को अगले चुनाव में इसका घाटा होगा, जब कांग्रेस को अपने सिटिंग सीएम के बगैर चुनाव लड़ना पड़ेगा. शिवकुमार की अपने प्रदेश के युवाओं में भी अच्छी पकड़ है.

तीसरी वजह: मजबूत जातीय आधार

डीके शिवकुमार वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं. लिंगायतों के बाद ये समुदाय संख्या के लिहाज से दूसरे पायदान पर आता है. सियासी हैसियत के हिसाब से कर्नाटक विधानसभा की 50 सीटों पर ये समुदाय निर्णायक भूमिका में है. वोक्कालिगा समुदाय एचडी देवगौड़ा की वजह से जनता दल (सेक्युलर) (JDS) का परंपरागत वोटर माना जाता है. डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाकर वोक्कालिगा वोटों की जुटान की जा सकती है और JD(S) के गढ़ ओल्ड मैसूर में पकड़ मजबूत की जा सकती है. इस फैसले का फायदा 2024 के आगामी लोकसभा चुनाव में भी मिल सकता है.

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चौथी वजह: संसाधनों को जुटाने और संकट से निपटने में माहिर

जिस वजह से डीके शिवकुमार को बीजेपी निशाने पर लेती है और आलोचना करती है वही उनकी ताकत भी है. डीके शिवकुमार कर्नाटक के सबसे अमीर विधायक हैं. पार्टी के लिए संसाधन जुटाने में माहिर हैं. प्रदेश के भीतर और बाहर भी संपन्न और संसाधन वाले लोगों से उनके संपर्क हैं. उनकी रणनीति एक कदम आगे बढ़ कर राजनीति करने की रही है. इस बार उनके नेतृत्व में ही कांग्रेस ने शुरुआत से ही आक्रामक राजनीति की थी. इसके मानवीय और आर्थिक संसाधन जुटाने की जिम्मेदारी डीके शिवकुमार ने ही निभाई थी. विधायकों की तोड़-फोड़ से निपटने से लेकर किसी कांग्रेस शासित राज्य में राजनीतिक संकट की घड़ी में पार्टी विधायकों को राज्य में रखने तक का इंतजाम करने में डीके शिवकुमार आगे रहे हैं.

पांचवी वजह: आलाकमान की पसंद

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधायक दल में ‘60-40’ (60 प्रतिशत सिद्धारमैया और 40 प्रतिशत शिवकुमार) की स्थिति है. लेकिन डीके शिवकुमार को इस 60 प्रतिशत की कमी को पूरा करने के लिए कांग्रेस आलाकमान पर भरोसा है. सूत्रों की मानें तो कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी और सोनिया गांधी की पसंद डीके शिवकुमार हैं.

गांधी परिवार डीके शिवकुमार पर विश्वास करता है. (तस्वीर- इंडिया टुडे)

2018 में प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाए जाने के बाद से शिवकुमार ने पूरी ताकत झोंक दी थी. वो गांधी परिवार के भरोसेमंद हैं. सोनिया गांधी खुद उनसे मिलने जेल पहुंची थीं. चुनाव जीतने के बाद शिवकुमार ने दावा किया था कि उन्होंने सोनिया गांधी को वचन दिया था कि वो कर्नाटक का किला जीतकर उन्हें सौंपेंगे. राहुल गांधी भी शिवकुमार को पसंद करते हैं. भारत जोड़ो यात्रा में भी कर्नाटक में शिवकुमार ने प्रभावी प्रबंधन किया था. 

2019 में कांग्रेस में विधायकों की तोड़-फोड़ के बाद मुश्किल समय में जमीनी लीडरशिप तैयार करने, कार्यकर्ताओं को ऊर्जा देने और लक्ष्य बनाकर काम करने के अपने हुनर से डीके शिवकुमार ने आलाकमान का भरोसा जीता है. इसी भरोसे के बल पर बार-बार वो कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व, मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी और सोनिया गांधी के ऊपर फैसला छोड़ रहे हैं. 

वहीं सिद्धारमैया के पास विधायकों का समर्थन तो है पर वो आलाकमान की पहली पसंद नहीं माने जा रहे, इसीलिए कांग्रेस कोई बीच का रास्ता निकालना चाहती है. और अगर सहमति बन गई तो क्या पता शिवकुमार ही मुख्यमंत्री बन जाएं.

ये स्टोरी हमारे साथी अनुराग अनंत ने की है.

वीडियो: कर्नाटक CM को लेकर सस्पेंस , डीके शिवकुमार ने दिल्ली जाने से पहले सोनिया गांधी के लिए क्या कहा

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