The Lallantop

वो औरत जिसे मुहब्बत के मारों का मसीहा कहा जाता था

ज़िन्दगी तो बेवफा है, एक दिन ठुकराएगी.

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फोटो - thelallantop
सिकंदर. जिसका असली नाम क्या था, नहीं मालूम. मालूम है तो इतना कि उसे एक फ़ातिमा ने पाला था. गोद लेकर. और ये सिकंदर आज जब सबसे दूर अकेले रहना चाहता है तो उसे प्यारे लाल लेकर जा पहुंचा समुन्दर में. संगीत के समुन्दर में. जहां आवाज़ का तूफ़ान बह रहा था. जहां जोहरा रहती थी. जहां जोहरा बसती थी. जहां जोहरा लोगों को उससे प्यार करने को उकसा रही होती थी. वो जोहरा जिसका दिल एक हमसफ़र के लिए बेचैन था. और वहां आज मौजूद था सिकंदर. वही सिकंदर जिसे उसकी मेमसाब ने ठुकरा दिया था. वो मेमसाब जिसके एहसानों तले सिकंदर इस कदर दबा था कि उसे सांस नहीं आती थी. सांस लेने को उसे शराब पीनी होती थी. आज भी पी रहा था. जोहरा सिकंदर को एक रात की बात सुना रही थी. वहां हालांकि मौजूद तमाम लोग थे. मगर जोहरा के लिए वहां सिर्फ सिकंदर और सिकंदर के लिए वहां सिर्फ जोहरा मौजूद थी. जिस रात की बात जोहरा सुना रही थी उस रात चांद अपनी जवानी पर था. और जोहरा के दिल में बस रहा तूफ़ान अपनी रवानी पर. उस रात जिस तरह से एक बादल ने चांद को अपने आगोश में लिया, जोहरा के दिल में एक नज़र पाने के लिए तड़प उठी. जब तक ये बातें महफ़िल में कही जातीं, शराब सिकंदर को अपने आगोश में ले चुकी थी. वो मसनद से उठता है. जोहरा की ओर. जोहरा के लिए. जोहरा की दास्तां को आगे बढ़ाने के लिए. उसे मालूम था कि उसकी बातें सुन जोहरा के दिल में दबी बातें उसके ओंठों तक आ पहुचेंगी. हो ये भी सकता था कि आंखें डबडबा उठें. और यहीं सिकंदर इस दुनिया का सबसे शाश्वत सच कहता है. वो सच जिसे शायद अब तक न किसी ने कहा था, न किसी ने सुना था. वो सच जो जोहरा सुनना तो चाहती थी मगर उसे अपने जीवनकाल में सुनने को मिलेगा, ऐसी उम्मीद नहीं थी. सिकंदर उसे मसीहा पुकारता है. मुहब्बत के मारों का मसीहा. वहां महज़ एक कोठेवाली को मसीहा नहीं कहा जा रहा था. वहां एक नयी किताब लिखी जा रही थी. वो किताब जोहरा के दिल में थी. वो ही जोहरा जिसका महज़ नाम सुनकर एक दिलजला चला आया था. वो जो उसके सामने नशे में चूर कहानी सुना रहा है. जोहरा के सामने एक मांग रक्खी जाती है. दवा या ज़हर में से एक चुन सिकंदर के हत्थे कर देने की. सिकंदर के लिए ये बहुत बड़ा अहसान होगा. मगर उतना बड़ा नहीं जितना मेमसाब ने उसपर किया था. वो मेमसाब जिसके विश्वास को वो सालों से जीतने की कवायद में लगा हुआ था. सिकंदर को दवा या ज़हर में एक से मुहब्बत करनी थी. वो उसे जोहरा से पाना चाहता है. मालूम नहीं ये मुहब्बत थी या दर्द की काट की पहचान. मगर सिकंदर को इस वक़्त कोई जिला सकता था तो वो थी जोहरा. और उसे कोई मार सकता था तो वो थी जोहरा. सिकंदर उसी जोहरा से इस एक अहसान की मिन्नतें कर रहा था. उसमें शराब भरी थी. और एक अच्छे हिस्से में मेमसाब. और शायद उसपर जोहरा की परत चढ़ चुकी थी. जोहरा आखिरी बार सिकंदर से कहती है, "सलाम-ए-इश्क़ मेरी जां ज़रा कुबूल कर लो..." सिकंदर जब पैदा हुआ तो मां-बाप न मालूम कहां चले गए. उसे भूल गए. उसे जिसने पाला, उसके ही घर में चोरी का इलज़ाम लिए सिकंदर शहर भर में ये संदेसा सुना रहा था कि जो दुनिया से हंसते हुए जाता है वो ही मुकद्दर का सिकंदर कहलाता है. उसने जो कहा उसे पत्थर की लकीर मान लेना चाहिए.

"ज़िन्दगी तो बेवफा है, एक दिन ठुकराएगी मौत महबूबा है अपने साथ लेकर जाएगी मरके जीने की अदा जो दुनिया को सिखलाएगा वो मुकद्दर का सिकंदर, जानेमन कहलायेगा"


  https://www.youtube.com/watch?v=9bfF5ABzeyw

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