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यूएन चार्टर क्या है, अमेरिका ने वेनेजुएला पर चढ़ाई कर जिसकी धज्जियां उड़ा दीं?

वेनेजुएला पर चढ़ाई करने वाले अमेरिका पर यूएन चार्टर के उल्लंघन के आरोप लगे हैं. एक्सपर्ट्स का कहना है कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनके देश से उठा लेना अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है.

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अमेरिका पर UN चार्टर का उल्लंघन करने का आरोप लगा है. (india today)

दो विश्वयुद्धों की तबाही के बाद दुनिया अमेरिका के सैन फ्रांसिस्कों में जुटी और तय किया कि देशों के बीच सैन्य विवादों को रोका जाना चाहिए. कोई देश किसी दूसरे देश की सीमा में घुस जाए. हमला करे और लोगों की जानें जाएं. तबाही हो. इन सबकी सभ्य मनुष्यों के संसार में जगह नहीं होनी चाहिए. इसके लिए एक संयुक्त राष्ट्र चार्टर (United Nations Charter) बना. 111 अनुच्छेदों वाले यूएन चार्टर पर सबसे पहले 51 देशों ने साइन किया. अब UN के 193 सदस्य देश हैं और सभी ने यूएन के नियमों को मामने के कागज पर दस्तखत किए हैं.

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इसी यूएन चार्टर के अनुच्छेद 2(4) में कहा गया, 

सभी सदस्य देश अपने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ बल प्रयोग करने या उसकी धमकी देने से बचेंगे. या ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाएंगे जो संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों के खिलाफ हो. 

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यानी कोई भी देश दूसरे देश के खिलाफ सैन्य ताकत का इस्तेमाल नहीं करेगा और उसकी संप्रभुता (स्वतंत्रता) का सम्मान करेगा. लेकिन 3 जनवरी 2025 को जब अमेरिकी सेना वेनेजुएला में घुसकर वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उठा लाई, तब यूएन चार्टर के 'अच्छे-अच्छे' प्रावधानों की मिट्टी पलीद हो गई. तमाम देशों ने कहा कि वेनेजुएला में घुसकर अमेरिका ने यूएन चार्टर के नियमों का उल्लंघन किया है और यह अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए अच्छी बात नहीं है. 

‘द गार्जियन’ से बात करते हुए UN के वार क्राइम कोर्ट में अध्यक्ष रह चुके जेफ्री रॉबर्टसन केसी कहते हैं कि वेनेजुएला पर हमला संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) के खिलाफ है. हकीकत यही है कि अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन किया है. उसने ‘हमले का अपराध’ किया है, जिसे नूर्नबर्ग ट्रायल में सबसे बड़ा अपराध बताया गया था. लंदन के किंग्सटन यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय कानून पढ़ाने वाली सुसान ब्रेउ कहती हैं कि अमेरिका की वेनेजुएला पर कार्रवाई तभी कानूनी मानी जा सकती थी, जब उसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी मिली होती. या अमेरिका आत्मरक्षा में कार्रवाई कर रहा होता लेकिन इन दोनों में से किसी भी बात का कोई सबूत नहीं है.

दुनिया के देशों ने भी अमेरिका के इस एक्शन को ‘सशस्त्र आक्रमण’ कहा है. लेकिन, कुछ लोगों का कहना ये भी है कि अमेरिका ने पहली बार तो ऐसा किया नहीं है. वह अपने कारनामे को जस्टिफाई करने के लिए अनुच्छेद 51 को बीच में लाएगा और कह देगा कि आत्मरक्षा के अधिकार के तहत उसने ये किया है. 

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क्या है अनुच्छेद 51

UN चार्टर का अनुच्छेद 51 कहता है, 

चार्टर संयुक्त राष्ट्र के किसी सदस्य देश पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति में उसके व्यक्तिगत या सामूहिक आत्मरक्षा के स्वाभाविक अधिकार को खत्म नहीं करता. यह अधिकार तब तक बना रहता है, जब तक सुरक्षा परिषद अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए जरूरी कदम नहीं उठा लेती. अनुच्छेद आगे ये भी कहता है कि इस अधिकार का इस्तेमाल अगर कोई सदस्य देश कर रहा है तो उसे इसकी तुरंत सूचना सुरक्षा परिषद को देनी चाहिए.

अगर अमेरिका ये यूएन के सामने ये साबित कर देता है कि उसने अनुच्छेद 15 के आत्मरक्षा के अधिकार के तहत ये कार्रवाई की है तो वह कार्रवाई से बच जाएगा लेकिन अगर ये साबित नहीं होता तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पास उसके खिलाफ एक्शन लेने का अधिकार है. 

ये ऐक्शन क्या हो सकते हैं

दोषी पाए जाने पर यूएन सुरक्षा परिषद अमेरिका पर प्रतिबंध लगा सकता है. इसमें व्यापार पर रोक, हथियारों की बिक्री पर पाबंदी और यात्रा प्रतिबंध शामिल हो सकते हैं. लेकिन इसमें भी एक पेच है. सुदर्शन फाकिर का एक शेर है. 'मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है, क्या मिरे हक में फैसला देगा.' माने ‘न्याय करने वाला’ ही अगर ‘कातिल’ है तो क्या इंसाफ होगा. सुरक्षा परिषद में 5 स्थायी सदस्य हैं- अमेरिका, चीन, रूस, ब्रिटेन और फ्रांस. इन सभी के पास वीटो का अधिकार है. मतलब सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव पर अगर एक देश भी सहमत नहीं होगा तो प्रस्ताव गिर जाएगा. अब अमेरिका कितना भी ‘न्यायप्रिय’ हो लेकिन ये तो नहीं करेगा कि अपने ही खिलाफ लाए गए कार्रवाई के प्रस्ताव को स्वीकार कर ले. 

एक्सपर्ट्स का कहना है कि अमेरिका के पास वीटो पावर है, इसलिए उस पर कभी भी प्रतिबंध तय ही नहीं हो पाएंगे. जेफ्री रॉबर्टसन भी कहते हैं कि प्रतिबंध तो सुरक्षा परिषद ही लगा सकती है और अमेरिका उसका सदस्य है, जिसके पास वीटो का अधिकार है. इससे साफ होता है कि सुरक्षा परिषद एक बेकार संस्था बनकर रह गई है. क्योंकि जो देश अंतरराष्ट्रीय कानून तोड़ता है, वह सिर्फ वीटो का इस्तेमाल करके निंदा से बच सकता है. यानी जिस संस्था को कार्रवाई करनी चाहिए, वही अमेरिकी वीटो से अपंग हो जाती है. 

वीडियो: वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले की पूरी कहानी

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