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वंदे भारत स्लीपर पहली ही यात्रा में 'कूड़ेदान' बनी, यात्रियों का हार्दिक आभार!

वंदे भारत स्लीपर एक्सप्रेस उद्घाटन के बाद से ही चर्चा में है. लॉन्च वाले दिन का उसका एक वीडियो सामने आया है. इसमें दिख रहा है कि लोगों ने ट्रेन के फर्श पर कचरा फैला रखा है.

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वंदे भारत स्लीपर में कचरा फैलाने वाले सोशल मीडिया पर छीले जा रहे हैं (india today)

वंदे भारत स्लीपर एक्सप्रेस जब उद्घाटन के लिए तैयार थी तब रेलवे के अधिकारियों ने लोगों से कहा था कि वो इस ट्रेन में तभी ट्रैवल करें जब उनमें बेसिक सिविक सेंस हो. यानी टॉयलेट इस्तेमाल करने की तमीज हो. वहां दिए गए निर्देशों को मानने की आदत सीख ली हो और सार्वजनिक संपत्ति का सम्मान करना आता हो. लेकिन भारत में ऐसी सलाहों के साथ जो होता है, वंदे भारत स्लीपर एक्सप्रेस के यात्रियों ने ठीक वही किया. यानी उसकी धज्जियां उड़ा दीं. 

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इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, जिस दिन वंदे भारत स्लीपर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरी झंडी दिखाई और ट्रेन हावड़ा से गुवाहाटी के लिए रवाना हुई, उसी दिन शाम को ट्रेन की बोगी का एक वीडियो सामने आ गया. इसमें फर्श पर प्लास्टिक के पैकेट, चम्मच और कूड़े बिखरे दिखाई दिए. ‘एक्स’ पर Indianinfoguide नाम के अकाउंट ने वीडियो शेयर किया और लिखा, 

लॉन्च के कुछ ही घंटों में लोगों ने वंदे भारत में कचरा फैला दिया. देखिए सिविक सेंस का हाल.

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इसके बाद सोशल मीडिया पर ‘ज्ञान’ और गुस्सा दोनों की बारिश शुरू हो गई. किसी ने लिखा कि सिविक सेंस के बिना वर्ल्ड-क्लास ट्रेन, एयरपोर्ट और सड़कें भी नहीं चल सकतीं. इसे प्राइमरी स्कूल से पढ़ाना चाहिए. किसी ने सुझाया कि ट्रेन में गंदगी फैलाने वाले पर भारी-भरकम पेनाल्टी लगाना चाहिए. 

ये वीडियो देखकर लगा कि भारतीय ‘समानता’ में कितना भरोसा रखते हैं. यानी वो हर ट्रेन को बराबरी से गंदा करेंगे. सरकार चाहे जितना जतन करे. वर्ल्ड क्लास ट्रेनें बना दे. साफ-सफाई का स्तर भी एकदम ग्लोबल हो जाए. सीट से लेकर शौचालय तक सब चमका दे, लेकिन भारतीय यात्री ऐसे किसी भी ‘अभिजात्य (Elite) व्यवस्था’ को स्वीकार ही नहीं करेंगे. वो ऐसी हर लग्जरी ट्रेन को भी सरायघाट एक्सप्रेस बनाकर ही सांस लेंगे.

आखिर ऐसा क्यों होता है?

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नियमों की सख्ती इसकी एक बड़ी वजह समझ में आती है. प्लेन में या मेट्रों में नियम सख्त होते हैं. पहरा थोड़ा ज्यादा कसा हुआ होता है, लेकिन ट्रेनों में ये शिकंजा ढीला पड़ जाता है. ट्रेनों को लोग सार्वजनिक संपत्ति मानते हैं. उनको लगता है कि ये सरकार की जिम्मेदारी है कि वो इसे साफ-सुथरा रखे. भले वो अपनी जिम्मेदारी कूड़ा फैलाना मानते हों. इसलिए यहां सब चलता है. 

लेकिन सबसे बड़ी समस्या मानसिकता है. भारत में घर की सफाई के अलावा और कहीं की भी साफ-सफाई को जरूरी माना ही नहीं जाता. और समाज के हर वर्ग में मानसिकता इस हद तक घर कर गई है कि लोगों ने इसे 'जीवनशैली' बना लिया है.

इन सब में सबसे मजेदार बात पता है क्या है? वंदे भारत स्लीपर अभी कमर्शियली चलना शुरू भी नहीं हुई है. इसकी शुरुआत 22 जनवरी से होगी. अभी वो सिर्फ एक बार चली है जब पीएम नरेंद्र मोदी ने उसे हरी झंडी दिखाई थी. अभी वो अपनी पूरी क्षमता से ट्रैक पर आई भी नहीं कि लोगों ने अपना पूरा ‘शिष्टाचार’ दिखा दिया. 

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