सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अतुल श्रीधरन के ट्रांसफर पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने जस्टिस श्रीधरन का नाम लिए बिना कहा कि जजों के ट्रांसफर-पोस्टिंग में कार्यपालिका का दखल नहीं होना चाहिए. क्या किसी जज का सिर्फ इसलिए दूसरे हाई कोर्ट में ट्रांसफर हो जाना चाहिए क्योंकि उसने सरकार के लिए कुछ मुश्किल ऑर्डर पास किए थे? बता दें कि पिछले साल भारत के पूर्व चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन का ट्रांसफर किया था.
'सरकार के खिलाफ फैसले पर जज का ट्रांसफर क्यों?' सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस भुइयां ने ये बात क्यों कही
केंद्र सरकार के कहने पर पूर्व CJI BR Gavai ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जस्टिस Atul Sreedharan का तबादला किया था. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के Justice Ujjal Bhuyan ने उनका नाम नहीं लिया. जस्टिस श्रीधरन ने BJP मंत्री के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश दिया था.


जस्टिस अतुल वही जज हैं, जिन्होंने कर्नल सोफिया कुरैशी पर विवादित बयान देने वाले भाजपा सरकार के मंत्री विजय शाह के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था. जस्टिस भुइयां ने सरकार के खिलाफ फैसला देने वाले जज के तबादले को 'न्यायपालिका की आजादी में दखल' करार दिया.
पुणे के ILS लॉ कॉलेज में प्रिंसिपल जीवी पंडित मेमोरियल लेक्चर में 'कॉन्स्टिट्यूशनल मोरालिटी एंड डेमोक्रेटिक गवर्नेंस' विषय पर बोलते हुए कहा कि जजों का तबादला और तैनाती पर पूरी तरह न्यायपालिका का एकाधिकार है. उन्होंने कहा कि इसमें केंद्र सरकार का प्रभाव नहीं होना चाहिए. इंडिया टुडे से जुड़ीं नलिनी शर्मा की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस उज्जल भुइयां ने पूछा,
आलोचक कहते हैं कि ज्यूडिशियरी को सबसे बड़ा खतरा अंदर से है. किसी जज को सिर्फ इसलिए एक हाई कोर्ट से दूसरे हाई कोर्ट में क्यों ट्रांसफर किया जाना चाहिए क्योंकि उसने सरकार के लिए कुछ मुश्किल ऑर्डर पास किए थे? क्या इससे ज्यूडिशियरी की आजादी पर असर नहीं पड़ता? जब कॉलेजियम के प्रस्ताव में ही यह लिखा है कि किसी खास जज का ट्रांसफर सरकार के दोबारा विचार करने की वजह से किया गया था, तो क्या इससे कॉलेजियम सिस्टम की ईमानदारी से समझौता नहीं होता?
उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसे काम सीधे तौर पर न्यायपालिका की आजादी को कमजोर करते हैं, जो संविधान की एक बुनियादी विशेषता है. उन्होंने आगे कहा,
जब कॉलेजियम खुद अपने मिनट्स में यह रिकॉर्ड करता है कि एक हाई कोर्ट जज का ट्रांसफर केंद्र सरकार के कहने पर किया गया था तो इससे पता चलता है कि संवैधानिक रूप से जो एक स्वतंत्र प्रक्रिया मानी जाती है, उसमें कार्यपालिका की साफ दखलंदाजी हुई है.
जस्टिस उज्जल भुइयां ने आगे कहा, "केंद्र सरकार का हाई कोर्ट जजों के ट्रांसफर या पोस्टिंग में कोई दखल नहीं हो सकता. यह पूरी तरह से ज्यूडिशियरी के अधिकार क्षेत्र में आता है. यह न्याय के बेहतर प्रशासन के लिए किया जाना चाहिए. सरकार का इसमें कोई दखल नहीं हो सकता... यह कॉलेजियम के फैसलों में कार्यपालिका के असर की साफतौर पर मंजूरी दिखाता है. यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है."
दरअसल, जस्टिस भुइयां के बयान को जस्टिस अतुल श्रीधरन के तबादले से जोड़कर देखा जा रहा है. बीते साल मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 'ऑपरेशन सिंदूर' की डेली ब्रीफिंग करने वाली कर्नल सोफिया कुरैशी को कथित तौर पर 'आतंकियों की बहन बताने वाले' BJP मंत्री विजय शाह के खिलाफ स्वत: संज्ञान लिया था. इस पर सुनवाई करते हुए जस्टिस अतुल श्रीधरन ने BJP मंत्री के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश दिया था.

इसके बाद पूर्व CJI बीआर गवई की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने अगस्त 2025 में जस्टिस श्रीधरन का ट्रांसफर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट से छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट कर दिया. सीनियरिटी के लिहाज से जस्टिस श्रीधरन छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में कॉलिजेयम का हिस्सा बनते.
लेकिन अक्टूबर 2025 में केंद्र सरकार की रिक्वेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उनका तबादला इलाहबाद हाई कोर्ट में कर दिया. यहां उनकी सीनियरिटी काफी नीचे थी, जिसकी वजह से वे कॉलेजियम का हिस्सा नहीं बन सके. जस्टिस अतुल श्रीधरन की पहचान एक आजाद और निडर जज के तौर पर होती है. BJP मंत्री के खिलाफ आदेश देना इसका सीधा उदाहरण है.
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