‘सी सदानंदन मास्टर एक साहसी और ज़ुल्म के खिलाफ न झुकने वालों में से हैं…’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये बात राज्यसभा सांसद सदानंदन के लिए ये बात कही थी (C. Sadanandan Master). ये वही हैं जिन्होंने संसद में अपनी स्पीच शुरू करने से पहले अपने दोनों नकली पैर उतारकर टेबल पर रख दिए थे. इसकी तस्वीर इंटरनेट पर खूब वायरल भी है. उन्होंने सदन में 31 साल पहले हुई दुर्घटना के बारे में बताया जब उनके पैर काट दिए गए. लेकिन सदानंदन पर हमला क्यों हुआ? कैसे हुआ? पूरी कहानी पढ़िए.
राज्यसभा में उतारे नकली पैर, सुनाई 1994 की खौफनाक कहानी, सदानंदन मास्टर पर किसने किया था जानलेवा वार?
C. Sadanandan Master पर 25 जनवरी 1994 को हमला हुआ था. हमले के दौरान उनके दोनों पैर काट दिए गए थे. लेकिन हौसला न हारते हुए वो नकली पैरों के साथ वापस स्कूल पहुंचे. उन्होंने कहा हिंसा ख़त्म करने के लिए कुछ भी करूंगा.


सी सदानंदन मास्टर राज्यसभा के नॉमिनेटेड सदस्य हैं. पिछले साल जुलाई में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया था. वे केरल के कन्नूर जिले से आते हैं. उन्होंने गुवाहाटी विश्वविद्यालय से बी.कॉम और कालीकट विश्वविद्यालय से बी.एड की डिग्री ली है. केरल के त्रिशूर जिले के एक हाई स्कूल के शिक्षक रह चुके हैं. पढ़ाने के साथ-साथ वे केरल में नेशनल टीचर्स यूनियन के उपाध्यक्ष भी रहे हैं. सोशल एक्टिविस्ट और एजुकेशनिस्ट दोनों की भूमिका निभा चुके हैं.
सदानंदन की शादी वनिता रानी से हुई जो पेशे से टीचर हैं. उन दोनों की एक बेटी है. बेटी का नाम यमुना भारती है जो एक बी टेक की छात्रा हैं. उनके परिवार के ज्यादातर लोग अकादमिया से जुड़े हैं और सामाजिक कल्याण गतिविधियों में भाग लेते हैं.
सदानंदन की पारिवारिक पृष्ठभूमि कम्युनिस्ट विचारधारा की थी. लेकिन वे विद्यार्थी जीवन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के जरिए आरएसएस से जुड़ गए. वे मलयालम कवि अक्कितम अच्युतन नंबूथिरी की कविताओं से प्रभावित हुए. इनकी कविताओं में राष्ट्रीय प्रेम भावना की झलक दिखाई देती है.
1984 में वे संघ से जुड़े और एर्नाकुलम में बतौर बौद्धिक प्रमुख रहे. यहां नए लोगों को बौद्धिक क्षमता बढ़ाने और विचारधारा के बारे में शिक्षित करने का काम करते थे. तब इनकी उम्र 30 वर्ष थी. धीरे-धीरे संघ में उन्होंने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए.
फिर आया साल 1994. सदानंदन के संघ से जुड़ने के फैसले ने कम्युनिस्ट पार्टी को निराश कर दिया था. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़, कम्युनिस्ट पार्टी के लिए वो एक गद्दार थे. 1994 में वो संघ में सह सरकार्यवाह के तौर पर नियुक्त थे.
इसी दौरान 25 जनवरी, 1994 को जब सदानंदन बस से घर लौट रहे थे तब उन पर एक समूह ने हमला किया. रात के 8:30 बजकर वो मतन्नूर के पास उरुवाचल बस स्टॉप पर उतरे. कुछ लोगों ने उन पर हमला किया जिसमें उनके दोनों पैर काट दिए गए. अस्पताल में कुछ महीने भर्ती होने के बाद सदानंदन फिर से स्कूल लौटे. नकली पैरों से चलकर वो स्कूल पहुंचे थे. इन्हीं पैरों की तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल है.
हमला कैसे हुआ?सदन में अपनी स्पीच शुरू करने से पहले ही सदानंदन ने अपने दोनों नकली पैर उतारकर टेबल पर रख दिए. इसके बाद 31 साल पहले की घटना का ज़िक्र किया. बोले,
सर यह मेरे दोनों पैर हैं. मैं दो पैरों वाला एक मजबूत शख्स था. लेकिन अब घुटनों के नीचे आर्टिफिशियल लिंब्स हैं. सदन में मैं हर वक्त लोकतंत्र के बारे में सुनता रहता हूं. जो लोग लोकतंत्र की दुहाई दे रहे हैं. उन्होंने 31 साल पहले मुझ पर हमला किया था. मुझे अफसोस है कि CPI(M) के टॉर्चर के चलते मैं अपने पैरों पर खड़ा होकर सदन में अपनी पहली स्पीच नहीं दे सकता.
उन्होंने इस घटना के आरोप कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सिस्ट) के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर लगाए हैं. मीडिया रिपोर्ट्स बताती है कि हमले की रात अभियुक्त ने पहले बम फेंका जिससे इलाके में अफरा-तफरी मच गई. इसके बाद समूह ने सदानंदन को पीछे से पकड़ा और उन पर हमला किया. उनके दोनों पैर काट दिए. कटे हुए पैर को रोड पर घसीटा और डैमेज कर दिया ताकि पैर का ट्रांसप्लांटेशन भी न हो सके. अस्पताल पहुंचने पर उन्हें नकली पैर लगाया गया.
नकली पैरों ने हौसला कम नहीं कियाहमले के बाद भी सदानंदन ने संघ परिवार से जुड़ाव बनाए रखा. 1999 में उन्होंने थ्रिसूर के हाई स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया. ये स्कूल संघ द्वारा चलाया जाता है. 2016 के चुनाव में भाजपा ने उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी के खिलाफ कुथुपरम्बा विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया. यह वही इलाका है जहां 1990 के दशक में कई राजनीतिक हत्याएं हुई थीं. चुनावी नतीजे में सदानंदन तीसरे पायदान पर रहे.
2020 में उन्होंने टीचिंग से रिटायरमेंट ले ली. कुछ सालों से वे भारतीय विचार केन्द्रम के सदस्य हैं. ये संघ का 'इंटेलेक्चुअल विंग' है. इसके साथ वे मीडिया में कॉलम भी लिखते रहे हैं. पढ़ाई में कई साल बिताने के बाद उन्हें 'मास्टर' या 'माशय' भी कहा जाने लगा.
हमले ने उनके हौसले को कमज़ोर नहीं किया. बल्कि इसके बाद उन्होंने और भी ज़्यादा हिंदुत्व विचारधारा को बढ़ाने का प्रयास किया. साथ ही साथ ये भी बताया कि किसी भी राजनीतिक मुद्दे को हल हिंसा नहीं हो सकता है. उन्होंने कन्नूर और केरल के अन्य जगहों पर राजनीतिक हिंसा के खिलाफ मुखर रूप अपनाया. शांति और बातचीत का संदेश भी दिया.
एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा “हिंसा का मतलब है एक्शन का रिएक्शन. मैं एक राजनीतिक हिंसा का शिकार रहा हूं और मैं जानता हूं कि इसकी क्या कीमत चुकानी पड़ती है. मैं हिंसा ख़त्म करने की हर मुमकिन कोशिश करूंगा.”
राजनीति में वापसी कैसे हुई?केरल में भाजपा को वापसी करनी थी. 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने केरल में एक सीट जीती. भाजपा के सुरेश गोपी ने त्रिशूर में जीत हासिल की. इसके साथ ही उन्हें भाजपा का राज्य अध्यक्ष भी बनाया गया. 2025 में उन्हें भाजपा के केरल यूनिट का उपाध्यक्ष बना दिया गया. उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में कई साल काम किया है. एजुकेशन और समाज कल्याण के क्षेत्र में उनके योगदान को ध्यान में रखते हुए उन्हें राज्यसभा सांसद के तौर पर मनोनीत किया गया है.
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