ट्रेन का इंतजार करते हुए गला सूखता है. सामने पानी का कूलर दिखता है. नल खोला, बोतल भरी और पानी पी लिया. आम रेल यात्री के लिए ये रोजमर्रा की बात है. लेकिन अब रेलवे स्टेशनों के इसी पानी को लेकर ऐसी रिपोर्ट सामने आई है, जिसने सवाल खड़ा कर दिया है कि जिस पानी को हम भरोसे के साथ पी रहे हैं, उसकी असली सेहत कैसी है.
रेलवे स्टेशनों के पानी में बैक्टीरिया मिलने के बाद एक्शन, क्या सच में प्लेटफॉर्म पर मिलेगा शुद्ध 'टैंक टू टैप' पानी?
Indian Railways: रेलवे स्टेशनों पर पीने के पानी की गुणवत्ता को लेकर CAG की रिपोर्ट के बाद रेलवे ने करीब 20,000 जगहों पर 'टैंक टू टैप' वाटर फिल्ट्रेशन सिस्टम लगाने का फैसला किया है. लेकिन सवाल सिर्फ फिल्टर लगाने का नहीं, उसकी नियमित सफाई, टेस्टिंग और निगरानी का भी है.

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG की 2026 की रिपोर्ट में रेलवे स्टेशनों पर पेयजल और यात्री सुविधाओं की स्थिति की जांच की गई. ऑडिट में 512 स्टेशनों का निरीक्षण हुआ और 458 स्टेशन यानी 89 फीसदी से ज्यादा जगहों पर जरूरी यात्री सुविधाओं में कमियां मिलीं. पानी से जुड़ी जांच में कुछ स्टेशनों के वाटर कूलर के नमूनों में E. coli और दूसरे कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की मौजूदगी सामने आई.
अब रेलवे ने इस रिपोर्ट के बाद करीब 20,000 जगहों पर 'टैंक टू टैप' वाटर फिल्ट्रेशन सिस्टम लगाने की तैयारी की है. इसमें वाटर कूलर्स के साथ फिल्ट्रेशन और मॉनिटरिंग सिस्टम भी शामिल होंगे. ‘द स्टेटमैन्स’ की ख़बर के मुताबिक रेलवे मंत्री अश्विनी वैष्णव की समीक्षा के बाद तत्काल सुधार के निर्देश दिए गए हैं. पानी की टंकियों को बदलने, स्रोत और आउटलेट दोनों जगह नियमित पानी की जांच कराने, टंकियों की तय समय पर सफाई और व्यवस्था की केंद्रीय निगरानी की बात भी कही गई है.
पहले समझिए, CAG की रिपोर्ट में असल समस्या क्या मिली?
CAG की रिपोर्ट का सबसे अहम हिस्सा पानी की गुणवत्ता से जुड़ा है. ऑडिट के दौरान रेलवे स्टेशनों के वाटर कूलर और दूसरी पेयजल व्यवस्थाओं की जांच की गई. कुछ नमूनों में E. coli मिला. E. coli की मौजूदगी सामान्य तौर पर फीकल यानी मलजनित प्रदूषण का संकेत मानी जाती है. इसका मतलब ये नहीं है कि हर E. coli स्ट्रेन इंसानों के लिए बीमारी पैदा करता है, लेकिन पीने के पानी में इसकी मौजूदगी गंभीर जांच और सुधार की जरूरत जरूर बताती है.
रिपोर्ट में सिर्फ पानी की लैब टेस्टिंग की बात नहीं है. असली समस्या उस पूरी चेन में है जिससे पानी यात्री के गिलास या बोतल तक पहुंचता है. पानी का स्रोत साफ हो सकता है, लेकिन अगर स्टोरेज टैंक गंदा है, पाइपलाइन की हालत खराब है या कूलर की सफाई नियमित नहीं होती, तो आखिरी बिंदु तक पहुंचते-पहुंचते पानी दूषित हो सकता है.
CAG की ऑडिट प्रक्रिया में वाटर कूलर्स की सफाई और उसके रिकॉर्ड को लेकर भी कमियां सामने आई थीं. रेलवे के एक आधिकारिक ऑडिट दस्तावेज में 229 जांचे गए स्टेशनों में से 191 पर कूलर की सफाई या रिकॉर्ड से जुड़ी कमियां दर्ज की गईं. 139 स्टेशनों पर सफाई का रिकॉर्ड ही उपलब्ध नहीं था. जहां रिकॉर्ड मौजूद था, वहां भी सभी जगह मासिक सफाई नहीं हो रही थी.
यानी समस्या सिर्फ मशीन की नहीं, सिस्टम की भी है.
अब 'टैंक टू टैप' आखिर है क्या?
नाम से समझना आसान है. टैंक में आया पानी सीधे नल तक पहुंचने से पहले फिल्ट्रेशन और जरूरी ट्रीटमेंट से गुजरे. इसके बाद ही उसे पीने के लिए उपलब्ध कराया जाए.
इसका मतलब हर जगह एक जैसा RO प्लांट लगाना जरूरी नहीं है. पानी की शुरुआती गुणवत्ता और उसमें मौजूद प्रदूषकों के हिसाब से अलग-अलग ट्रीटमेंट तकनीक इस्तेमाल की जा सकती हैं. सामान्य तौर पर किसी सिस्टम में प्री-फिल्ट्रेशन से मिट्टी, गाद और दूसरे ठोस कण हटाए जा सकते हैं. इसके बाद जरूरत के हिसाब से कार्बन फिल्ट्रेशन, अल्ट्राफिल्ट्रेशन, UV या दूसरी तकनीक इस्तेमाल की जा सकती है.
लखनऊ में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार सिंह बताते हैं,
रेलवे में पहले भी अलग-अलग जगहों पर पानी को शुद्ध करने की व्यवस्थाएं पहले भी रही हैं. 2019 में रेल मंत्रालय ने बताया था कि स्टेशनों पर सप्लाई होने वाले पानी को जरूरत के मुताबिक ट्रीट और डिसइन्फेक्ट किया जाता है और उसकी नियमित जांच की जाती है. चुनिंदा स्टेशनों पर RO आधारित पेयजल यूनिट भी लगाई गई थीं.
इसी तरह मुंबई डिवीजन में रेलवे प्लेटफॉर्म के लिए लगाए गए कुछ अल्ट्राफिल्ट्रेशन आधारित सिस्टम के बारे में परमाणु ऊर्जा विभाग ने बताया था कि ऐसी यूनिट्स बैक्टीरिया और सस्पेंडेड सॉलिड्स को हटाने के लिए मेम्ब्रेन फिल्ट्रेशन का इस्तेमाल करती हैं और BIS 10500 के अनुरूप पेयजल देने के लिए डिजाइन की गई थीं.
सिर्फ फिल्टर लगाने से पानी सुरक्षित हो जाएगा?
इस सवाल का सीधा सा जवाब है, जरूरी नहीं.
पानी की सुरक्षा को एक पाइपलाइन की तरह समझिए. शुरुआत में पानी ठीक है, फिल्टर भी शानदार है, लेकिन बीच में गंदी टंकी है तो पूरी व्यवस्था कमजोर हो जाएगी. इसी वजह से रेलवे के नए निर्देश में सिर्फ फिल्ट्रेशन सिस्टम नहीं, बल्कि टैंकों को बदलने, नियमित सफाई, स्रोत और आउटलेट दोनों जगह टेस्टिंग और केंद्रीय मॉनिटरिंग पर जोर दिया गया है.
सबसे अहम सवाल होगा कि ये सिस्टम जमीन पर कितनी नियमितता से चलते हैं. फिल्टर की क्षमता कितनी है, उसका मेंटेनेंस कौन करेगा, फिल्टर कब बदलेगा, टंकी कब साफ होगी, पानी की रिपोर्ट कहां दर्ज होगी और अगर किसी स्टेशन पर टेस्ट फेल होता है तो तुरंत सप्लाई रोकने और सुधारने की व्यवस्था क्या होगी.
यानी 'टैंक टू टैप' का असली टेस्ट मशीन लगने के दिन नहीं, उसके छह महीने और एक साल बाद होगा.

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यात्रियों के लिए इसका मतलब क्या है?
अगर योजना ठीक से लागू होती है तो यात्री को सबसे बड़ा फायदा स्टेशन पर मिलने वाले पीने के पानी की विश्वसनीयता के रूप में मिल सकता है. खासकर बच्चों, बुजुर्गों और लंबे सफर में स्टेशन के पानी पर निर्भर यात्रियों के लिए ये महत्वपूर्ण है.
लेकिन यात्री के लिए एक और बात समझना जरूरी है. 'फिल्टर लगा है' का मतलब अपने आप 'हर समय पानी सुरक्षित है' नहीं होता. पानी की गुणवत्ता लगातार मॉनिटर करनी पड़ती है. स्टोरेज और डिस्पेंसिंग पॉइंट की सफाई भी उतनी ही जरूरी है.
रेलवे पहले से पेयजल गुणवत्ता की निगरानी के लिए प्रोटोकॉल की बात करता रहा है. अब CAG की रिपोर्ट के बाद चुनौती ये है कि कागज पर मौजूद नियमों को स्टेशन के नल तक उतारा जाए.
क्योंकि आखिरकार यात्री को रिपोर्ट नहीं पीनी है. उसे पानी पीना है. और रेलवे के 'टैंक टू टैप' प्रोजेक्ट की सफलता का असली पैमाना भी यही होगा कि प्लेटफॉर्म पर पानी भरते समय यात्री को पहली बार ये भरोसा हो कि नल से निकलने वाला पानी सिर्फ ठंडा नहीं, सचमुच सुरक्षित भी है.
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