ट्रायल कोर्ट के एक जज ने हत्या के एक मामले में पांच लोगों को दोषी करार दिया. सजा का आधार आरोपियों का बयान था, जिसमें उन्होंने अपना अपराध स्वीकार किया था. लेकिन ये कानूनी तौर पर सही नहीं था. पटना हाई कोर्ट ने इस मामले में सख्त एक्शन लिया है. फैसला देने वाले जज से आपराधिक मुकदमे की सुनवाई का अधिकार छीन लिया गया है. साथ ही उन्हें नए कानूनों की स्पेशल ट्रेनिंग लेने का आदेश भी मिला है.
जज ने मर्डर केस में फैसला दिया, HC ने क्रिमिनल केस सुनने का अधिकार क्यों छीन लिया?
बिहार के शेखपुरा के एक ट्रायल कोर्ट के जज ने पांच आरोपियों को हत्या के एक मामले में आजीवन कारावास की सजा दी. आरोपियों ने पटना हाई कोर्ट में फैसले को चुनौती दी. हाई कोर्ट ने फैसले को पलटते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट के जज को आपराधिक कानूनों की कोई समझ नहीं है. उन्हें स्पेशल ट्रेनिंग की जरूरत है.


इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस बिबेक चौधरी और जस्टिस चंद्र शेखर झा की बेंच ने जज को आपराधिक मुकदमों की सुनवाई से हटाने की सलाह दी. साथ ही उनको आपराधिक कानूनों की स्पेशल ट्रेनिंग लेने का निर्देश दिया. जस्टिस चौधरी और जस्टिस झा की बेंच ने 30 मार्च को ये फैसला सुनाया. उन्होंने अपने आदेश में लिखा,
हम बेहद विनम्रता से यह स्वीकार करते हैं कि माननीय ट्रायल जज को आपराधिक मुकदमें में साक्ष्यों की प्रासंगिकता, स्वीकार्यता और मान्यता के बारे में कोई जानकारी नहीं है. हमारा मानना है कि ऐसी स्थिति में शेखपुरा स्थित फर्स्ट कोर्ट के एडिशनल सेशन जज को आपराधिक मामले की सुनवाई का अधिकार दिया जाए. वहीं इनको भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) की ट्रेनिंग दी जाए.
पटना हाई कोर्ट की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट के जज की जानकारी पर हैरानी जताई. कोर्ट ने कहा,
इनको ये भी नहीं पता कि पुलिस हिरासत में आरोपी का इकबालिया बयान (Confession) दर्ज नहीं किया जा सकता.
यह मामला साल 2017 में शेखपुरा जिले में एक जूनियर इंजीनियर की गोली मारकर हत्या करने से जुड़ा था. 17 जनवरी 2017 को हत्या के आरोप में पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया गया. शेखपुरा पुलिस स्टेशन पर इनके खिलाफ FIR दर्ज किया था. मनरेगा में गलत एंट्री करने से मना करने के चलते इन पर जेई की हत्या का आरोप लगा था. 22 जुलाई 2019 को शेखपुरा ट्रायल कोर्ट ने इनको हत्या का दोषी ठहराया. और आजीवन कारावास की सजा सुनाई.
इस फैसले से असंतुष्ट दोषियों ने पटना हाई कोर्ट का रुख किया. पटना हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि अपीलकर्ताओं को ऐसे सबूतों के आधार पर दोषी ठहराया गया है, जिन्हें आपराधिक कानून में सबूत के तौर पर मान्यता नहीं दी जाती. कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए आरोपियों को रिहा करने का आदेश दिया है.
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