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39 साल की उम्र में बैंक फ्रॉड, 78वें साल में सजा, फैसला देने वाले जज 2 साल से 41 साल के हो गए

आरोपी पर 1984-85 में खातों में हेराफेरी करके, गलत क्रेडिट एंट्री करके और खाते में बिना कोई पैसा हुए चेक क्लियर करके पंजाब एंड सिंध बैंक को धोखा देने का आरोप लगा था.

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साल 1986 में दीपक कुमार की उम्र दो साल थी, जब ये मामला पहली बार दर्ज किया गया था. (फोटो- सोशल मीडिया)

दिल्ली की निचली अदालतों में चल रहे सबसे पुराने केसों में से एक में आखिरकार फैसला आ गया. 1986 में पहली बार दर्ज किए गए एक बैंक फ्रॉड मामले में पिछले पांच महीने से सुनवाई चल रही थी. राउज एवेन्यू कोर्ट के CJM दीपक कुमार ने इस मामले में अपना जजमेंट दे दिया है. पूरा मामला क्या है और किस फ्रॉड से जुड़ा है, ये जानने से पहले इस मामले के एक तथ्य के बारे में आपको बताते हैं.

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CJM दीपक कुमार को पिछले साल अक्टूबर महीने में द्वारका कोर्ट से राउज एवेन्यू कोर्ट ट्रांसफर किया गया था. साल 1986 में दीपक कुमार की उम्र दो साल थी, जब ये मामला पहली बार दर्ज किया गया था. 41 वर्षीय कुमार पिछले पांच महीनों से इसी मामले की सुनवाई कर रहे हैं. पिछले पांच सालों से इस केस की फाइल 11 जजों के चेंबर से होकर गुजरी. कुछ छह महीने पहले ये मामला दीपक कुमार की कोर्ट के पास आया. और अब मामले में आरोपी एसके त्यागी ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है. 39 सालों बाद!

3 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हुई थी

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक 20 मार्च, 1986 को पंजाब एंड सिंध बैंक, नई दिल्ली के रीजनल मैनेजर और बैंक के चीफ विजिलेंस ऑफिसर द्वारा धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए दो शिकायतें दर्ज कराई गई थीं. इन दोनों को एक साथ जोड़कर CBI ने ये मामला दर्ज किया. इसके दो साल बाद 13 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई.

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आरोप था कि आरोपियों ने धोखाधड़ी करके और अपने खातों में अवैध रूप से पैसे जमा करके बैंक को 32 लाख रुपये का नुकसान पहुंचाया है. त्यागी पर 1984-85 में खातों में हेराफेरी करके, गलत क्रेडिट एंट्री करके और खाते में बिना कोई पैसा हुए चेक क्लियर करके पंजाब एंड सिंध बैंक को धोखा देने का आरोप लगा था.

2001 में आरोप तय किए गए

मामले में चार्जशीट दाखिल होने के 13 साल बाद, यानी 28 मई 2001 को तीस हजारी कोर्ट के तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट जेपीएस मलिक ने सभी आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी और बेईमानी से संपत्ति की डिलीवरी), 468 (धोखाधड़ी के उद्देश्य से जालसाजी), 477 ए (खातों में हेराफेरी) और 120 बी (आपराधिक साजिश) के तहत आरोप तय किए.

रिपोर्ट के मुताबिक 2001 से 2019 के बीच इस मामले की प्रगति के बारे में कोई भी जानकारी नहीं मिली. तीस हजारी में ये मामला चल रहा था, लेकिन केस के रिकॉर्ड वहां नहीं मिल सके. जुलाई 2019 में ये मामला राउज एवेन्यू कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया. पिछले छह साल से त्यागी समेत चार आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चल रहा है. इनमें से दो, सुभाष गर्ग और आरके मल्होत्रा ​की मौत हो चुकी है. गर्ग की मौत राउज एवेन्यू कोर्ट में केस आने से पहले हो गई. जबकि मल्होत्रा ​​की मौत 19 अप्रैल, 2021 को हुई थी.

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39 साल बाद अपराध स्वीकारा

24 जनवरी को त्यागी कोर्ट पहुंचे. 39 साल बाद मामले में उन्होंने अपना अपराध स्वीकार करने का फैसला किया था. CJM कुमार ने त्यागी की अर्जी देखते हुए कहा,

"मैं आपको अपने फैसले पर विचार करने के लिए एक सप्ताह का समय दे रहा हूं."

हालांकि, त्यागी अपने फैसले पर अडिग. 29 जनवरी को त्यागी जज कुमार की अदालत के समक्ष फिर से पेश हुए. उनके साथ उनके वकील एमएस अरोड़ा भी थे. त्यागी सहज दिख रहे थे, क्योंकि उन्होंने अपना मन बना लिया था. वो अपना अपराध स्वीकार करना चाहते थे. मामले की सुनवाई करते हुए जज ने उन्हें दोष कुबूल करने के परिणाम समझाए. जज के रुकते ही त्यागी ने अपने वकील से सलाह ली और फुसफुसाते हुए कुछ कहा. एक मिनट बाद, उन्होंने दोषी होने की दलील देने के अपने फैसले को दोहराया.

अदालत से सजा में नरमी बरते जाने की मांग करते हुए त्यागी ने कहा कि वो 78 वर्ष के हैं और उनके पास आय का कोई स्रोत नहीं है. उन्होंने अदालत को ये भी बताया कि उनकी पत्नी की आय पर वो निर्भर हैं. उनकी पत्नी को पार्किंसंस रोग है. त्यागी ने ये भी बताया कि बैंक से लिया गया पैसा वन-टाइम सेटलमेंट (OTS) के रूप में बैंक को वापस कर दिया गया था.

इससे पहले 28 जनवरी को जज कुमार ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा,

"अपराध की स्वैच्छिक दलील के मद्देनजर, आरोपी पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है. इसके अलावा CrPC में ऐसा कुछ भी नहीं है जो आरोपी व्यक्तियों को मुकदमे के किसी भी बाद के चरण में दोषी होने की दलील देने से रोकता हो. एसके त्यागी को दोषी ठहराया जाता है..."

जज ने त्यागी को अपराधों में शामिल होने के लिए उठने तक की सजा सुनाते हुए कहा,

"दोषी ने पश्चाताप करने की सच्ची इच्छा दिखाई है, इसलिए उसे सुधार के लिए उचित अवसर दिया जाना चाहिए. ताकि वो देश का एक उपयोगी नागरिक बन सके. साथ ही, दोषी को ऐसी सजा दी जानी चाहिए जो अन्य समान विचारधारा वाले लोगों को अपराध की दुनिया में प्रवेश करने से रोके."

बता दें कि अदालत के उठने तक की सज़ा के तहत आरोपी व्यक्ति को अदालत के बंद होने तक हिरासत में रहना होता है. त्यागी पर प्रत्येक अपराध के लिए 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया.

कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार मामले की शुरुआत में गिरफ्तारी के बाद त्यागी ने दो दिन न्यायिक हिरासत में बिताए थे. मामले में दो आरोपियों की मौत हो चुकी है और एक ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है. इसलिए मुकदमा प्रभावी रूप से केवल नीलू मल्होत्रा ​​के खिलाफ लंबित है.

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