महाराष्ट्र सरकार ने लोहे की एक खनन परियोजना को वाइल्डलाइफ क्लियरेंस लेने से ये कहते हुए छूट दे दी कि यह बाघ कॉरिडोर में नहीं आता. हालांकि, कथित तौर पर आधिकारिक दस्तावेज बताते हैं कि ये दावा गलत है और जिस इलाके में परियोजना की जमीन है वो टाइगर संरक्षण योजना की मंजूरी वाले टाइगर कॉरिडोर मेें आती है.
बाघों की जमीन माइनिंग कंपनी को दे दी? सरकार बोली 'नहीं', नक्शे ने सच दिखा दिया
महाराष्ट्र सरकार ने एक कंपनी के आयरन माइनिंग प्रोजेक्ट को वाइल्डलाइफ क्लियरेंस लेने से ये कहते हुए छूट दे दी कि वह बाघ कॉरिडोर के इलाके के नहीं पड़ता. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, आधिकारिक दस्तावेज बताते हैं कि ये दावा सही नहीं था.


इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, ये प्रोजेक्ट लॉयड्स मेटल्स एंड एनर्जी कंपनी का है. इसके तहत गढ़चिरौली में 9.4 वर्गकिमी जंगल की जमीन को आयरन माइनिंग प्रोजेक्ट के लिए इस्तेमाल किया जाना है.
इस प्रोजेक्ट को 15 अप्रैल को फॉरेस्ट क्लियरेंस और 12 मई को एनवायरनमेंट क्लियरेंस भी मिल गया था. इसमें बस वाइल्डलाइफ क्लियरेंस (वन्यजीव मंजूरी) मिलना बाकी था, लेकिन पर्यावरण क्लियरेंस मिलने के एक दिन बाद ही सरकार ने कह दिया कि कंपनी को प्रोजेक्ट के लिए वाइल्डलाइफ मंजूरी लेने की जरूरत नहीं है. वजह बताई गई कि जिस जमीन का इस्तेमाल कंपनी को करना है, वो बाघ कॉरिडोर में नहीं आती.
एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी विभाग का ये दावा गलत है. कंपनी ने राज्य सरकार को प्रोजेक्ट का जो मैप भेजा था, उसके मुताबिक परियोजना का क्षेत्र फॉरेस्ट कंपार्टमेंट संख्या 196, 197, 273, 274, 275, 276, 298, 300 और 301 में आता है. बताया गया कि इनमें से सिर्फ कंपार्टमेंट नंबर 300 को छोड़कर बाकी सभी भूखंड राष्ट्रीय बाघ संरक्षण अथॉरिटी (NTCA) की मंजूर की गई टाइगर संरक्षण योजना (TCP) में ताडोबा-इंद्रावती बाघ कॉरिडोर का हिस्सा बताए गए हैं.
टाइगर कॉरिडोर क्या होते हैं?टाइगर कॉरिडोर या बाघ गलियारा वाइल्डलाइफ का वो रास्ता होता है, जो बाघों के इलाकों को जोड़ता है. इस रास्ते बाघ और अन्य जंगली जानवर एक जगह से दूसरी जगह पर आते-जाते हैं. इससे उनकी आनुवंशिक विविधता बनी रहती है और उनकी उम्र लंबी होती है.
कंपनी ने भी टाइगर कॉरिडोर बतायाएक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2024 में लॉयड्स कंपनी ने अपने प्रोजेक्ट के वाइल्डलाइफ क्लियरेंस के लिए आवेदन किया था. इसमें उसने परियोजना स्थल को टाइगर कॉरिडोर बताया था. इसके बावजूद, 13 मई को महाराष्ट्र के चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन एम श्रीनिवास रेड्डी ने कंपनी को परियोजना के लिए वाइल्डलाइफ क्लियरेंस लेने से छूट दे दी और जंगल की जमीन कंपनी को देने की सिफारिश भी कर दी. उन्होंने कहा कि परियोजना का क्षेत्र किसी नेशनल पार्क, वाइल्डलाइफ सैंचुरी, टाइगर रिजर्व या किसी टाइगर कंजर्वेशन प्लान के तय किए गए गलियारे के अंदर या उसके आसपास नहीं है.
सरकारी दस्तावेजों में ये दावा गलत होने की खबर पर श्रीनिवास रेड्डी ने एक्सप्रेस से कहा कि इसकी जानकारी उन्हें वन संरक्षक लेवल के एक सीनियर अफसर ने दी थी. उन्होंने कहा कि वो इसकी जांच करेंगे कि अफसर की दी गई जानकारी क्या गलत थी.
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