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सड़क हादसों के चलते हर दिन 6 लोग नहीं लौटते घर, पिछले 5 साल के आंकड़े डराने वाले हैं

भारत में गड्ढों की वजह से सड़क हादसों में मौतें पिछले पांच साल में 53% बढ़ गई हैं. Ministry of Road Transport and Highways के आंकड़ों के मुताबिक हर दिन छह से ज्यादा लोग pothole accidents का शिकार हो रहे हैं, जिससे road safety पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. खराब सड़कें, बढ़ते road accidents और प्रशासनिक लापरवाही अब एक बड़ी राष्ट्रीय चिंता बनते जा रहे हैं.

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रोजाना सड़क हादसों मे होती हैं 6 मौतें

सड़क पर चलते वक्त हम अक्सर गड्ढे देखकर बस थोड़ा सा हैंडल मोड़ते हैं या ब्रेक लगा देते हैं. लेकिन यही गड्ढे कई लोगों की जिंदगी का आखिरी मोड़ बन जाते हैं. देश में सड़क हादसों की बात होती है तो अक्सर तेज रफ्तार, शराब पीकर ड्राइविंग या ट्रैफिक नियमों की अनदेखी पर चर्चा होती है. मगर एक और खामोश खतरा है जो हर साल हजारों लोगों की जान ले रहा है. ये खतरा है सड़कों पर बने गहरे और खतरनाक गड्ढे.

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हाल ही में संसद में पेश आंकड़ों ने इस खतरे की गंभीरता को साफ कर दिया है. आंकड़े बताते हैं कि पिछले पांच साल में गड्ढों से जुड़े सड़क हादसों में मौतें 53 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ गई हैं. यानी समस्या कम होने के बजाय लगातार बढ़ती जा रही है.

संसद में सामने आई डराने वाली तस्वीर

ये आंकड़े सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय यानी Ministry of Road Transport and Highways ने संसद के निचले सदन Lok Sabha में पेश किए. रिपोर्ट बताती है कि 2020 से 2024 के बीच गड्ढों के कारण कुल 9,438 लोगों की मौत हुई.

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2020 में ऐसे हादसों में 1,555 लोगों की जान गई थी. 2024 तक यह संख्या बढ़कर 2,385 हो गई. अगर इसे रोज के हिसाब से देखें तो औसतन हर दिन छह से ज्यादा लोग सिर्फ गड्ढों की वजह से मर रहे हैं.

2021 में कोरोना महामारी के दौरान थोड़ी गिरावट जरूर आई थी. उस समय आवाजाही कम थी, लोग घरों में ज्यादा थे, इसलिए सड़क हादसे भी कम हुए. लेकिन जैसे ही जिंदगी पटरी पर लौटी, गड्ढों का खतरा फिर बढ़ गया.

हादसे भी बढ़े, चोटें भी बढ़ीं

मौतों के साथ साथ गड्ढों से जुड़े हादसों की संख्या भी बढ़ी है. 2020 में ऐसे 3,713 हादसे दर्ज हुए थे. 2024 तक ये बढ़कर 5,432 हो गए. पांच साल में कुल 23,056 हादसे सिर्फ गड्ढों की वजह से हुए.

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चोटों के आंकड़े भी कम चिंताजनक नहीं हैं.

2020 में 3,167 लोग घायल हुए थे. 2024 में यह संख्या बढ़कर 4,643 हो गई. 2023 में तो चोटों का आंकड़ा 5,309 तक पहुंच गया था, जो इस अवधि का सबसे ज्यादा स्तर रहा.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक गंभीर चोटों में लगभग 34 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. 2020 में 1,672 लोगों को गंभीर चोट लगी थी, जबकि 2024 में यह संख्या 2,238 हो गई. मामूली चोटों का आंकड़ा और तेजी से बढ़ा. 1,495 से बढ़कर 2,405.

कुल मिलाकर पांच साल में 9,670 लोगों को गंभीर चोट और 10,286 लोगों को मामूली चोटें आईं.

एक गड्ढा और खत्म हो गई जिंदगी

पिछले हफ्ते राजधानी New Delhi के Janakpuri इलाके में एक 25 साल का युवक बाइक से जा रहा था. सड़क पर खुदाई का गड्ढा था. संतुलन बिगड़ा, वह गिरा और फिर उठ नहीं पाया.

ऐसी खबरें अब चौंकाती नहीं हैं. क्योंकि लगभग हर शहर में लोग ऐसी घटनाएं सुनते रहते हैं. कई बार बारिश में गड्ढे दिखते भी नहीं. पानी के नीचे छिपा खतरा अचानक सामने आता है और हादसा हो जाता है.

यूपी सबसे आगे. लेकिन गलत वजह से

राज्यवार आंकड़ों पर नजर डालें तो सबसे ज्यादा मौतें Uttar Pradesh में हुईं. देशभर में गड्ढों से हुई कुल मौतों में आधे से ज्यादा अकेले इसी राज्य से हैं.

2020 में यहां 759 लोगों की जान गई थी. 2024 में यह संख्या बढ़कर 1,369 हो गई. यह लगातार बढ़ोतरी दिखाती है कि समस्या सिर्फ बड़ी नहीं है, बल्कि लगातार बिगड़ रही है.

इसके बाद Madhya Pradesh का नंबर आता है. यहां 2020 में 96 मौतें हुईं, जो 2024 में बढ़कर 277 हो गईं.

Punjab, Tamil Nadu और Assam भी इस सूची में ऊपर हैं. ये पांच राज्य मिलकर गड्ढों से होने वाली कुल मौतों के 82 प्रतिशत से ज्यादा के लिए जिम्मेदार हैं.

सड़कें लंबी, लेकिन सुरक्षित कितनी?

भारत के पास दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सड़क नेटवर्क है. देश में करीब 63.45 लाख किलोमीटर सड़कें हैं. इनमें लगभग 1.46 लाख किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग और 1.80 लाख किलोमीटर राज्य राजमार्ग शामिल हैं.

इतना बड़ा नेटवर्क संभालना आसान नहीं है. लेकिन सवाल यह है कि अगर सड़कें बन रही हैं, तो क्या उनकी देखभाल भी उतनी ही गंभीरता से हो रही है?

2024 में देशभर में सड़क हादसों में 1.77 लाख लोगों की मौत हुई. यह 2023 के मुकाबले 2.31 प्रतिशत ज्यादा है, जब 1.73 लाख मौतें दर्ज हुई थीं.

दुनिया में सड़क हादसों से होने वाली मौतों के मामले में भारत सबसे ऊपर है. दूसरे नंबर पर China है, जहां भारत की तुलना में करीब 36 प्रतिशत मौतें होती हैं. तीसरे स्थान पर United States है, जहां यह आंकड़ा भारत का लगभग 25 प्रतिशत है.

आखिर बनते क्यों हैं इतने गड्ढे?

गड्ढे अचानक पैदा नहीं होते. इनके पीछे कई वजहें होती हैं. सबसे बड़ी वजह है खराब निर्माण. कई जगह सड़क बनाते वक्त घटिया सामग्री का इस्तेमाल होता है. ऊपर से भारी वाहन गुजरते हैं और कुछ ही महीनों में सड़क टूटने लगती है.

दूसरी बड़ी वजह है पानी. बारिश का पानी जब सड़क में घुसता है तो अंदर की परत कमजोर हो जाती है. फिर धीरे धीरे सड़क धंसती है और गड्ढा बन जाता है.

तीसरी वजह है समय पर मरम्मत न होना. छोटे गड्ढे अगर तुरंत भर दिए जाएं तो बड़े हादसे टल सकते हैं. लेकिन अक्सर ऐसा नहीं होता.

शहर हो या हाईवे, खतरा हर जगह

आंकड़ों में साफ लिखा है कि ये हादसे सिर्फ हाईवे पर नहीं हो रहे. राष्ट्रीय राजमार्ग, राज्य मार्ग और शहरों की सड़कें, हर जगह गड्ढे जानलेवा साबित हो रहे हैं.

शहरों में समस्या इसलिए ज्यादा खतरनाक है क्योंकि यहां ट्रैफिक घना होता है. अचानक ब्रेक लगाने से पीछे से टक्कर का खतरा बढ़ जाता है.

हाईवे पर खतरा अलग है. यहां गाड़ियां तेज चलती हैं. अगर 80 या 100 की रफ्तार में वाहन गड्ढे से टकरा जाए तो चालक के पास संभलने का समय नहीं होता.

जिम्मेदारी किसकी?

यह सवाल हमेशा उठता है, लेकिन जवाब अक्सर धुंधला रहता है. सड़क बनाने वाली एजेंसी, उसकी निगरानी करने वाला विभाग, स्थानीय प्रशासन और ठेकेदार. सबकी भूमिका होती है. लेकिन हादसे के बाद जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो जाता है.

कई मामलों में पीड़ित परिवारों को मुआवजा पाने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है.

तकनीक मदद कर सकती है 

आज कई देश सड़क की निगरानी के लिए नई तकनीक इस्तेमाल कर रहे हैं. सेंसर, ड्रोन और मोबाइल ऐप के जरिए गड्ढों की जानकारी तुरंत मिल जाती है.

भारत में भी कुछ शहरों ने ऐसी पहल की है, जहां लोग फोटो भेजकर गड्ढे की शिकायत कर सकते हैं. लेकिन समस्या यह है कि शिकायत के बाद मरम्मत कितनी जल्दी होती है. 

तकनीक तभी काम करेगी जब सिस्टम तेजी से प्रतिक्रिया दे.

लोगों की भी भूमिका है

अक्सर लोग गड्ढा देखकर सोशल मीडिया पर पोस्ट तो कर देते हैं, लेकिन आधिकारिक शिकायत नहीं करते. अगर स्थानीय निकाय को जानकारी ही नहीं मिलेगी, तो कार्रवाई कैसे होगी?

साथ ही, ड्राइविंग करते समय सतर्क रहना भी जरूरी है. खासकर बारिश में. लेकिन यह भी सच है कि हर जिम्मेदारी नागरिकों पर नहीं डाली जा सकती. सुरक्षित सड़क देना सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी है.

गड्ढा सिर्फ सड़क में नहीं, सिस्टम में भी?

जब हर साल हजारों लोग मर रहे हों, तो यह सिर्फ एक इंफ्रास्ट्रक्चर समस्या नहीं रह जाती. यह सिस्टम की कमजोरी दिखाती है.

हम स्मार्ट सिटी की बात करते हैं. एक्सप्रेसवे बन रहे हैं. नई नई परियोजनाएं शुरू हो रही हैं. लेकिन अगर पुरानी सड़कें ही सुरक्षित नहीं हैं, तो विकास अधूरा लगता है.

क्या बदलेगा हाल?

समाधान मुश्किल नहीं है. जरूरत है लगातार निगरानी की, बेहतर निर्माण की और जवाबदेही तय करने की.

  • अगर हर सड़क का नियमित ऑडिट हो.
  • अगर खराब निर्माण पर सख्त कार्रवाई हो.
  • अगर गड्ढा बनने के 24 या 48 घंटे के भीतर मरम्मत अनिवार्य हो.

अगर ऊपर लिखे तीनों पॉइंट्स पर काम कर लिया जाए तो हालात काफी बदल सकते हैं.

कई विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि ठेकेदारों को कुछ साल तक सड़क की गुणवत्ता की जिम्मेदारी देनी चाहिए. ताकि वे टिकाऊ सड़क बनाएं, सिर्फ काम पूरा करके न निकल जाएं.

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आंकड़े सिर्फ नंबर नहीं होते

जब हम पढ़ते हैं कि पांच साल में 9,438 मौतें हुईं, तो यह एक आंकड़ा लगता है. लेकिन हर संख्या के पीछे एक परिवार है. एक अधूरा सपना है. किसी का बेटा, बेटी, पिता या दोस्त है.

सोचिए, अगर एक छोटी सी मरम्मत समय पर हो जाती, तो शायद ये लोग आज जिंदा होते.

आखिरी बात

सड़क पर गड्ढा दिखे तो हम अक्सर कहते हैं, "यार ये कब भरेगा?"

लेकिन असली सवाल है, "कितनी जानें जाने के बाद भरेगा?"

सड़क सिर्फ यात्रा का रास्ता नहीं होती. यह घर लौटने की उम्मीद होती है. इसलिए जरूरी है कि विकास की रफ्तार के साथ सुरक्षा भी उतनी ही तेज हो. वरना गड्ढे यूं ही बनते रहेंगे. और आंकड़ों में जुड़ती रहेंगी नई मौतें.

वीडियो: युवराज से पहले नोएडा के उसी गड्ढे में गिरे ट्रक चालक ने क्या बताया?

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