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ईरान में खामेनेई जनाजा: जिस 'कमांडर' को भारत ने तेहरान भेजा, उससे अमेरिका-इजरायल क्यों चौंक गए?

Ayatollah Ali Khamenei funeral: ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के जनाजे में शामिल होने गए भारतीय दल में जनरल सैयद अता हसनैन को भेजने के पीछे भारत का क्या कूटनीतिक संदेश छिपा है. भारत-इजरायल रिश्तों और चाबहार पोर्ट पर इसका क्या असर होगा.

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तेहरान में भारत की इस चाल ने सबको हिला दिया (फोटो- AFP)

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  • अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु के बाद ईरान की 'असेम्बली ऑफ एक्सपर्ट्स' ने उनके पुत्र मोजतबा खामेनेई को नया सर्वोच्च नेता चुना है, जो ईरान की सैन्य और राजनीतिक विरासत संभालेंगे।
  • अयातुल्ला खामेनेई के निधन और क्षेत्रीय तनाव के बीच ईरान के रूढ़िवादी गुट ने नए नेता के चयन से देश की स्थिरता बनाए रखने और अमेरिकी प्रभाव को रोकने की कोशिश की है।
  • भारत ने खामेनेई के अंतिम संस्कार में बिहार के राज्यपाल सैयद अता हसनैन सहित एक मध्य स्तर का डिप्लोमेटिक दल भेजकर मध्य पूर्व में अपने रणनीतिक स्वायत्तता और संतुलित नीति का संकेत दिया है।

मिडिल ईस्ट में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रही जंग (US-Israel-Iran War) का अंत हो गया है. वो जंग, जिसका आगाज अमेरिकी हमले में ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला अली खामेनेई (Ayatollah Ali Khamenei) के निधन से हुआ. जो जंग जिसके चलते होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) लंबे समय तक बंद रहा. वो जंग, जिसने भारत समेत पूरी दुनिया को ‘तेल के आंसू’ रुला दिया. वो जंग अब खत्म हो चुकी है. और अब वक्त आ गया ईरान के लोग अपने नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को अंतिम विदाई दें. 

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मौका है खामेनेई के जनाजे का और तेहरान की सड़कों पर लाखों का हुजूम उमड़ रहा है. इसे ईरान के इतिहास का सबसे बड़ा जनाजा कहा जा रहा है. लेकिन इस दुख की घड़ी के बीच दिल्ली से तेहरान के लिए एक खास उड़ान रवाना हो रही है. इस विमान में सवार हैं बिहार के राज्यपाल और रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन और विदेश राज्य मंत्री पबित्र मार्गेरिटा. ‘द लल्लनटॉप’ अपनी रिपोर्ट "अयातुल्ला खामेनेई के अंतिम संस्कार में पीएम मोदी नहीं, बिहार से ये दो लोग जाएंगे" में आपको पहले ही बता चुका है कि ये भारतीय दल भारत सरकार की तरफ से खामेनेई के अंतिम संस्कार में शामिल होने जा रहा है.

अब सवाल ये उठता है कि जब पूरी दुनिया की नजरें इस वक्त ईरान पर टिकी हैं, तब भारत ने अपने इस खास दल को तेहरान क्यों भेजा? खामेनेई के बाद अब मिडिल ईस्ट का ऊंट किस करवट बैठेगा? क्या ईरान में सत्ता की कोई अंदरूनी जंग शुरू होने वाली है? और सबसे बड़ा सवाल ये कि क्या भारत का ये कदम इजरायल और अमेरिका को खटक सकता है? 

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आज की तारीख में मिडिल ईस्ट की इस सबसे बड़ी हलचल और भारत के डिप्लोमैटिक मैसेज को सीधे सादे अंदाज में डिकोड करने की कोशिश करते हैं.

ईरान का नया दौर: मोजतबा खामेनेई के हाथों में कमान

अयातुल्ला अली खामेनेई सिर्फ एक नेता नहीं थे. वो 1989 से ईरान के सर्वोच्च नेता यानी सुप्रीम लीडर थे. ईरान का पूरा सिस्टम अयातुल्ला अली खामेनेई के इर्दगिर्द ही घूमता था. मसला कुछ भी हो, आखिरी फैसला उन्हीं का होता था. सेना से लेकर परमाणु कार्यक्रम तक, सब कुछ उन्हीं के इशारे पर चलता था. उनके जाने के बाद ईरान के सामने सबसे बड़ा सवाल ये था कि इस विशाल ताकत को अब कौन संभालेगा. लेकिन इस सस्पेंस का अंत बहुत जल्द हो गया. ईरान की 88 सदस्यीय मौलवियों वाली ताकतवर संस्था 'असेम्बली ऑफ एक्सपर्ट्स' ने एक निर्णायक वोट के जरिए अयातुल्ला अली खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई (Mojtaba Khamenei) को ईरान का नया और तीसरा सुप्रीम लीडर चुन लिया.

मोजतबा खामेनेई को उनके पिता की विरासत सौंपने का ये फैसला बेहद ऐतिहासिक तो था ही, साथ ही चौंकाने वाला भी था. ऐसा इसलिए क्योंकि 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से ईरान में राजशाही (Dynasty) का हमेशा विरोध किया गया था. लेकिन मौजूदा युद्ध और क्षेत्रीय संकट को देखते हुए ईरान के रूढ़िवादी गुट (Hardliners) और वहां की सबसे ताकतवर मिलिट्री विंग 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) ने मोजतबा के नाम पर मुहर लगा दी. मोजतबा खामेनेई का IRGC और ईरानी खुफिया एजेंसियों के साथ पुराना और गहरा रिश्ता रहा है. उन्हें पर्दे के पीछे से सरकार चलाने का लंबा अनुभव है. 

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मिडिल-ईस्ट की गतिविधियों पर करीबी नजर रखने वाले एक्सपर्ट मानते हैं कि मोजतबा के आधिकारिक रूप से सर्वोच्च नेता बनने के बाद ये साफ हो गया है कि ईरान पश्चिम देशों या इजरायल के सामने झुकने के मूड में बिल्कुल नहीं है. वो खामेनेई की आक्रामक नीतियों को और भी सख्ती से आगे बढ़ाएंगे.

मिडिल ईस्ट मामलों के सीनियर विश्लेषक और ‘ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन’ से जुड़े डॉ. कबीर तनेजा का कहना है, 

मोजतबा खामेनेई का नया सुप्रीम लीडर चुना जाना ये दिखाता है कि संकट के इस दौर में ईरान का रूढ़िवादी और मिलिट्री इस्टेब्लिशमेंट अपनी पकड़ को कमजोर नहीं होने देना चाहता था. मोजतबा के आने से ये तय है कि ईरान अपनी 'एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस' (हमास, हिजबुल्लाह, हूथी) को मिलने वाली मदद और आक्रामक कूटनीति को उसी तेवर के साथ जारी रखेगा, जैसी उनके पिता के समय थी.

भारत का डिप्लोमैटिक बैलेंस: 'रणनीतिक स्वायत्तता' की असली परीक्षा

अब बात करते हैं भारत की. भारत ने इस जनाजे में शामिल होने के लिए जो डेलिगेशन भेजा है, वो अपने आप में बहुत अनोखा है. इस दल में बिहार के राज्यपाल सैयद अता हसनैन शामिल हैं. जनरल हसनैन सिर्फ एक राज्यपाल नहीं हैं, बल्कि वो भारतीय सेना के एक बेहद प्रतिष्ठित रिटायर्ड मिलिट्री कमांडर हैं, जिन्होंने कश्मीर में सेना की कमान संभाली है. इसके साथ ही वो शिया समुदाय से आते हैं और इस संप्रदाय के एक बड़े स्कॉलर भी हैं.

भारत ने जनरल हसनैन को भेजकर एक बहुत बड़ा कूटनीतिक कार्ड खेला है. इस कदम के दो मायने हैं,

  • पहला संदेश ये कि भारत ईरान के शिया नेतृत्व और वहां की जनता की भावनाओं का सम्मान करता है.
  • दूसरा संदेश ये कि भारत ने एक मिलिट्री बैकग्राउंड और धार्मिक समझ रखने वाले व्यक्ति को भेजकर ये जता दिया कि वो ईरान की संवेदनशीलता को कितनी गहराई से समझता है.

डिप्लोमेसी की भाषा में इसे 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) कहते हैं. जिसका सीधा मतलब है कि भारत अपनी विदेश नीति किसी के दबाव में आये बिना खुद तय करता है. एक तरफ भारत की अमेरिका के साथ 'क्वाड' (QUAD) में गहरी साझेदारी है, इजरायल के साथ डिफेंस और टेक्नोलॉजी में अटूट दोस्ती है, तो दूसरी तरफ ईरान के राष्ट्रीय संकट के समय भारत उसके साथ खड़ा दिखाई देता है. ऐसे में भारत किसी एक गुट का हिस्सा बनकर अपनी नीतियों को पूरी तरह उनके पक्ष में नहीं झुका सकता.

सीनियर नेताओं को क्यों नहीं भेजा? झुकाव या संतुलन?

एक सवाल जो इस वक्त गलियारों में तैर रहा है वो ये कि भारत ने किसी बहुत बड़े सीनियर नेता, जैसे विदेश मंत्री एस जयशंकर या राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल को तेहरान क्यों नहीं भेजा? सोशल मीडिया पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या विदेश राज्य मंत्री और एक राज्यपाल को खामेनेई के जनाजे में भेजना भारत के इजरायल के प्रति झुकाव का संकेत है?

इन सवालों के जवाब जानने के लिए हमें कूटनीति के प्रोटोकॉल को समझना होगा. इसे इजरायल की तरफ पूरी तरह झुकना कहना जल्दबाजी होगी, बल्कि ये भारत का एक 'नपा-तुला संतुलन' (Calculated Balance) है.

भारतीय फैसले के मायनेकूटनीतिक नफा-नुकसान
प्रोटोकॉल का पालनविदेश राज्य मंत्री को भेजना अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक आधिकारिक और पर्याप्त प्रतिनिधित्व माना जाता है.
इजरायल-अमेरिका को संदेशबहुत बड़े स्तर के नेता को ना भेजकर भारत ने अपने पश्चिमी पार्टनर्स को ये भी साफ कर दिया कि वो ईरान की हर नीति या उसके 'प्रोक्सी वॉर' का अंधा समर्थक नहीं है.
धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ावजनरल हसनैन को भेजना ये दिखाता है कि भारत इस रिश्ते को सिर्फ सियासी चश्मे से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और शिया समुदाय के जुड़ाव के तौर पर देखता है.

रणनीतिक थिंक टैंक ‘इंडिया मैटर्स’ से जुड़े रोहित शर्मा कहते हैं,

अगर भारत बहुत हाई-प्रोफाइल डेलिगेशन भेजता, तो इस वक्त इजरायल-हमास और इजरायल-हिजबुल्लाह संकट के बीच वाशिंगटन और तेल अवीव में गलत संदेश जा सकता था. इसलिए भारत ने एक बीच का रास्ता चुना, जिससे ईरान का सम्मान भी रह गया और पश्चिमी देशों के साथ भारत के रिश्तों पर कोई आंच भी नहीं आई.

चाबहार पोर्ट और ट्रेड एंगल: क्या रुक जाएंगे प्रोजेक्ट्स?

भारत और ईरान के रिश्तों की सबसे मजबूत धुरी है चाबहार पोर्ट (Chabahar Port). भारत ने इस पोर्ट को विकसित करने के लिए ईरान के साथ 10 साल का एक लंबा समझौता किया है. चाबहार के जरिए भारत, पाकिस्तान को बाईपास करके सीधे अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया (मध्य एशिया) तक अपनी पहुंच बनाता है. इसके अलावा इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) भी इसी रास्ते से होकर गुजरता है.

खामेनेई के जाने के बाद क्या इन प्रोजेक्ट्स पर कोई असर पड़ेगा? इसका जवाब है- नहीं. इसकी वजह ये है कि चाबहार पोर्ट और ट्रेड कॉरिडोर्स सिर्फ किसी एक नेता की पसंद नहीं हैं. ये ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा और उसकी अर्थव्यवस्था के लिए लाइफलाइन की तरह हैं. ईरान इस वक्त गंभीर आर्थिक प्रतिबंधों से जूझ रहा है. ऐसे में भारत जैसे बड़े देश के साथ व्यापारिक रिश्ते बनाए रखना ईरान की मजबूरी भी है और जरूरत भी. सत्ता में चाहे जो भी आए, वो भारत के साथ इन आर्थिक समझौतों को तोड़ना नहीं चाहेगा.

क्षेत्रीय शांति और ईरान का अगला कदम

पूरी दुनिया इस वक्त डरी हुई है कि खामेनेई के बाद मिडिल ईस्ट में हिंसा और ना बढ़ जाए. इजरायल और हमास के बीच जंग पहले से चल रही है. हिजबुल्लाह और हूथी विद्रोही लगातार एक्टिव हैं. ईरान इन सभी ग्रुप्स का सबसे बड़ा मददगार रहा है.

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खामेनेई का जनामा और भारत-ईरान संबंध (GFX-AI)

अगर ईरान के भीतर सत्ता की जंग लंबी खिंचती है, तो हो सकता है कि ईरान का ध्यान कुछ समय के लिए बाहरी मोर्चों से हट जाए. लेकिन अगर वहां का रूढ़िवादी मिलिट्री गुट पूरी तरह हावी हो गया, तो वो अपनी जनता का ध्यान भटकाने के लिए इजरायल के खिलाफ मोर्चा और ज्यादा आक्रामक कर सकता है. भारत के लिए मिडिल ईस्ट में शांति बहुत जरूरी है क्योंकि वहां करीब 90 लाख भारतीय रहते हैं, जो भारत की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देते हैं. भारत की ऊर्जा सुरक्षा (कच्चा तेल) भी इसी इलाके पर निर्भर है.

कूटनीतिक मामलों के जानकार और पूर्व राजनयिक राजबीर सिंह का मानना है, 

भारत की मौजूदगी तेहरान में ये सुनिश्चित करने के लिए है कि आने वाले दिनों में जब मिडिल ईस्ट की नई बिसात बिछाई जाएगी, तब भारत के हितों को कोई नुकसान ना पहुंचे. 

भारत ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर ये साफ कर दिया है कि मिडिल ईस्ट के भविष्य में उसकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

वीडियो: अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में भारत से ईरान कौन जाएगा?

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