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विधवा को 30 साल लड़ना पड़ा केस, अब बीमा कंपनी 9% ब्याज लगाकर 10 करोड़ रुपये देगी

किशोरी लाल शरण गर्ग की मौत 27 मार्च, 1997 को उस समय हुई जब जयपुर से दिल्ली जाते समय उनकी कार की एक ट्रक से आमने-सामने टक्कर हो गई. एक्सीडेंट के समय उनके पास एक नहीं, बल्कि 15 करोड़ रुपये के दो पर्सनल एक्सीडेंट कवर थे.

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10 करोड़ के क्लेम के लिए 3 दशक की लड़ाई

इंश्योरेंस कंपनियों की मनमानी और क्लेम सेटल नहीं करने के तमाम केस आपने देखे होंगे. लेकिन हम आपको आज एक ऐसे केस के बारे में बताएंगे जिसमें क्लेम सेटल होने में पूरे 29 साल लगे हैं. पर्सनल एक्सीडेंट कवर वाले इस केस में अब जाकर राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) ने पीड़ित व्यक्ति की विधवा और उनके परिवार को 10 करोड़ रुपये 9 फीसदी के ब्याज सहित क्लेम सेटेलमेंट के तौर पर देने का आदेश दिया है. ये रकम रोड एक्सीडेंट में मरे जयपुर के व्यापारी के परिवार को यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस (United India Insurance) कंपनी को देनी होगी.

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किशोरी लाल शरण गर्ग की मौत 27 मार्च, 1997 को उस समय हुई जब जयपुर से दिल्ली जाते समय उनकी कार की एक ट्रक से आमने-सामने टक्कर हो गई. एक्सीडेंट के समय उनके पास एक नहीं, बल्कि दो पर्सनल एक्सीडेंट कवर थे. अब जाकर क्लेम सेटल हुआ है.

रोड एक्सीडेंट और 15 करोड़ का विवाद

किशोरी लाल शरण गर्ग के पास 11 फरवरी 1997 से लेकर 10 फरवरी 1998 तक के लिए यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस का 10 करोड़ का पर्सनल एक्सीडेंट कवर था. उनके पास 31 जनवरी 1997 से लेकर 30 जनवरी 1998 तक के लिए नेशनल इंश्योरेंस से भी 5 करोड़ की पॉलिसी थी. एक्सीडेंट में उनकी मौत के बाद दोनों बीमा कंपनियों ने सर्वेक्षकों, जांचकर्ताओं और जासूसी एजेंसियों के माध्यम से व्यापक जांच शुरू की. जांच के बाद दोनों बीमा कंपनियों ने महत्वपूर्ण जानकारी छिपाने के आरोपों, विशेष रूप से पिछले बीमा प्रस्तावों और बीमित व्यक्ति की वित्तीय पृष्ठभूमि के आधार पर क्लेम को रिजेक्ट कर दिया. यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस ने 16 जून 2000 को और नेशनल इंश्योरेंस ने 29 सितंबर 2000 को बीमा के दावों को खारिज कर दिया.

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पत्नी और परिवार का 3 दशक का संघर्ष

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक क्लेम रिजेक्ट होने के बाद मृतक की विधवा पत्नी आशा गर्ग ने राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग में केस किया, जहां आयोग ने यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस के खिलाफ शिकायत को स्वीकार करते हुए 10 करोड़ रुपये का भुगतान और 1 जुलाई, 1997 से लेकर अब तक इस राशि पर 9 प्रतिशत का ब्याज भी देने का आदेश दिया. 2005 के आदेश के मुख्य भाग में कहा गया था, 

"यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को शिकायतकर्ताओं को 9% प्रति वर्ष की दर से ब्याज और 10 करोड़ रुपये की राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया जाता है." 

हालांकि, राष्ट्रीय आयोग ने 5 करोड़ रुपये की पॉलिसी से संबंधित नेशनल इंश्योरेंस के खिलाफ अलग से दायर शिकायत को खारिज कर दिया था. दोनों ही पक्ष इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट ले गए.

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सुप्रीम कोर्ट का सुप्रीम फैसला

दोनों पक्षों ने 2005 के आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी. जनवरी 2017 में, सर्वोच्च न्यायालय ने एनसीडीआरसी के पहले के फैसले को रद्द कर दिया और मामले को राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग को नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस भेज दिया. सर्वोच्च न्यायालय ने आयोग को दोनों बीमा कंपनियों के मंडल, क्षेत्रीय और मुख्यालय कार्यालयों से पॉलिसी प्रपोजल फॉर्म और इंटरनल कम्युनिकेशन के सारे रिकॉर्ड मंगवाने का निर्देश दिया. शीर्ष न्यायालय ने टिप्पणी की, 

"हमारा मानना ​​है कि यह एक उपयुक्त मामला है जिसमें राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग को केवल हलफनामों के आधार पर मामले का फैसला करने के बजाय साक्ष्य दर्ज करने चाहिए थे"

पॉलिसी प्रपोजल का गुम होना मुख्य मुद्दा बन गया

राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग में पुनर्विचार के दौरान शिकायतकर्ताओं ने बार-बार तर्क दिया कि बीमा कंपनी कथित रूप से छिपाए गए या गलत जानकारी वाले असली प्रपोजल प्रस्तुत करने में विफल रही है. राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने पाया कि बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद, बीमा कंपनी प्रपोजल फॉर्म या डिस्पैच रजिस्टर नहीं ढूंढ पाई. नतीजतन जस्टिस एपी शाही और प्रेसीडेंट भारत कुमार पाण्ड्या ने यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस को 10 करोड़ रुपये के क्लेम के साथ 9 फीसदी की दर से ब्याज देने का आदेश दिया है. पीड़ित परिवार के 5 करोड़ वाले नेशनल इंश्योरेंस क्लेम को रिजेक्ट कर दिया गया है.

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