हरीश राणा उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के रहने वाले थे. साल 2013 में वह चंडीगढ़ विश्वविद्यालय में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने गए थे. यूनिवर्सिटी के पास एक पीजी में यानी किराये के कमरे पर रहते थे. बॉडी-बिल्डिंग का शौक था. अपनी फिटनेस को लेकर काफी अलर्ट रहते थे. उनकी जो नीली टी-शर्ट में पुरानी फोटो अब भी सामने आती है, वह बॉडी बिल्डिंग को लेकर उनके शौक के बारे में काफी कुछ कहती है.
हरीश राणा को कैसे दी जाएगी इच्छामृत्यु? क्या मौत आने में वक्त है?
हरीश राणा की मां और उनके पिता ने 13 साल तक अस्पताल के बिस्तर पर कोमा में पड़े अपने बेटे का इंतजार किया. लेकिन अब कोई उम्मीद नहीं है.


अपने मसल और मजबूत बाजुओं को दिखाने वाले 20 साल के इस लड़के की एक और फोटो है जो नई है. शायद 2026 की. इसमें वह अस्पताल के बेड पर हैं. ऐसी गहरी नींद में, जो सालों से नहीं टूटी. बॉडी बिल्डर वाला शरीर एकदम सूख गया है. सिर पर कभी घने बाल थे. अब नहीं हैं. बगल में ही लाल चुन्नी ओढ़े एक महिला खड़ी हैं जो उन्हें बेहद प्यार और ममता से देख रही हैं. वो हरीश राणा की मां हैं. पिछले 13 साल से सोए अपने बेेटे के सिर पर हाथ फेरती हुई उसके जागने का जैसे अभी भी इंतजार कर रही हों. लेकिन अब वो शायद ही जागेगा.
अगस्त 2013 में रक्षाबंधन के दिन हरीश अपनी पीजी की चौथी मंजिल से अचानक नीचे गिर गए. उनके सिर में गंभीर चोटें आई थीं. इस वजह से उनके पूरे शरीर में पैरालिसिस हो गया और वह कोमा में चले गए. उनके शरीर ने हिलना-डुलना बंद कर दिया. उनकी मेडिकल रिपोर्ट्स के मुताबिक पिछले 13 सालों से एक ट्यूब (पाइप) के जरिए उन्हें खाना दिया जाता है. हरीश काफी लंबे समय से बेड पर हैं इसलिए उनके शरीर पर भी घाव हो गए हैं.
हरीश राणा की मां और उनके पिता ने 13 साल तक अस्पताल के बिस्तर पर कोमा में पड़े अपने बेटे के जागने का इंतजार किया. लेकिन अब कोई उम्मीद नहीं है. मां-बाप बूढ़े हो गए हैं और वो अब बार-बार अस्पताल का चक्कर काट नहीं सकते. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाई कि उनके बेटे को ‘गरिमापूर्ण इच्छामृत्यु’ दी जाए. यानी सम्मान से मरने का अधिकार.
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने माता-पिता की बातें सुनीं. डॉक्टरों और अस्पताल से रिपोर्ट्स मंगाईं. जब ये बात पक्की हो गई कि हरीश को बचाने का कोई उपाय नहीं है तो 'पहली बार' भारत में में इच्छामृत्यु की स्वीकृति देने का फैसला सुनाया गया.
विलियम शेक्सपियर के नाटक 'हैमलेट' के मशहूर डायलॉग 'टू बी और नॉट टू बी' को पढ़ते हुए उन्होंने कहा कि कई बार जीवन में इतने संघर्ष होते हैं कि तय करना मुश्किल हो जाता है कि जीवन को ऐसे ही जिया जाए या इसका अंत कर दिया जाए. हरीश के जीवन का अंत कर देने वाला कानूनी आदेश देने के बाद जस्टिस पारदीवाला भी भावुक हो गए.
हरीश को गरिमा के साथ इच्छामृत्यु का कानूनी अधिकार तो मिल गया. अब सवाल है कि डॉक्टर उनके साथ क्या करेंगे? क्या उन्हें एक ही दिन में इस तकलीफदेह जीवन से निजात दे दी जाएगी? ये कैसे किया जाएगा? इंडियन एक्सप्रेस ने इसे लेकर एम्स के डॉक्टरों से बात की. उन्होंने विस्तार से बताया कि ये प्रक्रिया कैसे पूरी की जाएगी.
एम्स में क्या होगा?दिल्ली AIIMS की पूर्व प्रमुख और ऑन्को-एनेस्थीसिया और पैलिएटिव मेडिसिन की प्रोफेसर डॉ. सुषमा भटनागर के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हरीश राणा को एम्स के पैलिएटिव केयर यूनिट में रखा जाएगा. यहां मरीज को प्राकृतिक तरीके से मरने दिया जाता है. मृत्यु को न तो लंबा खींचते हैं और न ही उसे जल्दी लाते हैं.
डॉक्टर कहती हैं कि पैलिएटिव केयर और पैसिव यूथेनेशिया दो अलग-अलग चीजें हैं. ‘पैसिव यूथेनेशिया’ का मतलब है कि किसी गंभीर रूप से बीमार या कोमा में पड़े मरीज को वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब या डायलिसिस से हटा दिया जाए. इससे मरीज अपनी बीमारी से स्वाभाविक तौर पर मर जाता है. पैसिव इसलिए है क्योंकि इसमें डॉक्टर सीधे मौत नहीं देते, बल्कि इलाज रोककर मरीज को नैचुरल डेथ के लिए छोड़ देते हैं.
पैलिएटिव केयर क्या है?हरीश राणा का दिल्ली के पैलिएटिव केयर यूनिट में इलाज चल रहा है. ये इलाज ऐसे ही चलता रहेगा, लेकिन सुुप्रीम कोर्ट के इच्छामृत्यु वाले आदेश के बाद उनके ट्रीटमेंट में कुछ बदलाव किए जाएंगे. ये बदलाव पैलिएटिव केयर के सिद्धांतों के अनुसार होंगे. इसमें मरीज की जरूरी देखभाल तो की जाएगी, लेकिन उसे एग्रेसिव ट्रीटमेंट नहीं दिया जाएगा, यानी ऐसा इलाज जो उसकी लाइफ को और लंबा खींचे. हालांकि, इस दौरान डॉक्टर मरीज की मौत के लिए कोई जल्दबादी भी नहीं करेंगे.
हां, उसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर नहीं रखा जाएगा. अगर मरीज को सांस लेने में तकलीफ होती है या उसकी हालत ज्यादा खराब होती है, तब भी उसे वेंटिलेटर या आईसीयू में नहीं रखा जाएगा. उसे दर्द होगा तो उसका इलाज किया जाएगा. उसकी सामान्य देखभाल भी की जाएगी. उसके बेड की साफ-सफाई. उसकी खुद की भी साफ-सफाई चलती रहेगी, जिसके लिए एक नर्स को यूनिट में रखा जाएगा. मरीज को दवाएं भी दी जाती रहेंगी, लेकिन अगर हालत ज्यादा बिगड़ती है तो उसे बचाने के कोई जतन नहीं किए जाएंगे.
मरीज के बार-बार खून की जांच जैसे टेस्ट या एक्सरे नहीं किए जाएंगे. पैलिएटिव केयर यूनिट में इसकी कोई जरूरत नहीं होती. मरीज को खाना भी तुरंत बंद नहीं किया जाएगा. यह धीरे-धीरे होगा और कब खाना बंद कर देना है, इसका अंतिम फैसला ट्रीटमेंट कर रही टीम का होगा.
कब तक जिंदा रहेंगे राणा?ये कहना मुश्किल है. डॉ. भटनागर कहती हैं कि हर मरीज अलग होता है. हरीश राणा अभी काफी युवा हैं. ऐसे में उनकी मृत्यु में कुछ समय लग सकता है. ठीक ठीक टाइम नहीं बताया जा सकता कि कब उनकी मौत होगी.
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