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किरायेदार ने मालकिन के नाम पर 18 करोड़ का लोन ले लिया, पता तब चला जब घर खाली कर गया

Delhi में एक किरायेदार ने मकान मालिकन के डॉक्यूमेंट्स का ऐसा इस्तेमाल किया कि उनके नाम पर 18 करोड़ रुपये का लोन ले लिया. और उन्हें खबर तक नहीं लगी. पुलिस ने जांच-पड़ताल के बाद एक आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है. कैसे हुआ यह फर्जीवाड़ा, सब जानिए.

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पुलिस ने इस मामले में एक आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है. (सांकेतिक फोटो: AI)

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  • दिल्ली के विवेक विहार में किरायेदार सचिन ने मकान मालिक उषा रानी सेठी के नाम से 18 करोड़ रुपये का फर्जी कर्ज लिया, जिसके मामले में एक आरोपी गिरफ्तार और एक फरार है।
  • इस धोखाधड़ी के पीछे किराए के अनुबंध उपयोग कर और फर्जी दस्तावेजों के जरिए कर्ज लेने की योजना थी, जिसमें तीन अलग-अलग महिलाओं के दस्तावेजों का गलत इस्तेमाल हुआ।
  • पुलिस जांच में फर्जी कंपनियों के जरिए लोन की रकम निकाली गई, और CBI ने आरोपी संजीव दीक्षित को जेल में भेजा, जबकि मुख्य आरोपी सचिन की तलाश जारी है।

राजधानी दिल्ली में एक किरायेदार ने अपनी मकान मालिकन को करोड़ों का चूना लगा दिया. आरोपी ने पहले महिला का फ्लैट किराए पर लिया, फिर उनके नाम का इस्तेमाल कर 18 करोड़ रुपये का कर्ज ले लिया. यह सब उसने पूरी प्लानिंग के साथ किया. जब महिला को इस बारे में पता चला तो उनके होश उड़ गए. पुलिस ने इस मामले में एक आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि एक अब भी फरार है. 

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क्या है पूरा मामला?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यह जून 2012 की बात है. ईस्ट दिल्ली के विवेक विहार में रहने वाली उषा रानी सेठी (55) अपने फ्लैट्स के लिए किराएदार ढूंढ रही थीं. अधिकारियों के मुताबिक, सचिन और संजय नाम के दो लोगों ने उनसे संपर्क किया. सचिन ने खुद को मेटल ट्रेडिंग कंपनी 'जगदंबा मेटल्स' का मालिक बताया और कहा कि संजय उसका साथी है. उषा ने पुलिस को बताया, 

“मैंने दूसरी मंजिल वाला फ्लैट सचिन को लगभग 47,000 रुपये में, जबकि तीसरी मंजिल वाला छोटा फ्लैट संजय को 17,000 रुपये में किराए पर दिया था. किराए के एग्रीमेंट सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में रजिस्टर कराए गए थे. कुछ समय बाद, वे दोनों चले गए.”

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इसके बाद अप्रैल 2013 में सुप्रीम कोर्ट के दो वकील उनके घर आए. उन्होंने बताया कि उषा ने अपने फ्लैट्स के बदले पंजाब एंड सिंध बैंक से 70 लाख रुपये का लोन लिया था और बकाया रकम नहीं चुकाई थी. 

पुलिस ने क्या बताया?

उषा पुलिस के पास गईं. जांच में पुलिस को पता चला कि उनके नाम और दस्तावेजों का इस्तेमाल करके सिर्फ 70 लाख नहीं, बल्कि कुल 18 करोड़ रुपये का लोन लिया गया था. यह पैसा 11 शेल कंपनियों (फर्जी कंपनियों) के जरिए घुमाया गया और फिर निकाल लिया गया. एक पुलिस अधिकारी ने कहा, 

“आरोपियों ने दावा किया कि उषा ने प्रॉपर्टी का मालिकाना हक आरोपी सचिन को ट्रांसफर कर दिया था. उन्होंने लोन लेने के लिए उषा के नाम वाले डॉक्यूमेंट्स दिखाए थे."

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इस फर्जी मालिकाना हक के आधार पर आरोपियों ने बैंक को विश्वास दिलाया कि अब फ्लैट सचिन का है. बैंक ने इसी प्रॉपर्टी की गारंटी पर लोन दे दिया. 

आरोपियों ने ऐसे किया 'फर्जीवाड़ा' 

उषा ने जब डॉक्यूमेंट्स देखे और पाया कि डॉक्यूमेंट्स में उनके नाम का एक PAN कार्ड भी था, लेकिन उनकी तस्वीर अलग थी. सिग्नेचर भी उनके नहीं थे. रिपोर्ट के मुताबिक, जब पुलिस अधिकारी सब-रजिस्ट्रार के ऑफिस गए, तो उन्हें बताया गया कि उषा नाम की एक महिला ने ऑफिस आकर डॉक्यूमेंट्स जमा किए थे. 

अधिकारियों को पता चला कि उस महिला की ही फोटो पैन कार्ड पर थी, लेकिन वो उषा रानी सेठी नहीं थीं. यानी जो महिला ऑफिस गई थी, वह कोई और थी. तीनों महिलाएं अलग-अलग थीं. एक सीनियर अधिकारी ने कहा, 

“आरोपी ने ओडिशा की एक दूसरी उषा रानी सेठी का पैन कार्ड हासिल कर लिया. इस महिला का उषा से कोई लेना-देना नहीं था. फिर उन्होंने एक दूसरी महिला को काम पर रखा जो उषा बनकर सब-रजिस्ट्रार ऑफिस गई.”

अधिकारियों ने बताया कि सचिन का उषा के फ्लैट में रहने का कोई इरादा नहीं था. वह बस एक रेंट एग्रीमेंट चाहता था ताकि उसे प्रॉपर्टी और उषा की जानकारी मिल सके. ताकि इसका इस्तेमाल वह बाद में लोन लेने के लिए कर सके. 

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पुलिस ने ऐसे किया खुलासा

जब पुलिस ने मालिकाना हक देखा, तो प्रॉपर्टी सचिन के नाम ट्रांसफर की गई थी. इसके अलावा उसने और उसके साले संजीव दीक्षित ने 'जगदंबा मेटल्स' के नाम पर कुल 18 करोड़ रुपये का लोन लिया था. दिल्ली पुलिस की इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (EOW) की एक टीम ने डॉक्युमेंट्स की दोबारा जांच शुरू की. कई महीनों की जांच के बाद पता चला कि संजीव दीक्षित के कई दूसरे फर्जी नाम थे. एक पुलिस अधिकारी ने बताया, 

"2011 में CBI ने संजीव के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया था. वह 10 अन्य मामलों में भी शामिल था, जिनमें CBI और ACB के पास 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम' के तहत दर्ज मामले भी शामिल हैं." 

2017 में उत्तर प्रदेश पुलिस ने संजीव दीक्षित को एक दूसरे मामले में गिरफ्तार किया था. कोर्ट में पेशी के लिए ले जाते समय वह भागने में कामयाब हो गया. भारत के अलग-अलग शहरों में लगभग एक दशक तक छिपने के बाद, इस साल जनवरी में CBI ने उसे फिर से गिरफ्तार किया और तिहाड़ जेल भेज दिया. 25 जून को उसे दोबारा औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया.

बता दें कि अगर कोई व्यक्ति पहले से जेल में है और किसी दूसरी एजेंसी को किसी दूसरे केस में उसकी गिरफ्तारी दिखानी होती है, तो कोर्ट की इजाजत लेकर उसे ‘फॉर्मल अरेस्ट’ किया जाता है. वहीं, सचिन की तलाश अभी भी जारी है. पुलिस ने इस मामले में संजय के शामिल होने की पुष्टि नहीं की है.

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