‘हमारे सुपरवाइजर हमें पानी भी नहीं पीने देते. वे कहते हैं कि अगर तुम पानी पियोगी, तो तुम्हें बाथरूम (टॉयलेट) जाना पड़ेगा, और फिर बाथरूम जाने में तुम्हारे 5-10 मिनट खराब हो जाएंगे. वे बस हमसे जबरदस्ती काम करवाते हैं, और हम डर के मारे वह काम करते हैं.’
'पानी पियोगी तो बाथरूम जाओगी', भीषण गर्मी में काम करने वाले मजदूरों का दर्द
Labour Working Conditions: भीषण गर्मी (Hot Weather) में जब एक मजदूर सुबह घर से निकलता है, तो रात की तपिश पहले ही उसका 'खून-पानी' सुखा चुकी होती है. यह तब है जब उसे अगले 12 घंटे झुलसाने वाली गर्मी में मजदूरी या सामान की डिलीवरी करते हुए बिताने हैं.


ये कहना है दिल्ली की एक फैक्टरी में काम करने वाली आरती का. भीषण गर्मी और चिलचिलाती धूप में जब मजदूर को ऐसे हालात में काम करने के लिए मजबूर किया जाए, तो वो शौच तो क्या, आने वाली बीमारी को भी दूर भगाने का जुगाड़ भिड़ा दे. बीमार पड़ा, तो बिस्तर पर पड़ेगा. बिस्तर पर पड़ेगा, तो दिहाड़ी छूटेगी. दिहाड़ी छूटेगी, तो इलाज और खाने का पैसा कहां से आएगा. तो बीमार होने का भी स्कोप नहीं बचता.
भारत में ज्यादातर मजदूर और कमजोर वर्ग को अक्सर ऐसे ही हालात का सामना करना पड़ता है. अमेरिका बेस्ड पीपल्स करेज इंटरनेशनल (PCI) की मई 2026 की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि दिल्ली में 90 फीसदी प्रवासी मजदूरों का मानना है कि भीषण गर्मी और ज्यादा तापमान उनकी लाइफ पर बहुत बुरा असर डालते हैं.
यह रिपोर्ट साउथ और साउथ-ईस्ट एशिया के पांच शहरों- दिल्ली (भारत), काठमांडू (नेपाल), ढाका (बांग्लादेश), जकार्ता (इंडोनेशिया) और क्यूजोन (फिलीपींस) में भयंकर गर्मी और झुलसाने वाले तापमान में मजदूरों के कामकाजी हालात पर रोशनी डालती है. हमारा फोकस दिल्ली के हालात पर है.

दिल्ली और उत्तर भारत भयंकर गर्मी की चपेट में हैं. दिन में 45 डिग्री सेल्सियस का तापमान झेलना पड़ रहा है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) मौसम के मिजाज को देखते हुए वार्निंग और अलर्ट जारी कर रहा है. दिल्ली में जब एक सामान्य मजदूर सुबह घर से निकलता है, तो रात की तपिश पहले ही उसका 'खून-पानी' सुखा चुकी होती है. यह तब है जब उसे अगले 12 घंटे झुलसाने वाली गर्मी में मजदूरी या सामान की डिलीवरी करते हुए बिताने हैं.

तेज गर्मी में मजदूर छत की छांव में काम करे या खुली धूप में, चुनौती दोनों तरफ है. खासकर कंस्ट्रक्शन के काम में. दो दशक पहले राजस्थान से दिल्ली काम करने आए जय सिंह बताते हैं,
"जब हमें काम मिलता है, तो वह बाहर और अंदर दोनों जगह होता है. बाहर काम करना मुश्किल हो जाता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सीधी धूप लगती है. हालांकि, अंदर काम करने पर भी हमें दिक्कत होती है क्योंकि आमतौर पर पंखा नहीं होता. खासकर अगर कोई नई कंस्ट्रक्शन साइट हो, तो हमारे लिए पंखा कौन लगाएगा? अंदर भी हमें गर्मी लगती है. दम घुटता है. हम फंसा हुआ महसूस करते हैं. जब हमें प्यास लगती है, तो आस-पास पानी नहीं होता. अगर हम पेशाब करना चाहते हैं, तो कोई सही जगह नहीं होती. वे हमसे कहते हैं, ‘यहां मत करो’, लेकिन हम और कहां जा सकते हैं? इसलिए हमारे पास कोई चारा नहीं है."
उन्होंने एक हेल्थ प्रॉब्लम याद की जो उन्हें बहुत ज्यादा गर्मी के दौरान हुई थी. जिसे ठीक करने का उनके पास कोई तरीका नहीं था. जय सिंह बोले,
"पहले मैं धरमपुर में काम करता था, बहुत ज्यादा गर्मी में काम करने की वजह से मेरे शरीर में खून का थक्का जम गया. उन्होंने मुझे कोल्ड ड्रिंक, पानी और नारियल पानी पीने को कहा. लेकिन नारियल पानी की कीमत 50 रुपये थी. मैं वह नहीं खरीद सकता था."

सीमा भी अपने पिता के साथ दो दशक पहले दिल्ली आई थीं. अब वे एक दिहाड़ी मजदूर हैं. सीमा कहती हैं,
“गर्मी में सब कुछ बिगड़ जाता है. सिरदर्द, बवासीर, सब कुछ गर्मी की वजह से होता है. लेकिन हमारे पास ज्यादा पैसे नहीं हैं. अगर हम प्राइवेट हॉस्पिटल जाते हैं, तो डॉक्टर को दिखाने में ही 500-700 रुपये लग जाते हैं. कुछ जगह पर तो इससे भी ज्यादा पैसे लगते हैं. अगर आप झोलाछाप डॉक्टरों के पास जाते हैं, तो ज्यादा इन्फेक्शन का खतरा रहता है. अगर मुझे सरकारी हॉस्पिटल में इलाज नहीं मिलता, तो मैं मेडिकल शॉप से दवा खरीदती हूं. पैसे नहीं होते, तो मैं पड़ोसियों से उधार लेती हूं.”
PCI ने भारत में 'माइग्रेंट्स रेजिलिएंस कोलैबोरेटिव' (MRC) के साथ मिलकर दिल्ली में काम कर रहे मजदूरों से बात की. उन पर बहुत ज्यादा गर्मी के असर के बारे में जो बातें सामने आईं, वे बहुत चिंताजनक हैं.
- 90% की लाइफ पर ज्यादा गर्मी का बुरा असर.
- 77% को सेहत से जुड़ी दिक्कतें.
- 50% को खाने-पीने की चिंता.
- 41% का काम की जगह पर आने-जाने का रूट खराब.

मजदूरी पर असर
- 81% की मजूदरी छूटी.
- 61% की मजदूरी में कटौती.
- 34% की नौकरी/मजदूरी खत्म.
गर्मी से सिर्फ मजदूर परेशान नहीं हैं. कई अच्छे मालिक और एम्प्लॉयर्स भी अपनी पूरी कोशिशों के बावजूद अपने मजदूरों और कर्मचारियों के लिए ज्यादा कुछ नहीं कर पाते. मजदूरों की प्रोडक्टिविटी में कमी और इंफ्रास्ट्रक्चर की दिक्कतों (जैसे बिजली कटौती) से उन्हें भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.
सरकारों, एम्प्लॉयर्स और कम्युनिटीज को मिलकर हीट गवर्नेंस को मजबूत करना होगा, ताकि मजदूरों समेत सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाया जा सके. हीट एक्शन प्लानिंग में मजदूरों की सुरक्षा को भी शामिल करने के लिए काम करना होगा.
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