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MCD ने कहा- गाय के गोबर के उपलों से अंतिम संस्कार करें, अब एक्सपर्ट बोले- 'प्रदूषण बढ़ सकता है'

दिल्ली MCD का कहना था कि उपले जलाने से प्रदूषण को कम करने में मदद मिलेगी. लेकिन अब विशेषज्ञों ने इस बात से ना-इत्तिफाकी जाहिर की है. एक वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर चेतावनी दी गई है कि गोबर के उपले जलाने से प्रदूषण और बढ़ सकता है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर.

दिल्ली नगर निगम (MCD) ने बीते दिनों यह फैसला लिया था कि अब नगर निगम के श्मशान घाटों में लकड़ी की जगह गाय के गोबर के उपलों का इस्तेमाल किया जाएगा. इसके पीछे दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण का हवाला दिया गया था. दावा था कि इससे प्रदूषण को कम करने में मदद मिलेगी. लेकिन अब विशेषज्ञों ने इस बात से ना-इत्तिफाकी जाहिर की है. एक वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर चेतावनी दी गई है कि गोबर के उपले जलाने से प्रदूषण और बढ़ सकता है.

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न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में जर्नल पार्टिकल ऐंड फाइबर टॉक्सिकोलॉजी में छपी एक स्टडी का हवाला दिया गया है. इसके मुताबिक, गाय के गोबर के कंडे जलाने पर लकड़ी की तुलना में ज्यादा प्रदूषक यानी पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5 और PM10), वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड और ब्लैक कार्बन निकलते हैं.

स्टडी में कहा गया है कि जिन घरों में गोबर जैसे बायोमास का इस्तेमाल किया जाता है, वहां हवा में प्रदूषित कणों की मात्रा उन घरों की तुलना में बहुत ज्यादा होती है, जहां इनका इस्तेमाल नहीं होता. इसकी वजह से 24 घंटे में PM10 का स्तर 200 से 5,000 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक पहुंच सकता है. यह 150 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर की सुरक्षित सीमा से कई गुना ज्यादा है. ये कण सांस के लिए बहुत नुकसानदायक होते हैं और सांस से जुड़ी दिक्कतें पैदा कर सकते हैं.

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गुरुवार 27 नवंबर को MCD के पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेंट ने इस विषय पर बैठक बुलाई थी. बैठक में यह चर्चा हुई कि शहर में बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए श्मशान घाटों में लकड़ी जलाना बंद कर दिया जाए और उसकी जगह गाय के गोबर के उपलों का इस्तेमाल किया जाए. रिपोर्ट में बैठक में मौजूद एक सदस्य के हवाले से लिखा गया कि नगर निगम ने लकड़ी जलाने से लोगों को रोकने का फैसला किया है.

दिल्ली के निगम बोध श्मशान घाट और पंचकुइयां रोड श्मशान घाट में पहले से ही ऐसे तरीके अपनाए जा रहे हैं. ये श्मशान घाट लकड़ी के इस्तेमाल को कम करने के लिए गाय के गोबर के उपले और लकड़ियां भी देते हैं. लेकिन सिर्फ गाय के गोबर के कंडों से दाह संस्कार अभी कहीं भी नहीं हो रहे.

वहीं, पर्यावरणविद विमलेंदु झा का कहना है कि दाह संस्कार और उससे होने वाले एमिशन के मामले में सबसे बेहतर विकल्प इलेक्ट्रिक चिताएं हैं. उन्होंने सुझाव दिया कि कुछ परंपरागत प्रथाओं से हटकर आधुनिक और सुरक्षित विकल्प अपनाने होंगे, ताकि ज्यादा जागरूक और प्रभावी फैसले लिए जा सकें. 

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