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"लिव-इन में पुरुषों को गलत सजा मिल जाती है", इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रद्द की रेप की सजा

कोर्ट ने सभी सजाएं रद्द कर युवक को रिहा करने का आदेश दिया.

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कोर्ट ने कहा कि आरोपी अगर किसी अन्य मामले में वांछित/जुड़ा हुआ नहीं है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए. (सांकेतिक फोटो- freepik)

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में एक युवक की रेप और अपहरण की सजा को रद्द कर दिया है. कोर्ट ने टिप्पणी की कि आजकल युवा पश्चिमी विचारों के प्रभाव में बिना शादी के लिव-इन रिलेशनशिप में रहने लगे हैं, और जब ऐसे रिश्ते टूटते हैं तो लड़कियां शिकायत दर्ज कराती हैं. कोर्ट का कहना है कि रेप, अपहरण जैसी धाराएं महिलाओं के पक्ष में बनाई गई थीं, उस समय लिव-इन रिलेशनशिप का कॉन्सेप्ट अस्तित्व में ही नहीं था. इसलिए ऐसे मामलों में पुरुषों को गलत तरीके से सजा मिल जाती है.

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इंडियन एक्सप्रेस में छपी भूपेंद्र पांडे की रिपोर्ट के मुताबिक ये मामला उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले का है. अगस्त 2021 में एक दलित लड़की की मां ने शिकायत की थी कि फरवरी 2021 में 27 वर्षीय एक OBC युवक उनकी बेटी को बहला-फुसलाकर अगवा कर लिया था. आरोप था कि युवक ने शादी का वादा किया, लेकिन उसके साथ लिव-इन में रखा और बाद में अगस्त 2021 में घर से निकाल दिया. लड़की की उम्र आधिकारिक डॉक्यूमेंट्स में 1 जनवरी 2003 बताई गई थी. लेकिन कोर्ट ने सीएमओ महाराजगंज की उम्र प्रमाणपत्र के आधार पर उसे घटना के समय करीब 20 वर्षीय माना.

ट्रायल कोर्ट ने मार्च 2024 में युवक को दोषी ठहराया और IPC की धारा 363, 366 के तहत 7 साल, 323 के तहत 1 साल, POCSO एक्ट की धारा 6 के तहत 20 साल और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(2)(v) के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई.

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बेंच ने क्या कहा?

हाईकोर्ट में जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस प्रशांत मिश्रा की डिवीजन बेंच ने अपील पर सुनवाई की. कोर्ट ने पाया कि लड़की ने खुद घर से भागकर युवक के साथ जाने की बात कही. दोनों 6 महीने तक सहमति से साथ रहे, साथ गोरखपुर से बैंगलोर तक यात्रा की, शारीरिक संबंध बनाए और लड़की गर्भवती भी हुई. कोई जबरदस्ती या अपहरण का सबूत नहीं मिला. कोर्ट ने कहा कि लड़की ने कभी बलात्कार या जबरन संबंध का आरोप नहीं लगाया.

कोर्ट ने आगे बताया,

“ये मामला युवाओं में बढ़ते लिव-इन रिलेशनशिप का उदाहरण है. रिश्ता टूटने पर शिकायत हो जाती है और महिलाओं के पक्ष वाली पुराने कानूनों के कारण पुरुष दोषी ठहराए जाते हैं, जबकि तब लिव-इन का कॉन्सेप्ट नहीं था.”

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कोर्ट ने लड़की की उम्र को 18 साल से ज्यादा माना, इसलिए POCSO लागू नहीं होता. सहमति से संबंध होने से बलात्कार (धारा 376) का आरोप भी गलत है. अपहरण (363, 366) भी नहीं बनता क्योंकि लड़की स्वेच्छा से गई थी. एससी/एसटी एक्ट की सजा भी इसलिए रद्द क्योंकि वो अन्य धाराओं पर 10 साल से अधिक सजा पर निर्भर है. धारा 323 भी परिवार के सदस्यों पर थी, युवक पर नहीं.

कोर्ट ने सभी सजाएं रद्द कर युवक को रिहा करने का आदेश दिया. बेंच ने कहा,

“ऊपर बताए गए कारणों से ट्रायल कोर्ट का फैसला और आदेश सही नहीं ठहरता. इसलिए उस आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया जाता है.”

कोर्ट ने कहा कि अपील करने वाला वर्तमान में जेल में है. और निर्देश दिया कि अगर वो किसी अन्य मामले में वांछित/जुड़ा हुआ नहीं है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए.

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