बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने महाराष्ट्र सरकार को फटकार लगाई है. अदालत ने कहा कि जब महाराष्ट्र सरकार ‘लाडकी बहिन योजना’ जैसी योजनाओं पर पैसा खर्च कर रही है, तो वह उन संस्थानों को फाइनेंशियल मदद देने से मना नहीं कर सकती, जो जरूरतमंद बच्चों की देखभाल करते हैं. बेंच ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह चिल्ड्रन होम चलाने वाले एनजीओ को सैलरी देने के लिए छह महीने के अंदर एक पॉलिसी बनाए.
लाडकी बहिन योजना को पैसा दे रहे, तो जरूरतमंद बच्चों को इनकार नहीं कर सकते: बॉम्बे हाई कोर्ट
Bombay High Court की औरंगाबाद बेंच ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार ‘लाडकी बहिन योजना’ जैसी योजनाओं पर पैसा खर्च कर रही है. लेकिन वह उन संस्थानों को फाइनेंशियल मदद देने से मना नहीं कर सकती, जो जरूरतमंद बच्चों की देखभाल करते हैं.


इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, औरंगाबाद बेंच ने यह फैसला उन याचिकाओं पर सुनाया, जो गैर सरकारी संगठनों (NGOs) के कर्मचारियों ने दायर की थीं. ये संगठन सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट और महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट एक्ट के तहत बनाए गए हैं और चिल्ड्रन होम्स चलाते हैं. याचिकाकर्ताओं की तरफ से पेश अधिवक्ता एन. पी. पाटिल ने कहा कि चूंकि सरकार सैलरी नहीं दे रही, इसलिए NGO कर्मचारियों को हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाने के लिए मजबूर होना पड़ा.
उन्होंने कहा कि पिटीशनर्स कोर्ट से यह निर्देश चाहते हैं कि उनकी सेवा शर्तों को राज्य सरकार के कर्मचारियों के बराबर लाया जाए. वे अपॉइंटमेंट की तारीख से अपनी सैलरी जारी करने की मांग कर रहे हैं.
कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह छह महीने के भीतर एक सही पॉलिसी बनाए. ताकि उन योग्य एनजीओ को वेतन दिया जा सके जो जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत चिल्ड्रन होम चलाते हैं. जस्टिस किशोर सी. संत और सुशील एम. घोडेस्वार की बेंच ने कहा,
“संसाधनों का ऐसा बंटवारा आर्टिकल 14 की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए. बच्चों की भलाई, शिक्षा और रिहैबिलिटेशन को प्राथमिकता देना राज्य की संवैधानिक ज़िम्मेदारी है. ऐसा न करने पर जुवेनाइल जस्टिस कानून का मकसद ही खत्म हो जाएगा और समाज का बड़ा हित गंभीर रूप से खतरे में पड़ जाएगा. हमें उम्मीद और भरोसा है कि राज्य सरकार इस मामले में पॉजिटिव कदम उठाएगी.”
बेंच ने साउथ अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला की बात दोहराई,
“हमारे बच्चे वो चट्टान हैं जिन पर हमारा भविष्य बनेगा, एक देश के तौर पर हमारी सबसे बड़ी संपत्ति, सेफ्टी और सिक्योरिटी ऐसे ही नहीं मिलती. वे सबकी सहमति और पब्लिक इन्वेस्टमेंट का नतीजा हैं. हम अपने बच्चों को हिंसा और डर से मुक्त जिंदगी देने के लिए जिम्मेदार हैं."
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राज्य सरकार ने क्या कहा?राज्य सरकार ने दावा किया कि अचानक की गई जांचों के दौरान कई संस्थान बिना छात्रों और कर्मचारियों के पाए गए और वे काम भी नहीं कर रहे थे. सरकार ने यह भी कहा कि सिर्फ मान्यता मिल जाने से ही उन्हें वेतन अनुदान (सैलरी ग्रांट) पाने की इजाजत नहीं मिल जाती. जजों ने राज्य सरकार के इस मामले को संभालने के तरीके पर निराशा जताई और मामले को जरूरी अहमियत देने को कहा.
याचिकाओं का निपटारा करते हुए हाई कोर्ट ने सरकार से कहा कि वह हर जिले में वॉलंटरी ऑर्गनाइजेशन द्वारा चलाया जाने वाला कम से कम एक चिल्ड्रन होम बनाए या चुने या पहचाने, जिसमें अच्छी कैपेसिटी, इंफ्रास्ट्रक्चर और काबिल स्टाफ हो.
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