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महिलाओं के लिए दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा के कानून हैं, लेकिन केस झूठा हो तो पुरुष के पास भी हैं विकल्प

पत्नी के खिलाफ अतुल सुभाष के दावों और आरोपों में कितनी सच्चाई है, ये अब कोर्ट में तय होगा. लेकिन उनकी मौत ने दहेज उत्पीड़न कानून के दुरुपयोग से जुड़ी पुरानी बहस को फिर हवा दे दी है.

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अतुल सुभाष केस

अतुल सुभाष सुसाइड केस से दहेज उत्पीड़न के खिलाफ बने कानूनों के दुरुपयोग का मसला एक बार फिर उठ खड़ा हुआ है. बेंगलुरु में इंजीनियर रहे अतुल सुभाष ने अपनी पत्नी पर दहेज उत्पीड़न के नाम पर उनके खिलाफ फर्जी केस करने के आरोप लगाए थे. उन्होंने करीब डेढ़ घंटे के वीडियो में पत्नी निकिता सिंघानिया और उनके परिवार पर कई गंभीर आरोप लगाए और बाद में आत्महत्या कर ली. इसके बाद निकिता और उनके परिवार के लोगों पर FIR दर्ज होने की जानकारी आ रही है.

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पत्नी के खिलाफ अतुल सुभाष के दावों और आरोपों में कितनी सच्चाई है, ये अब कोर्ट में तय होगा. लेकिन उनकी मौत ने दहेज उत्पीड़न कानून के दुरुपयोग से जुड़ी पुरानी बहस को फिर हवा दे दी है. बीते सालों में ये आरोप बार-बार लगा है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों का इस्तेमाल कई बार बेगुनाह लोगों को परेशान करने के लिए किया जाता है. ऐसा देखा गया है कि कभी-कभी पूरा मामला ही झूठा होता है, तो कभी पुरुष पक्ष पर दबाव बनाने के लिए या सिर्फ उन्हें सबक सिखाने के लिए मामले को बढ़ा-चढ़ा के बताया जाता है.

लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि आज भी दहेज के लिए महिलाओं का उत्पीड़न किया जाता है, उनके साथ घरेलू हिंसा होती है और पारिवारिक कलह के चलते वे डिप्रेशन भरी जिंदगी जीती हैं. कई मामलों में महिलाएं अत्याचार नहीं सह पातीं और आत्महत्याएं का रास्ता अपनाती हैं. ऐसे में उनकी सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों की बेशक है. एक नजर उन कानूनों और प्रावधानों पर जिन्हें महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाया गया है. साथ ही ये भी जानेंगे कि इन कानूनों के गलत इस्तेमाल के संंबंध में पुरुषों के पास क्या कानूनी सुरक्षा उपलब्ध है.

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महिलाओं के लिए क्या क़ानून हैं?

दहेज़ उत्पीड़न के मामलों में आम तौर पे ये कानून या प्रावधान पीड़िता की मदद करते हैं-

- धारा 498A IPC (Cruelty): 1983 में भारतीय दंड संहिता, 1860 में एक संशोधन किया गया. इसी संशोधन के तहत धारा 498A को लाया गया. इस प्रावधान के तहत शादीशुदा महिलाओं के साथ होने वाले मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न के मामलों में 3 साल तक की सज़ा, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं. ये एक गैर-जमानती और संज्ञेय अपराध है. भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85 और 86 में भी समान प्रावधान हैं.

- घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (Domestic Violence Act, 2005) 
ये कानून 26 अक्टूबर, 2006 को लागू हुआ था, जो महिलाओं को घरेलू हिंसा के खिलाफ कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है. इसके तहत शारीरिक, मानसिक, सेक्शुअल, आर्थिक और मौखिक शोषण को घरेलू हिंसा माना गया है. पीड़ित महिलाएं घरेलू संबंधों में अपने पार्टनर या उसके परिवार के किसी भी सदस्य के खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकती हैं.

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- दहेज निषेध अधिनियम, 1961 (Dowry Prohibition Act, 1961)
ये अधिनियम दहेज की मांग और इससे जुड़े शोषण को रोकने के लिए बनाया गया था. ये कानून दहेज लेने, देने और इसके लिए उत्पीड़न करने को अपराध मानता है. अगर किसी महिला को दहेज के कारण प्रताड़ित किया जाता है, तो वह इस अधिनियम के तहत रिपोर्ट दर्ज कर सकती है.

- भरण-पोषण (Maintenance) पर कानून
इस मुद्दे पर दो महत्वपूर्ण कानून हैं. हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) की धारा 24 और 25 पति-पत्नी दोनों को विवाह के दौरान या तलाक के बाद भरण-पोषण की मांग करने का अधिकार देती हैं. वहीं, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 किसी भी धर्म की पत्नी, नाबालिग बच्चों और असहाय माता-पिता को भरण-पोषण की मांग का अधिकार देती है, अगर वो खुद की आजीविका चलाने में असमर्थ हैं.

कानूनों का बढ़ता दुरुपयोग, सुप्रीम कोर्ट का बयान

पिछले कुछ सालों मे देखा गया है कि महिलाओं के लिए बनाए गए तमाम कानूनों का काफी दुरुपयोग हुआ है. यहां तक कि कभी-कभी पूरा केस ही मनगढ़ंत होता है, तो कभी परिवार के दूर के रिश्तेदारों को भी जबरन फंसा दिया जाता है. झूठे केस ज़्यादातर धारा 498A से जुड़े होते हैं, क्योंकि ये एक गैर-ज़मानती प्रावधान है. कुछ साल पहले तक इन मामलों में केस होते ही गिरफ़्तारी हो जाती थी, पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से कुछ बदलाव आए हैं.

2014 के सुशील शर्मा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में कोर्ट ने कहा कि 498A के झूठे मामलों के कारण न केवल पीड़ित पुरुष बल्कि उनका पूरा परिवार और समाज भी प्रभावित होता है. कोर्ट ने 498A के दुरुपयोग को रोकने के लिए दिशानिर्देश भी जारी किए. 

इसी साल के एक महत्वपूर्ण केस, अर्नेश कुमार बनाम राज्य बिहार, में कोर्ट ने 498A मामलों में तुरंत गिरफ्तारी को लेकर सख्ती दिखाई और निर्देश दिया कि गिरफ्तारी से पहले पुलिस सही जांच करे. इस आदेश के बाद अब 498A के मामलों में तुरंत गिरफ़्तारी नहीं होती है.

झूठे मामलों में क्या हैं कानूनी विकल्प?

अगर किसी के खिलाफ झूठा मुकदमा दर्ज किया गया है, तो भारतीय कानून इसे चुनौती देने के लिए कई तरीके उपलब्ध कराता है.

- झूठी शिकायत के खिलाफ मामला दर्ज करना
IPC की धारा 211 के तहत कोई व्यक्ति अगर जानबूझकर किसी पर झूठा मामला दर्ज करता है, तो ये साबित होने पर कि शिकायतकर्ता ने निर्दोष व्यक्ति के खिलाफ झूठा मामला दर्ज कराया था, उसे दो साल तक की कैद और जुर्माने की सजा हो सकती थी. BNS की धारा 248 में अब ऐसे मामलों में सजा बढ़कर पांच साल कर दी गई है.

अगर फर्जी मामला किसी ऐसी धारा के तहत किया गया था जिसमें फांसी या आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है, तो फ़र्जी शिकायत करने वाले पर सात साल तक की कैद और जुर्माने की सजा हो सकती थी. BNS की धारा 248 में अब ऐसे मामलों में सजा बढ़कर दस साल कर दी गई है.

- झूठी गवाही और साक्ष्य देना
IPC की धारा 193 कहती है कि अगर किसी व्यक्ति ने न्यायालय में जानबूझकर झूठी गवाही दी है, तो उसे सात साल तक की कैद और जुर्माना भुगतना पड़ सकता था. BNS की धारा 229 में भी मिलता-जुलता प्रावधान है.

- मानहानि का दावा (Defamation under IPC Section 499 और 500)

IPC की धारा 499 और 500 के तहत मानहानि के मामलों में भी राहत मिल सकती थी. यदि झूठे आरोपों के कारण किसी व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है, तो वो इन धाराओं के तहत मानहानि का मुकदमा दर्ज कर सकता था. दोषी पाए जाने पर शिकायतकर्ता को दो साल तक की सजा और जुर्माना भुगतना पड़ सकता था. BNS की धारा 356 में मिलता-जुलता प्रावधान है.

वकीलों के सुझाव

इस मामले में दी लल्लनटॉप ने वकीलों से भी बातचीत की. सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट श्रिया मैनी कहती हैं,

"समाज में एक ट्रेंड बनता जा रहा है की आदमियों के खिलाफ फ़र्ज़ी 498A के मुक़दमे लगाए जा रहे हैं. कई बार इन मामलों में कोई भी प्रूफ नहीं होता. अच्छी बात ये है कि इन मामलों में अब तुरंत गिरफ़्तारी नहीं हो सकती है, जब तक ऐसा बिलकुल सामने से न दिख रहा हो कि लड़की पर किसी तरह की हिंसा या क्रूरता हुई हो."

श्रिया आगे कहती हैं,

"ये ध्यान रखें कि 498A एक क्रिमिनल ऑफेंस है. इस धारा में किए गए केस से पैसे वापस नहीं मांगे जाते. अक्सर लोग डर की वजह से 498A का केस होते ही पैसे देने लगते हैं या फिर मामले को तुरंत सेटल करने की कोशिश में लग जाते हैं. ऐसा न करें. फ़र्ज़ी केस होते ही आपको पहले पुलिस को बताना चाहिए कि आपके खिलाफ ऐसा केस हुआ है और उस केस को लड़ें. कोई पैसे न दें. अगर 498A का केस सिद्ध हो जाता है तो ही आप जेल जाएंगे, वर्ना जेल का अब कोई डर नहीं है."

वहीं दिल्ली हाई कोर्ट के एडवोकेट अनुज चौहान कहते हैं,

“अगर पत्नी द्वारा पति या उसके रिश्तेदारों के खिलाफ झूठी FIR दर्ज कराई जाती है, तो ये जांच की जानी चाहिए कि शिकायत में प्रथम दृष्टया IPC की धारा 498ए के तत्व मिलते हैं या नहीं. पति और उसके रिश्तेदार FIR को रद्द करने के लिए (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की) धारा 528 (पहले CrPC धारा 482) के तहत उच्च न्यायालय जा सकते हैं.”

अनुज बताते हैं कि हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल (1990) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में बताया गया है कि किन कारणें पर FIR रद्द की जा सकती है. उदाहरण के तौर पर, जहां शिकायत में लगाए गए आरोप से प्रथम दृष्टया कोई अपराध नहीं साबित होता या उनके समर्थन में एकत्र किए गए साक्ष्य किसी अपराध के होने का खुलासा नहीं करते हैं तो FIR रद्द की जा सकती है. 

कोर्ट ने ये भी कहा है कि जहां शिकायत में लगाए गए आरोप बेतुके और स्वाभाविक रूप से असंभव हों, जिनके आधार पर कोई भी विवेकशील व्यक्ति कभी भी इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकता है कि आरोपी के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार है, तो भी FIR रद्द की जा सकती है.

इन दिशा-निर्देशों के अलावा, अगर शिकायत में लगाए गए सभी आरोपों का कोई आधार ना बनता हो या वे अस्पष्ट हों, तो भी उच्च न्यायालय FIR को रद्द करने की शक्ति का प्रयोग कर सकता है.

                                              (ये स्टोरी हमारे साथ इंटर्नशिप कर रहे प्रखर ने लिखी है)

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