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बिना तलाक के भी सिंगल मदर बनवा सकती हैं बच्चे का पासपोर्ट, आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट का बड़ा फैसला पढ़ लीजिए

33 साल की शेख शबाना ने अगस्त 2025 में अपनी बेटी के पासपोर्ट के लिए अप्लाई किया था. शबाना 2022 से ही अपने पति से अलग रह रही हैं. उनके बीच घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न के मामले कोर्ट में चल रहे हैं. जब वो पासपोर्ट ऑफिस पहुंचीं, तो अधिकारियों ने उनकी फाइल पर रोक लगा दी.

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सिंगल मदर को बच्चे के पासपोर्ट के लिए पति की मंजूरी की जरूरत नहीं

समाज में अक्सर नियमों की ऐसी दीवारें खड़ी कर दी जाती हैं, जिनसे पार पाना एक आम इंसान के लिए पहाड़ तोड़ने जैसा हो जाता है. खासकर तब, जब मामला सरकारी दफ्तरों और कागजी कार्रवाई का हो. ऐसा ही कुछ आंध्र प्रदेश की एक महिला शेख शबाना के साथ हुआ.

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शबाना अपने पति से अलग रह रही हैं और अपनी चार साल की बेटी के लिए पासपोर्ट बनवाना चाहती थीं. लेकिन पासपोर्ट ऑफिस ने अडंगा लगा दिया कि या तो पति के साइन लाओ या फिर तलाक के कागजात दिखाओ. अब शबाना की लड़ाई कोर्ट पहुंची और आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने जो कहा, वो देश की लाखों सिंगल मदर्स के लिए एक बड़ी राहत बनकर आया है. कोर्ट ने साफ कर दिया कि किसी बच्चे का पासपोर्ट रोकने के लिए पिता की सहमति अनिवार्य नहीं है.

पूरा मामला क्या था

द इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक नेल्लोर की रहने वाली 33 साल की शेख शबाना ने अगस्त 2025 में अपनी बेटी के पासपोर्ट के लिए अप्लाई किया था. शबाना 2022 से ही अपने पति से अलग रह रही हैं. उनके बीच घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न के मामले कोर्ट में चल रहे हैं. जब वो पासपोर्ट ऑफिस पहुंचीं, तो अधिकारियों ने उनकी फाइल पर रोक लगा दी. 

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उनसे कहा गया कि आप सिंगल पैरेंट होने का दावा तो कर रही हैं, लेकिन इसके सबूत के तौर पर तलाक के कागजात या कोर्ट का कोई आदेश लेकर आइये. शबाना का कहना था कि जब वो अलग रह रही हैं और खुद बच्चे की देखभाल कर रही हैं, तो उन्हें इन फालतू की औपचारिकताओं में क्यों उलझाया जा रहा है.

कोर्ट ने पासपोर्ट ऑफिस को क्या समझाया

जस्टिस बट्टू देवानंद की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की. कोर्ट ने बड़ी पते की बात कही कि आज के जमाने में यह सोच पाना भी मुश्किल है कि एक सिंगल पैरेंट, जिसका अपने पार्टनर से कोई संपर्क नहीं है, उसे सिर्फ इसलिए सरकारी सुविधाओं से वंचित रखा जाए क्योंकि उसके पास एक साइन नहीं है. अदालत ने कहा कि पासपोर्ट अथॉरिटी का यह रवैया न केवल गलत है, बल्कि यह उस बच्चे और मां के मौलिक अधिकारों का हनन भी है. संविधान का आर्टिकल 21 हमें गरिमा के साथ जीने और विदेश यात्रा करने का अधिकार देता है. पासपोर्ट ऑफिस अपनी जिद से इन अधिकारों को नहीं छीन सकता.

कानून क्या कहता है और कोर्ट ने क्या दलील दी

पासपोर्ट ऑफिस को लगा कि शायद वो कोई नया नियम मांग रहे हैं, लेकिन कोर्ट ने उन्हें याद दिलाया कि पासपोर्ट नियम 1980 में पहले से ही ऐसी व्यवस्था है. अगर कोई एक पैरेंट दूसरे की सहमति नहीं ले पा रहा है, तो वो शपथ पत्र (एफिडेविट) देकर काम चला सकता है. कोर्ट ने बॉम्बे, तेलंगाना, केरल और मद्रास हाई कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यह कोई अनसुलझा मुद्दा नहीं है. जब कोर्ट पहले ही कई बार कह चुका है कि सिंगल पैरेंट को हक है, तो फिर हर बार नया केस आने का इंतजार क्यों किया जाता है. सरकारी बाबू अपनी नियमावली को संविधान से ऊपर नहीं रख सकते.

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इस फैसले का आम लोगों पर क्या असर होगा

कोर्ट ने पासपोर्ट ऑफिस को आदेश दिया है कि दो हफ्ते के भीतर शबाना की बेटी का पासपोर्ट जारी किया जाए. यह फैसला सिर्फ शबाना के लिए नहीं है, बल्कि उन तमाम महिलाओं और पुरुषों के लिए है जो अकेले अपने बच्चे की परवरिश कर रहे हैं.

कई बार कड़वे रिश्तों की वजह से पति या पत्नी एक दूसरे को परेशान करने के लिए बच्चों के कागजों पर साइन नहीं करते. ऐसे में अब उन्हें दर-दर नहीं भटकना होगा. अगर आप कानूनी तौर पर अलग नहीं भी हुए हैं, तब भी आप जरूरी घोषणा पत्र जमा करके अपने बच्चे का पासपोर्ट बनवा सकते हैं. यह फैसला नौकरशाही की उस सोच पर चोट है जो समाज की बदलती हकीकतों को स्वीकार करने में देरी करती है.

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