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'मेरा धर्म ही सच्चा, ये दावा करना गलत', इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज की पादरी की याचिका

पादरी पर आरोप लगे थे कि वो अपनी प्रार्थना सभाओं में अक्सर यह कहते हैं कि केवल एक ही धर्म सच्चा है, जो कि ईसाई धर्म है. इससे हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं. इसके बाद उनके खिलाफ केस दर्ज हुआ. अब मामला हाईकोर्ट पहुंचा.

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पादरी की याचिका खारिज कर दी है (PHOTO-Wikipedia)

'ये कहना कि सिर्फ मेरा धर्म ही सच्चा है, गलत है.' ये टिप्पणी की है इलाहाबाद हाईकोर्ट ने. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ईसाई पादरी की याचिका को खारिज करते हुए ये टिप्पणी की है. पादरी ने खुद पर लगी चार्जशीट के खिलाफ याचिका दायर की थी. चार्जशीट में पादरी पर जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगा है.

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क्या है पूरा मामला?

ये मामला यूपी के मऊ जिले के मुहम्मदाबाद थाना क्षेत्र का है. मुहम्मदाबाद थाने में 2023 में दर्ज FIR में पादरी पर आरोप लगे थे. कथित तौर पर पादरी अपनी प्रार्थना सभाओं में अक्सर यह कहते थे कि केवल एक ही धर्म सच्चा है, जो कि ईसाई धर्म है. इससे हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं. इसके बाद पादरी ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई कि उसपर लगाए गए आरोप निराधार हैं.

केस पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव की बेंच ने 18 मार्च को पादरी की अर्जी पर सुनवाई की. सुनवाई करते हुए उन्होंने कहा,

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‘भारत एक ऐसी धरती है जहां भारत के संविधान के मुताबिक धर्मनिरपेक्ष स्टेट के तौर पर, सभी धर्मों और मान्यताओं के लोग एक साथ रहते हैं. इसलिए, किसी भी धर्म का यह दावा करना गलत है कि वही एकमात्र सच्चा धर्म है, क्योंकि इसका मतलब अन्य धर्मों का अपमान करना होता है.’

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक बेंच ने अपने आदेश में कहा कि पादरी पर IPC की धारा 295-A लगाई गई है. इस कानून की पहली लाइन ही कहती है कि किसी की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर ठेस पहुंचाने या उनके धर्म या धार्मिक आस्था का अपमान करने पर ये एक्ट लगाया जाता है. अदालत ने कहा कि इसका मतलब है कि याचिकाकर्ता ने जो किया, वो IPC की धारा 295-A के दायरे में आता है. इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता है. पादरी ने फरवरी 2024 में अपने खिलाफ IPC की धारा 295-A के तहत दायर चार्जशीट को चुनौती दी थी. पादरी के मामले पर मई 2024 में स्थानीय अदालत ने संज्ञान लिया था. पादरी ने इसे भी चुनौती दी थी.

उनके वकील ने दलील दी कि पादरी को इस मामले में सिर्फ परेशान करने के लिए झूठा फंसाया गया है, क्योंकि जैसा आरोप लगाया गया है, उन्होंने समाज के हाशिए पर पड़े वर्गों का अवैध रूप से धर्म परिवर्तन कराने या दूसरे धर्मों के खिलाफ बोलने जैसा, कोई अपराध कभी नहीं किया है. यह तर्क भी दिया गया कि जांच के दौरान, इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर (IO) इस नतीजे पर पहुंचे कि पादरी ने कभी भी कोई अवैध धर्म परिवर्तन नहीं करवाया है.

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वकील ने यह तर्क भी दिया कि निष्पक्ष जांच किए बिना, IO ने पादरी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी और स्थानीय अदालत ने उसका संज्ञान ले लिया. पादरी के वकील ने कहा कि ये कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है. उन्होंने मांग की कि चार्जशीट को रद्द कर दिया जाए. हालांकि, सरकारी वकील ने इस मांग का विरोध किया.

जस्टिस श्रीवास्तव की बेंच ने अपने आदेश में ये भी कहा कि संज्ञान लेने या समन जारी करने के लेवल पर, मजिस्ट्रेट से केवल यह अपेक्षित है कि वह रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के आधार पर प्रथम दृष्टया राय दें. उनसे यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह कोई ‘मिनी ट्रायल’ करें या आरोपी के डिफेंस की जांच करें.

वीडियो: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने संभल के अफसरों को क्यों फटकार लगाई?

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