महाराष्ट्र की राजनीति में अगर किसी नेता को जमीन से जुड़ा, सख्त फैसले लेने वाला और पावर सेंटर कहा जाए, तो नाम अपने आप आता है अजित पवार का. समर्थक उन्हें दादा कहते थे और विरोधी मानते थे कि ये आदमी चुपचाप खेल पलट देता है. बारामती से मुंबई तक सत्ता के गलियारों में उनका वजन था.
बारामती के 'दादा', सत्ता के खिलाड़ी, अजित पवार की कहानी जिसने महाराष्ट्र की राजनीति बदल दी
Ajit Pawar Life Journey: अजित पवार महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेता और एनसीपी के प्रमुख चेहरों में रहे हैं. बारामती से कई बार विधायक चुने गए अजित पवार ने सिंचाई, जल संसाधन, वित्त जैसे अहम मंत्रालय संभाले और चार बार महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री रहे. पश्चिम महाराष्ट्र और मराठा राजनीति में उनकी गहरी पकड़ मानी जाती है.
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22 जुलाई 1959. महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के देओलाली प्रवरा, रहूरी तालुका. अनंतराव गोविंदराव पवार के घर एक बेटे का जन्म हुआ. नाम रखा गया अजित.
पवार परिवार वैसे ही राजनीति में जाना पहचाना था. चाचा शरद पवार पहले से ही महाराष्ट्र की राजनीति के बड़े चेहरे बन चुके थे. लेकिन अजित पवार ने सीधे विधानसभा या संसद से शुरुआत नहीं की. उनका रास्ता थोड़ा घुमावदार था.
अजित पवार की राजनीति की पहली सीढ़ी थी सहकारिता. दूध संघ, चीनी मिलें, सहकारी बैंक. 1982 में उन्होंने को ऑपरेटिव शुगर फैक्ट्री के बोर्ड मेंबर के तौर पर कदम रखा. यही वो दौर था जब महाराष्ट्र में सहकारी संस्थाएं राजनीति की नर्सरी हुआ करती थीं. यहीं से नेटवर्क बना, पकड़ बनी और भरोसा पैदा हुआ.
1991 में उन्हें पुणे डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव बैंक का चेयरमैन चुना गया. इसके बाद छत्रपति शुगर फैक्ट्री, बाजार समितियां, एजुकेशनल ट्रस्ट, जिला विकास प्रतिष्ठान. धीरे धीरे अजित पवार बारामती के हर पावर सर्कल में मौजूद हो गए.
बारामती सीट और पवार परिवारबारामती कोई साधारण सीट नहीं है. ये पवार परिवार की सियासी प्रयोगशाला रही है. 1967 से 1990 तक शरद पवार यहां से विधायक रहे. 1991 के बाद ये जिम्मेदारी अजित पवार के पास आई.
1995 में अजित पवार पहली बार बारामती से विधायक बने. उसके बाद 1999, 2004, 2009, 2014, 2019 और 2024. लगातार जीत. इस सीट पर आज तक न बीजेपी जीत पाई, न शिवसेना. कांग्रेस और एनसीपी का ही झंडा यहां फहराता रहा. बारामती में अजित पवार सिर्फ नेता नहीं थे, सिस्टम थे.
पहला मंत्री पद और सत्ता में एंट्री1999 में कांग्रेस और एनसीपी की सरकार बनी. विलासराव देशमुख मुख्यमंत्री बने. यहीं से अजित पवार को पहली बार कैबिनेट मंत्री बनाया गया. उन्हें सिंचाई मंत्रालय मिला.
सिंचाई महाराष्ट्र की सबसे पावरफुल डिपार्टमेंट मानी जाती है. बांध, पानी, किसान, ठेके, सब कुछ यहीं से जुड़ा. अजित पवार ने यहां रहते हुए खुद को हार्ड एडमिनिस्ट्रेटर के रूप में स्थापित किया.
कौन कौन से मंत्रालय संभालेअजित पवार के पास अलग अलग सरकारों में कई अहम विभाग रहे.
- सिंचाई मंत्री
- जल संसाधन मंत्री
- ग्रामीण विकास मंत्री
- वित्त मंत्री
- उप मुख्यमंत्री
खास बात ये थी कि चाहे सरकार किसी की हो, अजित पवार को हमेशा हेवीवेट मंत्रालय ही मिले.
उप मुख्यमंत्री बनने का सफर2010 में कांग्रेस एनसीपी सरकार में अजित पवार पहली बार उप मुख्यमंत्री बने. इसके बाद 2012 में एक कथित घोटाले के चलते इस्तीफा देना पड़ा, लेकिन बाद में एनसीपी ने उन्हें क्लीन चिट दी और सियासी वापसी हो गई.
2019 में अचानक सुबह सुबह उन्होंने बीजेपी के साथ जाकर उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. ये महाराष्ट्र राजनीति का सबसे बड़ा ट्विस्ट था. हालांकि ये सरकार तीन दिन में गिर गई.
2023 में फिर बड़ा धमाका हुआ. एनसीपी टूट गई. अजित पवार अपने समर्थक विधायकों के साथ बीजेपी और एकनाथ शिंदे गुट के साथ चले गए और दोबारा डिप्टी सीएम बने.
शरद पवार से टकराव और एनसीपी पर दावाअजित पवार बनाम शरद पवार. ये सिर्फ चाचा भतीजे की लड़ाई नहीं थी, ये कंट्रोल की लड़ाई थी. अजित पवार का कहना था कि पार्टी अब नई पीढ़ी को सौंपनी चाहिए.
शरद पवार इसे समय से पहले मानते थे.
2023 में एनसीपी दो हिस्सों में बंटी. एक तरफ शरद पवार. दूसरी तरफ अजित पवार. नाम, चुनाव चिन्ह और संगठन पर हक की लड़ाई चुनाव आयोग तक पहुंची. सत्ता के साथ होने की वजह से अजित पवार गुट को बड़ा फायदा मिला.
मराठा राजनीति में क्या मुकाम थामराठा समाज महाराष्ट्र की राजनीति की रीढ़ है. और अजित पवार इस रीढ़ के मजबूत खंभों में से एक थे. पश्चिम महाराष्ट्र, खासकर पुणे, सातारा, सोलापुर बेल्ट में उनका सीधा असर था. किसान, सहकारी संस्थाएं और ग्रामीण वोट बैंक उनके साथ खड़ा रहता था.
मराठा आरक्षण से लेकर ग्रामीण विकास तक, हर बड़े मुद्दे पर उनका स्टैंड असर डालता था.
निजी जीवन30 दिसंबर 1985 को अजित पवार की शादी सुनेत्रा पवार से हुई. दो बेटे. पार्थ पवार खुलकर राजनीति में आए. जय पवार संगठन और रणनीति के काम संभालते रहे. परिवार हमेशा बारामती के इर्द गिर्द केंद्रित रहा.
अजित पवार का जाना और मराठा सियासतअगर अजित पवार जैसा नेता सियासी मंच से हटना मराठा राजनीति पर गहरा असर डालेगा. सबसे बड़ा झटका पश्चिम महाराष्ट्र को लग सकता है.
एनसीपी का पावर स्ट्रक्चर कमजोर होेने का तो डर है ही, साथ ही पूरी मराठा राजनीति में नेतृत्व का खालीपन भी पैदा हो सकता है. ऐसा वैक्यूम रातों रात नहीं भरता.
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आखिर मेंयूनियन से शुरू हुआ सफर. चीनी मिलों से सत्ता तक. बारामती से मंत्रालयों तक. अजित पवार महाराष्ट्र की राजनीति का वो चेहरा थे, जो दिखते कम थे लेकिन फैसलों में भारी रहते थे. उनकी कहानी सत्ता, संघर्ष और रणनीति की कहानी है.
वीडियो: क्या कहानी है उस पुणे लैंड डील की, जिसके तार अजित पवार और उनके बेटे पार्थ से जुड़े


















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