बिहार में एक नाबालिग छात्र को दो महीने से ज़्यादा समय तक जेल में रखा गया. इस मामले पर अब पटना हाईकोर्ट का फैसला आया है. कोर्ट ने बिहार पुलिस की कार्रवाई को ग़ैरक़ानूनी बताया है और राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वो पीड़ित बच्चे को 5 लाख रुपये मुआवज़ा दे. कोर्ट ने बच्चे को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है.
बिना आरोप तय किए नाबालिग बच्चे को 2 महीने जेल में रखा, हाई कोर्ट ने बिहार पुलिस को खूब सुनाया
बिहार में एक नाबालिग बच्चे को गैरकानूनी तरीके से गिरफ्तार कर 2 महीने तक जेल में रखा गया. पटना हाई कोर्ट ने बिहार पुलिस की कार्रवाई पर कड़ी नाराज़गी जताई है और राज्य सरकार को पीड़ित बच्चे को 5 लाख रुपये मुआवज़ा देने का आदेश दिया.


इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, ये मामला बिहार के मधेपुरा ज़िले का है. यहां 23 अक्टूबर 2025 को एक गांव में दो गुटों के बीच झगड़ा हुआ था. इसी मामले में पुलिस ने एक नाबालिग छात्र को गिरफ़्तार कर लिया था. इस केस की सुनवाई जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और रितेश कुमार की बेंच कर रही थी.
कोर्ट ने क्या कहा?
इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट में हैबियस कॉर्पस दायर की गई थी, जिसमें उसे ग़ैरक़ानूनी हिरासत से रिहा करने की मांग की गई. हैबियस कॉर्पस याचिका तब दायर की जाती है जब, किसी व्यक्ति को अवैध हिरासत या गिरफ्तारी से छुड़वाने के लिए आवाज़ उठानी हो.
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक बेंच ने कहा कि नाबालिग की गिरफ्तारी कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना की गई. कोर्ट में बताया गया कि ये गिरफ्तारी DIG के कहने पर हुई, जबकि बच्चे को पहले ही चार्जशीट में बेगुनाह बताया जा चुका था.
हाई कोर्ट ने पुलिस के काम करने के तरीके पर कड़ी नाराज़गी जताई है. कोर्ट ने कहा कि पुलिस की कार्रवाई से नाबालिग की आजादी छीनी गई और उसके जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन हुआ. कोर्ट ने ये भी कहा कि कोशी रेंज के DIG का ये कहना कि आरोपों को सही मानकर जांच की जाए, ‘बेगुनाही की धारणा’ के सिद्धांत के खिलाफ है, जो आपराधिक कानून की बुनियाद है.
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने ये भी आदेश दिया कि 5 लाख रुपये का मुआवज़ा और 15 हज़ार रुपये मुक़दमे का ख़र्च राज्य सरकार देगी. साथ ही अदालत ने ये भी कहा कि प्रशासनिक जांच के बाद जिन पुलिस अधिकारियों की गलती पाई जाएगी, ये रकम उनकी सैलरी से वसूली जाएगी. कोर्ट ने बच्चे को तुरंत रिहा करने का भी आदेश दिया है. हाईकोर्ट ने संबंधित मजिस्ट्रेट की भूमिका पर भी नाराज़गी जताई. इसके अलावा, नाबालिग होने के बावजूद उसे ऑब्ज़र्वेशन होम की जगह जेल भेज दिया गया, जो एक गंभीर चूक है.
पूरा मामला क्या है?
शुरुआत में बच्चे का नाम ज़मीन विवाद और मारपीट से जुड़े एक FIR में दर्ज किया गया था. लेकिन शुरुआती जांच के दौरान जांच अधिकारी को याचिकाकर्ता समेत दस आरोपियों के ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत नहीं मिले. इसके बाद 1 सितंबर 2025 को चार्जशीट दाखिल की गई, जिसमें याचिकाकर्ता का नाम तो शामिल था, लेकिन उस पर कोई आरोप तय नहीं किया गया, इसलिए उसे ट्रायल के लिए नहीं भेजा गया.
इसके बाद शिकायतकर्ता ने सहरसा के कोशी रेंज के DIG से संपर्क किया और याचिकाकर्ता नाबालिग समेत दस आरोपियों को क्लीन चिट दिए जाने की शिकायत की. DIG ने अपनी सुपरविजन नोट में जांच अधिकारी को निर्देश दिया कि आरोपों को सही मानते हुए जांच आगे बढ़ाई जाए और बाकी बचे आरोपियों को गिरफ्तार किया जाए. इसके बाद सीधे आरोपी के घर छापा मारा गया और नाबालिग को गिरफ्तार कर लिया गया. गिरफ्तारी के समय उसकी उम्र 19 साल बताई गई, जबकि वो नाबालिग था. इसके बाद उसे अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.
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