
अंधे बूढ़े का रोल कर रहे हैं संजय मिश्रा
कहानी कुछ यूं है कि चंबल का बीहड़ है. बीहड़ का एक गांव. इस इलाके में पिछले 15 साल से बारिश नहीं हुई है. खेती के नाम पर इलाके में घास भी नहीं उगती. गांव में नॉर्मल मौतें हुए जमाना बीत गया. सब फांसी लगा के मरते हैं. अंधा बुड्ढा भी डरा रहता है. उसका बेटा भी कर्ज में डूबा हुआ है. ग्लोबल वार्मिंग, जिस पर हम रोजाना चुटकुले बनाते हैं, उसी की मारी उन सबकी जिंदगी है. फिल्म में एक लोन रिकवरी एजेंट है. रणवीर शौरी ने ये रोल किया है. ओडिशा साइड का है. इस वजह से बूढ़े बाबा को उनसे थोड़ी जलन भी है. क्योंकि वहां चारों तरफ हरा भरा है. रिकवरी एजेंट ऐसे होते हैं जिनको देखकर किसानों की रूह फना हो जाती है. लेकिन इन बुढ़ऊ से उसकी दोस्ती हो जाती है. बुड्ढा क्लाइमेट चेंज के खिलाफ लड़ता है. फिर जो होता है वो तो सिनेमाघर जाकर ही पता चलेगा.
फिल्म के ट्रेलर लॉन्च पर दृश्यम फिल्म्स ने फिल्म के प्रोड्यूसर मनीष मुंद्रा, डायरेक्टर नील माधव पांडा, संजय मिश्रा और रणवीर शौरी के साथ फेसबुक लाइव किया. उस लाइव में फिल्म के बारे में कुछ खास बातें की गईं. जो हम प्वाइंट में बताते हैं, नोट कर लो.* नील माधव पांडा ने फिल्म आने का आइडिया बताया. कि पहले लोग क्लाइमेट चेंज, ग्लोबल वार्मिंग जैसे भारी भारी शब्द सिर्फ सुनते थे. लेकिन जब 1999 में ओडिशा में भयानक तूफान आया और सब तहस नहस कर दिया तो लोगों की समझ में आया कि ये कितना खतरनाक हो सकता है. वहीं से मेरे दिमाग में आइडिया भी आया. नील माधव खुद ओडिशा के हैं. और फिल्म का रिकवरी एजेंट भी उधर का ही है.

रिकवरी एजेंट और बुढ़ऊ की दोस्ती हो जाती है
* संजय मिश्रा बताते हैं कि ये फिल्म फ्यूचर के लिए की. बच्चों के लिए. बच्चे देखें तो बताएं- माई डैड डिड दिस. रजत कपूर की 'आंखों देखी' करने के बाद मुझे ऐसी फिल्मों के ऑफर मिलने शुरू हुए. नहीं तो पहले 'ढोंढू जस्ट चिल' वाले फालतू कॉमिक रोल्स ही मिलते थे.
* नील माधव बीच में प्रोड्यूसर मनीष का शुक्रिया अदा करते हैं. कहते हैं कि हमारे पास कहानी थी. शानदार एक्टर्स थे. लेकिन इनको एक नाव पर बिठाकर पार ले जाना बहुत कठिन था. ऐसे मौके पर हमको मिले मनीष. जिनकी लगभग हर फिल्म सोशल कॉज से जुड़ी रहती है. जैसे मसान, धनक, न्यूटन और अब कड़वी हवा.
* नील बताते हैं कि फिल्म बनने के दौरान कितनी गर्मी थी. कि संजय अभी शर्ट उतारकर अपनी पीठ दिखाएंगे. पीठ पर वैसे मार्क मिल जाएंगे जैसे पुलिस की मार के बाद मिल जाते हैं. शूट के बाद पांच दिन हॉस्पिटलाइज्ड हुए थे. किसी ने मिनी कूलर गिफ्ट किया था जिस पर लिखा था "दिल दरिया..." आगे समझ जाओ.
* संजय बताते हैं जिस गांव में हम गए थे वो इंसानियत के लिए बिल्कुल ठीक जगह नहीं है. इतने कर्मकांडी आदमी हैं कि सरकार ने बिजली लगाई तो वो खंभा और तार बेचकर खा गए. हमारी क्रेन से 20-20 किलो लोहा निकालकर बेच लिया. इतना मजेदार था.
* रणवीर बताते हैं कि धौलपुर, जहां हम शूटिंग कर रहे थे वहां हम नंगे पैर खड़े भी नहीं हो सकते थे. और बच्चे वहां नंगे पैर खेल रहे थे. मनीष कहते हैं सबसे बड़ी दुख की बात ये है कि यहां कुछ वक्त पहले सब हरा भरा था लेकिन अब नहीं है. जिस नदी में मगरमच्छ होते थे अब उसमें पानी नहीं है.
* संजय मिश्रा बताते हैं बेहद जरूरी बात. कि आजादी के बाद से ही हमको प्रायोरिटी तय करनी चाहिए थी. जाति पाति, भेद भाव बचाना है कि नदी, नाले, पहाड़ और पत्थर बचाने हैं.
तो इतने सारे मैसेजेस और धारदार कहानी, अदाकारी के साथ कड़वी हवा आने वाली है. इसे सांस में भरने के लिए तैयार हो जाइए. ये हमारी फिल्म लाइब्रेरी का हिस्सा होना चाहिए. जुड़वा 2 और गोलमाल 4 साथ एक कड़वी हवा घाटे का सौदा नहीं होगी, यकीन मानिए. अब देखिए ट्रेलर.
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