इसलिए वो कागज पर लिखे अपने किरदार को बारीकी से पढ़ती थीं. वो इच्छुक रहती थीं ये जानने को कि किरदार किस भाव से लिखा गया है. लिखते वक्त लिखने वाले की मनोदशा क्या थी. आर्ट सिनेमा हो या मेनस्ट्रीम एंटरटेनमेंट फिल्म, उन्होंने अपने किरदार के साथ मक्कारी नहीं की. बराबर एनर्जी के साथ डिलिवर किया. उनकी फिल्म ‘बधाई हो’ याद कर लीजिए. जहां उन्होंने दादी का किरदार निभाया. वो दादी जो ‘सेक्सी’ शब्द बोलने पर भी ठहाका लगवा दे. वो दादी जो अपनी बहू को ‘वैध साब की छोरी’ कह कह के ताने कसती. लेकिन समय आने पर बहू की हिमायत भी करती. जरा वो सीन याद कीजिए जब प्रियंबदा बनी नीना गुप्ता के ससुराल वाले उनके प्रेग्नेंट होने पर ताने मारते हैं. तब सुरेखा गरज पड़ती हैं. और उसके ससुराल वालों को एक-एक कर लाइन हाजिर करती हैं. उनका बेटा रोकने आता है. उसे भी झिड़ककर पीछे हटने को कहती हैं. गुस्सा ऐसा फूटता है कि उनका पूरा शरीर थर्राने लगता है. सांस की गति तेज़ी से ऊपर नीचे होने लगती है. किरदार की ऐसी बातें किसी कागज पर नहीं लिखी होती. इन बारीकियां को, भावों को एक्टर खुद जन्म देते हैं. ऐसे एक्टर जो अपने काम की गुणवत्ता में यकीन करते हों. सुरेखा सीकरी ऐसे एक्टर्स में से एक थीं.
आज की जेनरेशन सुरेखा सीकरी को ‘बधाई हो’ फेम के तौर पर पहचानती है. लेकिन जब हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ‘बधाई हो’ जैसे सब्जेक्ट पर फिल्में आम नहीं थी, उस वक्त भी सुरेखा सीकरी मजबूत किरदारों को परदे पर उतार रही थीं. आज उनके करियर की कुछ ऐसी ही यादगार परफॉरमेंसेज़ के बारे में जानेंगे.

























