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पंगा: मूवी रिव्यू

मूवी देखकर कंगना रनौत को इस दौर की सबसे अच्छी एक्ट्रेस कहने का मन करता है.

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एक बार तो ये मूवी, कंगना के लिए देख ली जानी चाहिए. दूसरी तीसरी बार फिर आप 'मूवी' के लिए मूवी देखें तो अलग बात है.

'मैं क्या कर सकती थी, और मैं क्या कर रही हूं.'

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अगर आप ‘पंगा’ मूवी में 33 प्रतिशत भी इनवेस्टेड हैं, तो मूवी का ये डायलॉग आपको हिट करेगा. खास तौर पर जिस सिचुएशन में ये आता है, जिस संजीदगी से इसे कहा और बरता जाता है. फिर आप चाहे पुरुष हों या स्त्री, आप युवा हों या बच्चे या बुजुर्ग, आप बेरोज़गार हों या दुकानदार इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.
आप अपने रोज़ के शेड्यूल में पूरी तरह बिज़ी रहते हो, इसी दौरान आपके जीवन में कुछ ऐसे पल आते हैं जब आप अपने पैशन को बेइंतहा मिस करने लगते हो. वो जिसे आप सालों पहले छोड़ चुके, भुला चुके. लेकिन न तो आप किसी ‘थ्री इडियट्स’ फिल्म के कोई फरहान कुरैशी हो, न ‘तमाशा’ के वेद वर्धन साहनी. कि एक दिन अचानक से उठे और सब कुछ छोड़-छाड़ के अपना पैशन फॉलो करने चल दिए. ये सब फिल्मों में होता है, असल ज़िंदगी में कहां.
बस इसी पिछली बोल्ड की गई लाइन के चलते ‘पंगा’ क्लासिक बनने की ओर एक कदम बढ़ा देती है. क्यूंकि ये एक फिल्म होते हुए भी ‘फ़िल्मी फ़ॉर्मूले’ के नेगेशन की, अस्वीकरण की बात करती है.

# कहानी-

पति पत्नी और उनका एक 7 साल का लड़का. तीन लोगों का परिवार. मां ‘हेलीकॉप्टर पेरेंटिंग’ का उत्कृष्ट उदाहरण. बेटे को दो छींक भी आए तो उसे टेंशन होने लगती है. वो जैसे-तैसे वर्क-लाइफ बैलेंस बनाए रख पा रही है. इस सबके बीच जब रात होती है तो वो नींद में अपने पति को खूब लातें मारती है. शायद कोई सपना देखती है.
ये सपना क्या है? उसका पैशन. कबड्डी. मूवी इसी सपने के तामीर की दास्तां है. और साथ में बताती है कि क्या होता है जब जैकी चैन और टाइगर श्रॉफ मिलते हैं. (नहीं इनमें से किसी का भी स्पेशल एपीयरेंस नहीं है.)
कई बार दूर से खुश दिखने वाली फैमिली, नज़दीक जाकर भी खुश दिखती है. हां, लेकिन कुछ हल्का सा चुभता है. ये चुभन क्या है, जानने के लिए 'पंगा' देखिए. कई बार दूर से खुश दिखने वाली फैमिली, नज़दीक से देखने पर भी खुश दिखती है. हां, लेकिन कुछ हल्का सा चुभता है. ये चुभन क्या है, जानने के लिए 'पंगा' देखिए.

 # कंगना रनौत की एक्टिंग-

वाह यार! आप वो सीन देखिएगा जब जया, यानी कंगना के किरदार का लड़का होता है. और डॉक्टर कहता है कि किसी एक को इसके साथ हमेशा रहना पड़ेगा. किसी एक को इसकी हमेशा केयर करनी पड़ेगी. जया बच्चे को देखकर कहती है- मम्मा करेगी. और इस दौरान उसकी आंखें पनीली होने लग जाती हैं. अपने पैशन छूटने के एहसास को कैसे वो ममत्व के एहसास तले दबाती हैं, ये दर्शनीय है.
लेकिन यकीन कीजिए ये एकमात्र सीन नहीं है, जहां उनकी एक्टिंग आपको बहा ले जाएगी. इससे पहले ऐसी दिल पिघला देने वाली एक्टिंग करीना की ‘जब वी मेट’ में और काजोल की ‘कभी ख़ुशी कभी ग़म’ में देखी थी.

# कंगना के एफर्ट्स-

आप उनके पांव मोड़ने को देखें, उनके कबड्डी वाले सीन्स देखें, उनकी एक्सरसाईज़ वाले सीन्स देखें. इन सबके लिए उन्होंने अच्छी खासी ट्रेनिंग ली थी. क्या ये मेहनत पर्दे पर दिखती है? जी जनाब, बखूबी दिखती है.

# कंगना के शेड्स-

मूवी में कंगना का डबल रोल है. एक जया का जो मां, बेटी और बीवी बनी हैं और दूसरी जया का जो गर्लफ्रेंड, सहेली और कबड्डी प्लेयर बनी हैं. दोनों जया एक ही जीव हैं, लेकिन दोनों ही जया इतनी अलहदा कि हम दोबारा कहेंगे- मूवी में कंगना का डबल रोल है.

# बाकी एक्टर्स-

नीना गुप्ता, जो कुछ महीनों पहले तक काम के लिए तरस रहीं थीं, के पास अब काम की कोई कमी नहीं है. जिस तरह की मूवीज़ वो कर रही हैं, आगे भी नहीं होने वाली। 'पंगा' में भी बेशक उनका बहुत छोटा रोल है, लेकिन जिस तरह की मासूम, दयनीय वो एक फोन कॉल में वाले सीन में लगी हैं, वो रियल्टी के काफी करीब लगता है. इसके अलावा उनके ह्यूमरस सीन्स तो बोनस हैं.
ऋचा चड्डा तो खैर अच्छी एक्ट्रेस हैं हीं, अब और भी निखरती जा रही हैं, लेकिन इस मूवी में उनपर बिहारी एक्सेंट कम फबता है.
ऋचा चड्डा का एक्सेंट न्यूट्रल रखा जाता, तो शायद ज़्यादा बेहतर होता. ऋचा चड्डा का एक्सेंट न्यूट्रल रखा जाता, तो शायद ज़्यादा बेहतर होता.

जस्सी गिल एक डेब्यूटेंट के तौर पर अपना काम बखूबी कर ले गए हैं, उनके आने वाले प्रोजेक्ट्स देखकर उनकी तुलना दिलजीत दोसांझ से होना लाज़मी है. क्योंकि दोनों ही पंजाबी पॉप म्यूज़िक का जाना माना चेहरा हैं. यज्ञ भसीन (चाइल्ड आर्टिस्ट) के हिस्से में सबसे अच्छे डायलॉग्स आये हैं और इसलिए वो और भी ज़्यादा निखरे हैं. बच्चों के काम निकलवाना मुश्किल होता है. ये ध्यान में रखकर जब आप उसके कुछ सीन्स देखते हो तो 'वाह' किए बिना नहीं रह पाते. जैसे, वीडियो गेम खेलते हुए वाला एक सीन.

# डायरेक्शन-

‘निल बट्टे सन्नटा’ और ‘बरेली की बर्फी’ फेम अश्विनी अय्यर तिवारी ने अपनी तीसरी फिल्म में भी डिटेलिंग पर ऐसी पकड़ बनाई है कि आप कंगना के मोबाइल के कवर तक को देख कर उछल पड़ोगे- अरे मेरा वाला कवर.
घर के सोफे, उसके कवर, कमरे की दीवारों का पर चिपका मैलापन. सब कुछ बैंग ऑन टारगेट. और जब किसी सीन में ज़रूरी बातों के बीच में अचानक बेहद गैर-ज़रूरी बातें आती हैं, तो वो उस सीन और टोटल मूवी को और वास्तिवक बना देती हैं. जैसे बेवजह चीनी या गुड़ के लड्डुओं के बीच बहस.
नीना गुप्ता अपने एक सीन में काफी इमोशनल कर जाती हैं. ये तस्वीर उसी सीन का एक स्क्रीनग्रैब है. नीना गुप्ता अपने एक सीन में काफी इमोशनल कर जाती हैं. ये तस्वीर उसी सीन का एक स्क्रीनग्रैब है.

# डायलॉग्स-

बेहद सधे हुए है. खामखा की लाउडनेस नहीं. जैसा कि इस पैटर्न की मूवी से उम्मीद होती है. 'पंगा' में शब्दों के माध्यम से बेबसी, मज़बूरी या फिर जुनून शो करने की जबरिया कोशिश से बचा गया है. 'इंडिया' और 'मम्मी' में से किसी एक को न चुनकर, विवादों से भी एक एस्केप रुट ले लिया गया है.
कुछ डायलॉग हैं, जो सोचने पर मजबूर करते हैं. जैसे वो डायलॉग, जो हमने शुरुआत में बताया है. या जब कंगना का किरदार अपने पति से कहता है-
तुमको देखती हूं तो अच्छा लगता है. आदि को देखती हूं तो अच्छा लगता है. लेकिन जब खुद को देखती हूं, तो मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता.
अगर आपने 'निल बट्टे सन्नाटा' देखी है तो आप जानते हैं कि इस मूवी में भी आपको ठहाके लगाने वाला ह्यूमर नहीं मिलने वाला. इसमें ह्यूमर भी ऐसा है गोया धीमी आंच में पक रहा हो. जैसे बच्चे का मां की ग़ैर-मौज़ूदगी में अपनी टीचर नानी को देख कर कहना-
आपको देख कर इतनी ख़ुशी पहले कभी नहीं हुई.
फिफ्टी शेड्स ऑफ़ कंगना. फिफ्टी शेड्स ऑफ़ कंगना.

# क्या और बेहतर हो सकता था-

# म्यूज़िक- म्यूज़िक शंकर एहसान लॉय की तिकड़ी ने दिया है. और लिरिक्स राइटर हैं जावेद अख्तर. इन चारों ने मिलकर ‘दिल चाहता है’, ‘कल हो न हो’ और ‘रॉक ऑन’ जैसे कई सुपरहिट म्यूज़िक एल्बम्स दिए हैं. इसलिए इस फिल्म से ही नहीं इसके म्यूज़िक से भी काफी उम्मीदें की जा रही थीं. उम्मीदें पूरी होती हैं, लेकिन आंशिक रूप से. हालांकि गीत कहीं-कहीं हतप्रभ भी करते हैं, जैसे एक जगह 'है' को 'हे' बोला गया है. टिपिकल मध्य प्रदेश वाला एक्सेंट. जिस किसी का भी ये आईडिया था उसने 'पंगा' के डिटेलिंग वाले डिपॉर्टेंट के लिए कुछ अंक और बटोर लिए.
# पेस और क्लाइमेक्स- इंटरवल तक तो फिर भी फिल्म अपना पेस बनाए रखती है लेकिन इंटरवल के बाद मूवी क्लाइमेक्स का इंतज़ार करती लगती है. क्लाइमेक्स भी काफी अपेक्षित. इंटरवल के बाद की मूवी क्लाइमेक्स के लिए की गई रिवर्स इंजीयरिंग सरीखी लगती है.

# ‘पंगा’ लें कि नहीं?-

‘चक दे इंडिया’ और ‘दंगल’ जैसी मूवीज़ को देखकर समीक्षक कह रहे थे कि विमेन स्पोर्ट्स वाली मूवी के लिए भी किसी मेल लीड एक्टर की क्या ज़रूरत? इस सवाल का सटीक उत्तर है ‘पंगा’. ये मूवी कभी-कभी इसी डायरेक्टर की ‘निल बट्टे सन्नाटा’ की याद दिलाती है. पेरेंटिंग के मामले में ‘स्काई इज़ पिंक’ की और 'फैमिली प्लस स्पोर्ट' जॉनर की मूवी के मामले में देओल फैमिली की ‘अपने’ की याद दिलाती ये मूवी अपने आप में स्टैंड अलोन भी दर्शनीय है. कुल जमा ‘पंगा’ एक ऐसा अनुभव है जिसे लिया जाना चाहिए.


वीडियो देखें:

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