दबाव में भरत लाल बैंक से प्रोसीजर पता करता है. पता चलता है कि लोन के लिए सिक्योरिटी चाहिए. खलीलाबाद में चाचा के हवाले खानदानी ज़मीन है, जिसमें उसका भी हिस्सा है. उसके कागज़ लेने भरत लाल पहुंचता है और यूं राज़ खुलता है कि चाचा-चाची और उनके बेटे उसे कागज़ों में मारकर ज़मीन हड़प चुके हैं. फिर शुरू होती है ज़मीन वापस पाने की और उससे ज़्यादा अपने जीवित होने का स्टेटस पाने की जंग. भरत कैसे इस जंग को लड़ता है? कामयाब होता भी है या नहीं? सिस्टम से इस लड़ाई में क्या-क्या खोता है ये सब जानने के लिए 'कागज़' देखिए.

कागज़ पर आदमी के लिए कागज़ के फूल. फोटो-ट्रेलर.
# दी पंकज त्रिपाठी शो फिल्म मुकम्मल तौर से पंकज त्रिपाठी की है. इस हद तक कि आपको शक होने लगता है. इस बात का शक कि इस कहानी के लिए पंकज त्रिपाठी को नहीं चुना गया, बल्कि पहले पंकज त्रिपाठी को फाइनल कर बाद में सुटेबल कहानी खोजी गई. उनका ट्रैक रिकॉर्ड देखते हुए ये अलग से कहने की ज़रूरत तो है नहीं कि वो अपना काम पूरी ईमानदारी से कर ले जाते हैं. उनको जो सौंपा गया है, वो उन्होंने सहजता से किया है. दिक्कत ये है कि ये सब अब रिपीट लगने लगा है. भारत के किसी भी गांव-देहात में पाए जाने वाले, मासूमियत की हद तक सीधे आम आदमी का किरदार उन्होंने इतनी बार पोट्रे कर लिया है, कि डर लगता है वो इसी खांचे में कैद न होकर रह जाएं.
बिलाशक उनकी एक्टिंग बेहद अच्छी है. वो साधारण डायलॉग भी बोलते हैं, तो उसको फनी बना देते हैं. 'द्वारपाल बनने लायक नहीं थे, लेखपाल बन गए' जैसा क्लीशे वर्ड प्ले उन्हीं के मुंह से सुसह्य लगता है. वो जब-जब स्क्रीन पर होते हैं, आपको अपने से जोड़े रखते हैं. और ज़्यादातर समय वहीँ स्क्रीन पर होते हैं. इसीलिए मैंने शुरू में ही कहा कि फिल्म में उनको नहीं लिया गया है, उनके इर्द-गिर्द फिल्म बनी है. कमज़ोर फ़िल्में अपने शीयर टैलेंट के दम पर कैरी करने में वो यकीनन सक्षम हैं. बावजूद इसके 'कागज़' को एक वेक अप कॉल की तरह लेना चाहिए. कि एक करिश्माई अभिनेता टाइपकास्ट होकर न रह जाए. ऐसा हो गया तो ये उनका, उनके फैन्स का और हिंदी सिनेमा का तगड़ा नुकसान होगा.

पंकज त्रिपाठी ऐसे किरदार अब नींद भी कर सकते हैं. फोटो-ट्रेलर.
पंकज के अलावा जो किरदार थोड़ा इम्प्रेस करता है, वो है उनकी पत्नी रुक्मिणी का. मोनल गज्जर ने इसको बढ़िया ढंग से निभाया है. इमोशनल दृश्यों में उनकी डायलॉग डिलीवरी सही लगती है. पॉलिटिशियन अशर्फी देवी का किरदार मीता वशिष्ठ ने ग्रेसफुली निभाया. वकील साधुराम केवट के रूप में सतीश कौशिक निराश करते हैं. उनकी रेपुटेशन के हिसाब से संवाद तक नहीं आए हैं उनके हिस्से. रामायण में केवट ने प्रभु रामचंद्र की नौका पार लगाई थी. यहां एक्टर और डायरेक्टर दोनों के रूप में सतीश कौशिक ये काम नहीं कर पाए हैं. # क्या अच्छा, क्या घिसा-पिटा? पंकज त्रिपाठी से इतर फिल्म की बात की जाए, तो कुछ चीज़ें अच्छी हैं तो कुछ बेहद घिसी-पिटी. फिल्म की कहानी 1977 से शुरू होती है. शुरूआती सीन्स में कुछेक नॉस्टैल्जिया क्रिएट होता भी है, तो जल्द ही हवा हो जाता है. जैसे विविध भारती की ट्यून या नसबंदी का रेफरेंस आपको चेताते हैं कि आप इमरजेंसी के फ़ौरन बाद का पीरियड देख रहे हैं. लेकिन लोगों के पहनावे और फिल्म का सेट इसके साथ मेल खाते नहीं लगते. फिर संदीपा धर के गैरज़रूरी आइटम नंबर के आते-आते फिल्म अपनी ग्रिप खोने लगती है. ऊपर से एकाध जगह कालखंड के मामले में गलती भी हुई है. जैसे पंकज त्रिपाठी का साथी बैंड वालों से ये कहना कि 'बहारों फूल बरसाओ की प्रैक्टिस करो, बिनाका संगीत माला में टॉप पर है'. 1966 की फिल्म का ये गीत 11 साल बाद बिनाका संगीतमाला में टॉप पर रहे, ये मुमकिन नहीं. बहरहाल, ऐसी छोटी मिस्टेक्स फिल्म की प्रमुख चिंता नहीं है. फिल्म की असल टेंशन है इसका क्लीशे होना.
हम पंकज त्रिपाठी की स्टीरियोटाइपिंग पर चिंतित हो रहे थे, फिल्म कितने ही स्टीरियोटाइप प्राउडली कैरी करती है. जैसे मुस्लिम किरदार है तो जालीदार टोपी और तहमद ही पहने होगा से लेकर सरकारी बाबू की भाषा शैली तक. नेताओं, गांववालों, रिश्तेदारों की स्टीरियोटाइपिंग.

मोनल गज्जर ने रुक्मिणी का रोल अच्छे ढंग से किया. फोटो ट्रेलर.
फिल्म का विषय बेहद संवेदनशील है. एक आदमी, जो महज़ अपना ज़िंदा होना रजिस्टर करवाने के लिए जूझ रहा है. कितनी ही संभावनाएं थीं इस किरदार में. कि दर्शक की आत्मा तक टीस पहुंचे. इसमें कामयाबी नहीं मिली है मेकर्स को. इक्का-दुक्का सीन ही हैं, जहां आप कुछ फील करते हैं. जैसे, जब पहली बार भरत को उसके मृतक होने की खबर मिलती है और वो फ्रस्ट्रेशन में घर लौट रहा होता है, तो सड़क पर एक अंतिम यात्रा जा रही होती है. या फिर एक सीन में भरत का पत्रकार से आज़िज़ी से कहना, 'खबर छापिएगा, चुटकुला नहीं'. ऐसे सीन बेहद कम हैं. या शायद ये दो ही हैं, जहां आप मृतक भरत लाल की पीड़ा महसूस करते हैं. बाकी सब सतही फन के चक्कर में गड़बड़ा गया है. व्यंग्य और कॉमेडी में महीन अंतर होता है. 'कागज़' व्यंग्य के फ्रंट पर कमज़ोर पड़ जाती है. तिलमिला देने वाला व्यंग्य नदारद है, जो सिस्टम की खामियों पर पूरी बेबाकी से वार करे. जो 'पीपली लाइव' जैसी फिल्मों में सहज ही दिखा था.
हम ये नहीं कह रहे हैं कि 'कागज़' एक डिज़ास्टर फिल्म है. लेकिन जिस मज़बूत स्टोरी लाइन पर ये फिल्म बनी थी, उसे फिल्म मेकिंग के बाकी पक्ष इतना कॉम्प्लिमेंट नहीं कर पाए हैं. भारतीय लालफीताशाही के कारनामे कहती कहानी और पंकज त्रिपाठी की अदाकारी के लिए इसे बिलाशक देखा जा सकता है. कुल मिलाकर कागज़ ऐसी फिल्म नहीं है कि आपको देखने का अफ़सोस हो, लेकिन ऐसी भी नहीं है कि मन को कोई शानदार फिल्म देखने की संतुष्टि मिले. इति.
























