सुशोभित सक्तावत इंदौर में रहते हैं, जिस सिवनी के जंगलों का जिक्र मोगली के किस्सों में होता है, वहां लगभग साढ़े चार सौ किलोमीटर दूर. तो सुशोभित द जंगल बुक देख आए, और उसके बारे में फेसबुक पर लिख डाला. क्या लिखा आप भी पढ़िए. और आपके पास भी कुछ हो जो आप सबको पढ़ाना चाहें तो लिख भेजिए lallantopmail@gmail.com पर लिहाज़ा अव्वल तो यही कि 1907 में सबसे कमउम्र नोबेल लॉरियट (लिट्रेचर) बनने वाले और यह पुरस्कार जीतने वाले पहले अंग्रेज़ीभाषी लेखक रूडयार्ड किपलिंग ने 1893-95 में भारतीय जंगलों के अपने अनुभवों और किंवदंतियों के आधार पर 'द जंगल बुक' की 15 कहानियां लिखी थीं, जिनमें से 8 के केंद्र में मोगली था. सवा सौ साल पहले लिखी गई वे कहानियां आज दिखाई जा रही डिज्नी प्रोडक्शंस की कहानियों से बहुत जुदा थीं. मसलन, जॉर्ज ऑरवेल पहले ही किपलिंग के समग्र दृष्टिकोण में निहित "इम्पीरियलिस्टिक गेज़" की निंदा कर चुके थे. 'एनिमल फ़ार्म' के लेखक की ओर से यह स्वाभाविक भी था. और उनकी 'द जंगल बुक' की कहानियों में प्रकृति पर मनुष्य की श्रेष्ठता के ओवरटोन्स की पड़ताल की जाती रही है. जबकि जॉन फ़ैवर्यू द्वारा निर्देशित जंगलबुक फ्रेंचाइज़ी की ताज़ातरीन फिल्म पर 'गार्जियन' के रेयान गिल्बी की आपत्ति यह है कि यह उच्च तकनीकी कौशल की मदद से आदिम प्राकृतिक गुणों की सराहना करती है, जैसे मितव्ययिता का संदेश देने के लिए किसी महंगे कार्यक्रम का आयोजन करना. ख़ैर. https://youtu.be/JCgPGFunkig 'द जंगल बुक' सीरीज में कॉस्मिक हायरेर्की के एक पृथक प्वॉइंट को तो लक्ष्य किया ही जा सकता है. मनुष्य की यह गर्वोक्ति रही है कि ईश्वर ने उसे अपने रूप में रचा है, अलबत्ता इसकी ताईद करने का कोई उपाय नहीं है. 'द जंगल बुक' सीरिज़ के मार्फत वह इस दिशा में एक और क़दम उठाता हुआ यह जताने की कोशिश करता है कि पशु भी मनुष्यों की तरह सोचते, बोलते और महसूस करते हैं. यानी, पशुओं के बीच पलकर बढ़ने वाले एक मानवपुत्र के कारण पशुओं में मानवीयता का समावेश है, मनुष्य में पाशविकता का नहीं. डिज्नी प्रोडक्शन की नई फिल्म में जिस तरह से मोगली के किरदार के लिए एक परिष्कृत, सुरुचिपूर्ण, सुदर्शन (इन शॉर्ट, क्यूट) बालक का चयन किया गया है, वह इस स्थापना को और आगे ले जाता है. क्योंकि मोगली सबकुछ है, जंगली नहीं है, उल्टे वह तो बेहद ज़हीन और सेंसेटिव है. निश्चित ही, यह जंगल पर एक मनुष्य का गेज़ है, इससे उल्टा नहीं."All animals are equal, but some animals are more equal than others." ~ George Orwell माना कि यह "बच्चों" की फिल्म है, फिर भी इसके बारे में कुछ एपिस्टेमॉलॉजिकल नोट्स तो शेयर किए ही जा सकते हैं ना.
यहां पर याद करें इतालो कल्वीनो की किताब "द कासल ऑफ़ क्रॉस्ड डेस्टिनीज़", जिसमें "एनिमल फ़ार्म" के ही समांतर यह फ़ैंटसी है कि एक दिन तमाम पशु जंगल से शहरों में चले आएंगे और मनुष्य को खदेड़ते हुए सभ्यता के उपकरणों पर काबिज़ हो जाएंगे. डिज्नी वाले इस पर भी फिल्म बना सकते हैं, अगरचे वे चाहें.वैसे भी, मनुष्यता और पाशविकता की संधिरेखा को वर्नर हरसोग ने अपनी फिल्म "द एनिग्मा ऑफ़ कैस्पर हॉसेर" में ज़्यादा संवेदनशील रूप से फिल्माया है, जिसमें नायक मानवीय सभ्यता के दायरे से बाहर रहकर उसी तरह बड़ा हुआ है, जैसे मोगली. लेकिन वह मोगली की तुलना में अधिक "एलीमेंटल", अधिक "भाषाच्युत" और कम "रोमैंटिक" प्राणी है. फ्रांस्वा त्रुफ़ो भी 1969 में "द वाइल्ड चाइल्ड" बना चुके हैं. ख़ुद "जंगल बुक" की मूल किंवदंती मौलिक नहीं है. रोमन मिथकों में रोम्युलस और रेमस के बारे में वर्णन है कि उन्हें भेडि़यों ने पाल-पोसकर बड़ा किया. ग्रीक मिथालॉजी में ज़ीयस के बारे में वर्णन है कि उसे बकरियों ने अपने दूध पर पोसा. हमारे यहां कृष्ण का मिथक है, जो गोपालक थे और महाविषधरों के मस्तक पर आरूढ़ होकर नृत्य करते थे. "पंचतंत्र" और "हितोपदेश" में मनुष्यों और पशुओं के बीच की संधिरेखा टूटती रही है.



















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