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फिल्म रिव्यू- भूल चूक माफ

राजकुमार राव और वामिका गब्बी की नई फिल्म 'भूल चूक माफ' कैसी है, जानने के लिए पढ़ें ये रिव्यू.

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'भूल चूक माफ' को करण शर्मा ने डायरेक्ट किया है.

फिल्म- भूल चूक माफ 
डायरेक्टर- करण शर्मा 
एक्टर्स- राजकुमार राव, वामिका गब्बी, रघुबीर यादव, सीमा पाहवा, ज़ाकिर हुसैन, संजय मिश्रा, इश्तियाक खान 
रेटिंग- 2 स्टार्स (**) 

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राजकुमार राव और वामिका गब्बी की नई फिल्म आई है 'भूल चूक माफ'. इस फिल्म की रिलीज़ से पहले बहुत तमाशे हुए. पहले ये थिएटर्स में रिलीज़ होने वाली थी. फिर मेकर्स ने इंडिया-पाकिस्तान टेंशन का हवाला देते हुए इसे ओटीटी पर रिलीज़ करने की बात कही. इस चीज़ को लेकर PVR और प्रोडक्शन कंपनी मैडॉक फिल्म्स के बीच विवाद हो गया. अंतत: दोनों पक्षों ने आपस में समझौता करके इस फिल्म को सिनेमाघरों में ही रिलीज़ करने का फैसला किया. आप जब 'भूल चूक माफ' देखते हैं, तो आपको भान होता है कि कमोबेश यही चीज़ इस फिल्म के कॉन्सेप्ट के साथ भी हुई है- 'समझौता'. क्यों? क्योंकि फिल्म के प्रमोशनल मटीरियल्स में बताया गया कि ये फिल्म टाइम लूप के बारे में है. टाइम लूप यानी एक ऐसा कॉन्सेप्ट जिसमें आदमी एक ही समय में फंसा रहता है. उसके लिए समय आगे या पीछे नहीं होता. मगर फिल्म देखने पर मालूम पड़ता है कि टाइम लूप तो झांकी था, असली ड्रामा बाकी था.

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'भूल चूक माफ' की कहानी बनारस में रहने वाले एक जोड़े की है. रंजन तिवारी और तितली मिश्रा, ये दोनों लोग एक दूसरे से शादी करना चाहते हैं. मगर तितली के पिता जी की एक शर्त है. लड़के की सरकारी नौकरी होनी चाहिए. रंजन किसी तरह भगवान से मन्नत मांगकर, झोल-झाल करके एक सरकारी नौकरी जुगाड़ लेता है. घर में जलसा होता है. शादी की तैयारियां शुरू हो जाती हैं. हल्दी लगवाकर रंजन तिवारी सोते हैं. अगले दिन शादी है. मगर सुबह उठते हैं, तो फिर से हल्दी की तैयारियां हो रही हैं. ऐसा लगातार कई दिनों तक होता है. ऐसा क्यों होता है, ये जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी.  

'भूल चूक माफ' के साथ बुनियादी समस्या ये है कि ये टेंप्लेट सिनेमा है. वही यूपी का एक छोटा सा शहर. वही कलेशी परिवार. और वही सेम लड़का-लड़की के साथ आने में होनी वाली दिक्कतें. मगर ये फिल्म अपने टेंप्लेट के साथ भी न्याय नहीं कर पाती. अव्वल, तो फिल्म के एक-दो छोड़कर कोई भी पंचलाइन लैंड नहीं करते. एक साधारण कहानी को इतना उलझा दिया जाता है, ताकि दर्शकों को ऐसा लगे कि उन्हें कुछ नया देखने को मिल रहा है. ऊपर से ये फिल्म अपने पॉइंट तक पहुंचने में इतना वक्त लगाती है कि बोझिल लगने लगती है.  

'भूल चूक माफ' समेत पिछले दिनों आईं तमाम कॉमेडी फिल्मों के साथ एक समस्या रही है. वो खालिस कॉमेडी फिल्में नहीं होना चाहती हैं. वो चाहती हैं कि वो फिल्म में लोगों को हंसते-हंसाते एक संदेश दे दिया जाए. 'स्त्री' जैसी कुछ फिल्में ऐसी रहीं, जिनका मर्म उनकी कहानी में ही छुपा होता है. उसके लिए आडंबर रचने की ज़रूरत नहीं पड़ती. मगर फिर आती हैं 'भूल चूक माफ' जैसी फिल्में, जो ये काम दर्शकों के साथ जबरदस्ती करना चाहती हैं. वो इस मैसेजिंग के चक्कर में पूरी फिल्म को दांव पर लगा देती हैं. और फिर आखिर में हीरो फोर्थ वॉल तोड़कर ज्ञान बघारकर चला जाता है. जब डायरेक्ट्ली जनता से बात करके ही मैसेज देना था, तो फिर फिल्म बनाने मक़सद क्या था?

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'भूल चूक माफ' के पास एक शानदार कॉन्सेप्ट था टाइम लूप का. जो कि भारतीय दर्शकों के लिए नया भी है. हिंदी सिनेमा में 'लूप लपेटा' समेत एकाध दो फिल्में ही हैं, जिन्होंने इस चीज़ को एक्सप्लोर किया है. मगर ये फिल्म एक साथ बहुत सारी चीज़ें करने की कोशिश करती है. इन्हें टाइम लूप को भुनाना है, देश में फैली बेरोज़गारी पर बात करनी है, साथ में धार्मिक सौहार्द पर टिप्पणी करनी है. मगर किसी चीज़ को लेकर गंभीरता नहीं बरती गई. और अंत में सारी चीज़ें भगवान भरोसे छोड़ दी जाती हैं. यहां भगवान भरोसे कोई मुहावरा या मेटाफर नहीं है, बल्कि लिटरली फिल्म में सबकुछ भगवान शिव के भरोसे ही होता है. ये सुनने में कितना अटपटा लगता है कि जो फिल्म साइंस की बात करते हुए शुरू होती है मगर खत्म भगवान पर होती है.

बड़ी बड़ी बातें करने और हाई एंड कॉन्सेप्ट के बीच बेसिक बातें मेकर्स भूल जाते हैं. मसलन, फिल्म में एक किरदार है, जिसकी पत्नी अचार का बिज़नेस करती है. मगर उस व्यक्ति का ये कहकर मज़ाक उड़ाया जाता है कि वो अपनी पत्नी के पैसों पर पल रहा है. वहीं दूसरी तरफ बच्चा पैदा करने को दुनिया का सबसे आसान काम डिक्लेयर कर दिया जाता है. वही वुमन रिटन बाय मेन वाली पुरानी समस्या.

ये सब तो फिर झिल जाता है. फिर आता है फिल्म का क्लाइमैक्स. कुछ दिनों पहले एक तमिल फिल्म आई थी 'ड्रैगन'. इस फिल्म की कहानी एक ऐसे लड़क की थी, जो फर्जी डिग्री बनवाकर बड़ी कंपनी में ऊंची सैलरी वाली नौकरी पा जाता है. 'भूल चूक माफ' और इस फिल्म का आइडिया मिलता-जुलता लग सकता है. मगर दोनों फिल्मों का क्लाइमैक्स डिट्टो है. बस फर्क ये है कि 'ड्रैगन' के मेकर्स उस चीज़ के चक्कर में पूरी फिल्म की ऐसी-तैसी नहीं करते. लास्ट में वो चीज़ आती है और अपना इम्पैक्ट छोड़कर चली जाती है. उसे ओवर-एक्सप्लेन करने की कोशिश नहीं की जाती. मगर यहां तो बाकायदा एक व्यक्ति आता है और स्पीच देकर समझाता है कि पूरा मसला क्या है.

'भूल चूक माफ' में रंजन तिवारी का रोल किया है राजकुमार राव ने. राजकुमार राव ऐसे रोल्स इतनी बार कर चुके हैं कि उन्हें फेशियल एक्सप्रेशन से लेकर देहभाषा सबकुछ रट गया होगा. वो तो उनकी कलाकारी है कि वो फिर भी उन रोल्स को फ्रेश तरीके से करने का कोई जुगाड़ निकाल लेते हैं. फिल्म में कई ऐसे सीन्स हैं, जहां राज का किरदार फ्रस्ट्रेटेड है. मगर उसे देखकर मज़ा आता है. मगर पब्लिक के लिए अब वो बहुत रिपिटिटीव हो गया है. वामिका गब्बी ने तितली के किरदार को ज़रूरत से ज़्यादा बबली बना दिया है. या तो वो फिल्म में पपी फेस बनाकर अपने पिता को इमोशनल ब्लैकमेल कर रही होती हैं या अपने बॉयफ्रेंड रंजन को हड़का रही होती हैं. वैसे तो वो आज के दौर की स्ट्रॉन्ग इंडीपेंडेंट वुमन हैं. मगर उनके ज़िंदगी का एक्कै मक़सद है. रंजन तिवारी से शादी करना. वो अपने करियर पर फोकस करने की बजाय रंजन की नौकरी लगवाने में जुटी रहती हैं. क्यों? ताकि उनसे शादी कर सकें. बाकी फिल्म में ज़ाकिर हुसैन, रघुबीर यादव, सीमा पाहवा, संजय मिश्रा और इश्तियाक खान जैसे एक्टर्स ने काम किया है. मगर क्या मजाल कि किसी को एक भी सीन में परफॉर्म करने का मौका दिया जाए.  

'भूल चूक माफ' के पास करने को इतना कुछ था. मगर राइटिंग ऐसी रही कि ज़रा से प्यार में डूबे रहे और फिल्म बीत गई. कुंवर नारायण से माफी के साथ. 

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