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अरुण खेत्रपाल की कहानी से कितना इंसाफ कर पाई धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म 'इक्कीस'?

1971 की भारत पाकिस्तान जंग में बसंतर नदी के पास पाकिस्तान ने टैंकों की दीवार खड़ी कर रखी थी. आदेश मिला दुश्मन को रोकना है. अरुण अपने टैंक के साथ आगे बढ़े.एक एक करके उन्होंने दुश्मन के टैंक उड़ाए. तभी एक शेल सीधा उनके टैंक पर गिरा. टैंक जलने लगा. अरुण घायल हो गए. दूसरे अफसर ने रेडियो पर कहा बाहर निकलो. लेकिन अरुण ने जवाब दिया नहीं निकलूंगा. अभी दुश्मन बाकी है.

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अरुण खेत्रपाल की वीरता पर पर्दा: धर्मेंद्र की इक्कीस ने कितनी न्याय किया?

साल 2026 के पहले दिन, 1 जनवरी को, बड़े पर्दे पर आई फिल्म 'इक्कीस'. यह अभिनेता धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म भी है. एक जज़्बाती और वीरता से भरी कहानी. स्क्रीन पर वही धुंध, धुआं और गोलियों की सीटी. टैंकों की गरज. और बीच में, 21 साल का नौजवान-सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल.

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कैमरा उनके चेहरे पर ज़ूम करता है. टैंक जल चुका है, रेडियो उड़ चुका है, शरीर पर जख्म हैं. साथी चिल्ला रहे हैं, “पीछे हटो!” लेकिन अरुण पीछे नहीं हटते. उनके लिए सिर्फ दुश्मन है, मौत कोई सवाल नहीं. टैंक फायर करता है, पहला दुश्मन टैंक उड़ता है, दूसरा, तीसरा. फिर शेल उनके टैंक पर गिरता है. आग और धुआं चारों तरफ फैलता है. और वही वीरता, वही निर्णय-अरुण खेत्रपाल हमेशा के लिए अमर हो जाते हैं.

असली अरुण खेत्रपाल: सपनों और हौसले की कहानी

अब कैमरा पीछे मुड़ता है, असली कहानी की ओर. दीवार पर तस्वीर, मन में सपना. नेशनल डिफेंस एकेडमी. दीवार पर टंगी फोटो-कर्नल अब्दुल हमीद तारापोर, परमवीर चक्र विजेता.
कैडेट अरुण खेत्रपाल रुकते हैं. दोस्तों से कहते हैं, “अगला परमवीर चक्र मैं जीतूंगा.”

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वो महज एक सपना भर नहीं था. वो एक नौजवान फौजी अफसर का फ़ैसला था. कुछ सपने होते ही पूरे होने के लिए हैं. इंडियन आर्मी के उस सेकेंड लेफ्टिनेंट के उस सपने को भी सच होना ही था.

फौजी विरासत: अनुशासन और देशभक्ति

अरुण का जन्म एक फौजी परिवार में हुआ. पिता ब्रिगेडियर एम एल खेत्रपाल खुद सेना में थे. घर में अनुशासन था, देशभक्ति थी और वर्दी का सम्मान. स्कूल से एनडीए तक, हर जगह अरुण शांत लेकिन जिद्दी कैडेट के रूप में जाने गए.

इंडियन मिलिट्री एकेडमी से पासआउट होकर पूना हॉर्स रेजिमेंट में पहुंचे-उम्र कम, हौसला बहुत बड़ा.

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1971 war
अरुण खेत्रपाल की असली लड़ाई के बाद की तस्वीर
शकरगढ़ का मैदान: वीरता की मिसाल 

1971, भारत-पाकिस्तान युद्ध. बसंतर नदी के पास दुश्मन की आर्मर्ड लाइनें. आदेश मिला: दुश्मन को रोकना. अरुण अपने टैंक के साथ आगे बढ़े. एक-एक करके दुश्मन के टैंक उड़ाए. शेल उनके टैंक पर गिरा, टैंक जलने लगा. रेडियो कहता है, “बाहर निकलो.” 

अरुण ने जवाब दिया, “नहीं, अभी दुश्मन बाकी है.” दूसरा टैंक संभाला, फायर किया, तीसरा टैंक ढेर. फिर एक और शेल आया और वीर हमेशा के लिए अमर हो गए. 21 साल की उम्र में सबसे कम उम्र के परमवीर चक्र विजेता.

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सपना हकीकत में

जिस परमवीर चक्र को उन्होंने एकेडमी की दीवार पर देखा था, वही उन्हें मरणोपरांत मिला. फिल्म ‘इक्कीस’ इसी कहानी को नई पीढ़ी तक ले जाने की कोशिश है. एक अफसर की कहानी जिसने मौत को सामने देखकर भी पीछे हटने से इनकार किया. क्योंकि कुछ लोग जीने से पहले देश के लिए मरने का फ़ैसला कर लेते हैं.

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