और इस अजय राय की कहानी की शुरुआत होती है 90 के दशक से. अजय राय के एक बड़े भाई थे. नाम था अवधेश राय. अवधेश राय ब्रजेश सिंह के करीबी थे और कोयले की ठेकेदारी करते थे. कोयले में पैसे के साथ दुश्मनी भी बढ़ती गई. और ये दुश्मनी उस वक्त के उभरते बाहुबली मुख्तार अंसारी के साथ और भी ज्यादा हो गई. ब्रजेश और मुख्तार की दुश्मनी के किस्से आम लोगों की जुबान पर आ गए थे. फिर वक्त आया 1991 का. कोयले की कमाई से शुरू हुई दुश्मनी में अवधेश राय की हत्या हो गई. आरोप लगे मुख्तार अंसारी और उसके ग्रुप पर. और अब बारी इस हत्या का बदला लेने की थी. और इस बदले की जिम्मेदारी उठाई अवधेश राय के भाई अजय राय ने. अजय राय हत्याकांड के गवाह थे.

काशी विद्यापीठ से ग्रैजुएशन के दौरान ही अजय राय एबीवीपी में शामिल हो गए थे.
उस वक्त अजय राय की शिनाख्त सिर्फ अवधेश राय के भाई के तौर पर थी. अजय राय काशी विद्यापीठ से ग्रैजुएशन कर रहे थे. भाई की हत्या के एक महीने के अंदर ही अजय राय चर्चा में आ गए थे. वजह ये थी कि वाराणसी के डिप्टी मेयर अनिल सिंह ने आरोप लगाया था कि कैंट इलाके में अजय राय ने 20 अगस्त 1991 को अनिल सिंह को जान से मारने की कोशिश की थी. बाद में अजय राय को इस केस में क्लीन चिट मिल गई, लेकिन दो साल के अंदर ही अजय राय के सितारे बुलंद होते गए.1993 में अजय राय उस वक्त की बीजेपी की बड़ी नेताओं में शुमार कुसुम राय के संपर्क में आए. भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष रामाशीष राय का भी समर्थन अजय को मिला और फिर वो विद्यार्थी परिषद में शामिल हो गए. 1996 में जब विधानसभा के चुनाव हुए तो अजय राय को बीजेपी ने वाराणसी की कोलअसला सीट से टिकट दे दिया. अजय राय जीत गए. ये जीत दो मायनों में अहम थी. पहली खुद अजय राय के लिए और दूसरी पार्टी के लिए. अजय राय के लिए इसलिए कि उनके भाई की जो बाहुबली छवि थी, उसे वो सियासत के जरिए पुष्ट कर सकते थे. पार्टी के लिए इसलिए कि जिस कोलअसला सीट पर लगातार 9 बार से सीपीआई के बड़े नेता रहे उदल का कब्जा था, उसे अजय राय ने छीन लिया था. जीत का अंतर भले ही 484 वोटों का था, लेकिन जीत के मायने बड़े थे.

अजय राय के भाई अवधेश राय की हत्या में मुख्तार अंसारी का नाम सामने आया था.
अजय राय ने 2002 और 2007, दोनों चुनाव आसानी से जीत लिए. कोलअसला सीट अब अजय राय के नाम से जानी जाती थी. अजय राय सियासत के साथ ही अपने भाई की हत्या का मुकदमा भी लड़ रहे थे. 23 नवंबर, 2007 को जब अजय राय वाराणसी कोर्ट में गवाही के लिए गए थे, तो बाहर निकलने के दौरान उनपर हमला हुआ, गोलियां चलीं, लेकिन अजय राय बच गए. बाद में अजय राय ने मुख्तार अंसारी, राकेश, कमलेश और भीम सिंह के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवा दिया था. तीन बार के विधायक अजय राय को अब सियासत में बड़ी भूमिका की तलाश थी. 2009 के लोकसभा चुनाव आ रहे थे. अजय राय बीजेपी से टिकट चाहते थे. लेकिन पार्टी ने उनकी नहीं सुनी. पार्टी के बड़े नेता मुरली मनोहर जोशी को वाराणसी से उम्मीदवार बना दिया गया. अजय राय नाराज हो गए. और इतने नाराज हो गए कि पार्टी ही छोड़ दी और विधानसभा से भी इस्तीफा दे दिया. पार्टी छोड़ने के बारे में वाराणसी के स्थानीय पत्रकार दो थ्योरी बताते हैं. पहला तो ये कि अजय राय ने नाराज होकर पार्टी छोड़ दी. दूसरा ये कि जब मुरली मनोहर जोशी को वाराणसी से उम्मीदवार बनाया गया तो अजय राय समर्थकों के साथ जोशी के पास पहुंचे. वहां जोशी समर्थकों और अजय राय समर्थकों के बीच मारपीट हो गई. केंद्रीय नेतृत्व को बात नागवार गुजरी और उसने अजय राय को पार्टी से बाहर कर दिया.

2009 में अजय राय लोकसभा का टिकट मांग रहे थे. पार्टी ने मुरली मनोहर जोशी को टिकट दे दिया था.
सच चाहे जो हो, अजय राय अब बीजेपी में नहीं थे. उन्होंने सपा का दामन थाम लिया. और सपा ने उन्हें वाराणसी से उम्मीदवार भी बना दिया. दूसरी ओर अजय राय के प्रतिद्वंद्वी मुख्तार अंसारी भी वाराणसी से चुनावी मैदान में उतर गए. नतीजा ये हुआ कि अजय राय और मुख्तार अंसारी दोनों ही चुनाव हार गए. जीत हुई मुरली मनोहर जोशी की. इसके बाद कोलअसला विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ. लोकसभा हारने वाले अजय राय ने सपा भी छोड़ दी और निर्दलीय ही विधानसभा का चुनाव लड़ा. जीत भी गए और फिर कांग्रेस का दामन थाम लिया. 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान कोलअसला सीट का परिसीमन हुआ और इसका नाम बदलकर हो गया पिंडरा. अजय राय ने पिंडरा से कांग्रेस के उम्मीदवार बन गए. तब तक उनपर 16 मुकदमे दर्ज हो गए थे. इन मुकदमों में हत्या की कोशिश, हिंसा भड़काने, जानलेवा हमले के अलावा गैंग्स्टर एक्ट और गुंडा एक्ट भी लग चुका था. उनकी छवि बाहुबली की बन गई थी. लेकिन लोगों पर इसका खास असर नहीं पड़ा और अजय राय जीत गए.

2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अजय राय को वाराणसी से मोदी के खिलाफ उतारा था.
2014 में लोकसभा चुनाव के लिए बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को वाराणसी से उम्मीदवार घोषित किया. कांग्रेस को मोदी के खिलाफ उम्मीदवार चाहिए था, सो अजय राय मैदान में उतर गए. लेकिन इसी के साथ एक और चीज भी बदली. वो थी दुश्मनी. जो शहर अजय राय और मुख्तार अंसारी की दुश्मनी के किस्से सुनता था, उसी शहर में अब दोस्ती के पर्चे चस्पा हो गए थे. मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल ने अजय राय को समर्थन कर दिया था. इसका विरोध भी हुआ था. बाहर भी और घर में भी. अजय राय को अपने घर के लोगों का गुस्सा झेलना पड़ा था. लेकिन होना वही था, जो तय था. मुख्तार के समर्थन के बावजूद अजय राय हार गए. और हारे ही नहीं तीसरे नंबर पर चले गए. दूसरे नंबर पर अरविंद केजरीवाल थे. लेकिन अजय राय कांग्रेस के साथ बने रहे. और अपनी बाहुबली की छवि भी बनाए रखी.

वाराणसी में प्रतिकार यात्रा के दौरान हंगामा हुआ था. पुलिस ने इस केस में अजय राय को गिरफ्तार कर लिया था.
रही सही कसर अक्टूबर 2015 में पूरी हो गई. 22 सितंबर, 2015 को बनारस में गणेश प्रतिमा विसर्जन को लेकर बवाल हुआ और पुलिस ने साधु-संन्यासियों पर लाठी चार्ज कर दिया. खूब हंगामा हुआ. दंगे जैसी नौबत आ गई और शहर में कर्फ्यू लगाना पड़ा. अजय राय और कांग्रेस के नेताओं ने पुलिसिया ऐक्शन का विरोध किया. 5 अक्टूबर को अन्याय प्रतिकार नाम से एक यात्रा निकाली और इसमें भी बवाल हो गया. यात्रा में शामिल लोगों ने पुलिस पर पत्थरबाजी की. खुद के बचाव में पुलिस ने भी लाठीचार्ज किया और 100 लोगों पर केस दर्ज कर लिया. खुद अजय राय को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. भीड़ को उकसाने और हिंसा में शामिल होने के अलावा पुलिस ने अजय राय के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत ऐक्शन लिया. करीब 9 महीने तक जेल में रहने के बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अजय राय पर लगा रासुका हटा लिया और तब वो रिहा हो सके.

2019 के लोकसभा चुनाव में अजय राय एक बार फिर से चुनावी मैदान में हैं.
रिहाई के बाद भी अजय राय बनारस में सक्रिय रहे और वक्त-वक्त पर बीजेपी की नीतियों का विरोध करते नज़र आते रहे. पंजे के निशान के साथ वोटिंग बूथ पर नजर आने का विवाद हो या एके 47 जैसी राइफल खरीदने का विवाद या फिर प्रधानमंत्री मोदी के चुनाव को हाई कोर्ट में चैलेंज करने का विवाद, उनके साथ विवादों की फेहरिश्त चलती ही रहती है. और वो चलेगी भी, क्योंकि कांग्रेस ने एक बार फिर से अजय राय पर दांव लगाया है. 2019 में अजय राय एक बार फिर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ ताल ठोक रहे हैं.
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