तमिलनाडु को सामाजिक न्याय की राजनीति के मजबूत गढ़ के तौर पर जाना जाता है. इस राज्य की राजनीति गैर ब्राह्मण जातियों के इर्द गिर्द ही घूमती रही है. लंबे समय तक चले सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों के चलते ब्राह्मण राज्य की सियासत में हाशिए पर रहे हैं. लेकिन इस बार तो एक भी बड़ी पार्टी ने उनको टिकट नहीं दिया है. DMK और कांग्रेस ही नहीं, AIADMK और बीजेपी ने भी चुनाव में उन पर दांव नहीं खेला है. पिछले 35 सालों में ये पहला मौका है, जब AIADMK ने किसी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया है.
तमिलनाडु में कैसे हाशिए पर आए ब्राह्मण? इस बार BJP तक ने टिकट नहीं दिया
तमिलनाडु की चुनावी राजनीति में ब्राह्मण लंबे समय से हाशिए पर रहे हैं. लेकिन इस बार तो एक भी स्थापित पार्टी ने उनको टिकट नहीं दिया है. डीएमके और कांग्रेस ही नहीं, AIADMK और बीजेपी ने भी चुनाव में उन पर दांव नहीं खेला है. पिछले 35 सालों में ये पहला मौका है, जब AIADMK ने किसी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया है.


तमिलनाडु में ब्राह्मण समुदाय से मुख्यमंत्री और कई सीनियर नेता रहे हैं. लेकिन द्रविड़ राजनीति के उभार के चलते उनका प्रतिनिधित्व विधानसभा में बेहद सीमित या न के बराबर ही रहा है. इस बार आलम ये है कि एक भी स्थापित राजनीतिक दल ने उन पर भरोसा नहीं जताया है.
तमिलनाडु राज्य के गठन के समय ब्राह्मण कांग्रेस के वोटर थे. वे द्रविड़/पेरियार स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स के ब्राह्मण विरोधी रुख से नाराज थे. पेरियार के सिद्धांतों पर बनी DMK से उनकी दूरी रही है. जब एमजी रामचंद्रन (MGR) के रास्ते DMK से अलग हुए तो उन्होंने AIADMK पार्टी बनाई. तब तक राज्य में कांग्रेस का आधार सिमटने लगा था. ब्राह्मण AIADMK की ओर शिफ्ट हो गए. MGR ने ब्राह्मणों को प्रतिनिधित्व भी दिया.
बाद में AIADMK से मुख्यमंत्री बनी जयललिता खुद ब्राह्मण थीं. वे सामाजिक न्याय और द्रविड़ राजनीति के रास्ते ही चलीं. लेकिन पार्टी में ब्राह्मणों को सांकेतिक प्रतिनिधित्व मिलता रहा. पार्टी कुंभकोणम से आने वाले रामा रामनाथन को लंबे समय तक टिकट देती रही. जयललिता ने उन्हें कांची कामकोटी पीठम के शंकराचार्य स्वर्गीय जयेंद्र सरस्वती की सिफारिश पर मौका दिया था.
मनीकंट्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक, रामनाथन साल 1991 में विधायक बने. वे जयललिता के कट्टर समर्थक थे. कुंभकोणम से 1996, 2001, 2006 और 2011 में भी चुनाव लड़े. लेकिन हर बार हारते रहे. साल 2016 में भी उन्हें टिकट मिला. लेकिन फिर जयललिता ने कैंडिडेट बदल दिया. उनकी जगह नगरपालिका अध्यक्ष रत्ना शेखर को कैंडिडेट बनाया. तब तक जयललिता का शंकराचार्य से मतभेद हो चुका था.
1996 में रामनाथन ने कसम ली थी कि जब तक वे चुनाव नहीं जीतते और जयललिता दोबारा मुख्यमंत्री नहीं बनतीं, तब तक वो शादी नहीं करेंगे. जयललिता मुख्यमंत्री तो बनीं, लेकिन रामनाथन दोबारा चुनाव नहीं जीत पाए. इसलिए उन्होंने आजीवन शादी नहीं की. वे फिलहाल कुंभकोणम से AIADMK के नगर सचिव हैं.
जयललिता ने साल 2016 के विधानसभा चुनाव में भी एक ब्राह्मण उम्मीदवार को टिकट दिया. चेन्नई के ब्राह्मण बहुल मायलापुर विधानसभा सीट से राज्य के पूर्व डीजीपी आर नटराज को कैंडिडेट बनाया. नटराज चुनाव जीते और विधायक बने. हालांकि साल 2021 में वो चुनाव हार गए. साल 2015 में कुछ समय के लिए उनको पार्टी से निष्कासित किया गया था. फिर वापसी हो गई. साल 2023 में स्टालिन सरकार ने उन पर झूठा प्रचार करने के आरोप में मामला दर्ज किया था.
साल 2016 में AIADMK की पूर्व सुप्रीमो जे. जयललिता के निधन के बाद से ब्राह्मण वोटर्स का रुझान बीजेपी की ओर हुआ है. लेकिन पार्टी ने अपने कोटे के 27 सीटों में से एक पर भी ब्राह्मणों को टिकट नहीं दिया है. वहीं पिछले चुनाव में पूर्व डीजीपी आर नटराज को टिकट देने वाली AIADMK ने भी इस बार ब्राह्मण कैंडिडेट से किनारा किया है.
तमिलनाडु के जातीय समीकरण देखें तो ब्राह्मणों की आबादी लगभग 3 फीसदी है. राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आबादी -71 प्रतिशत, दलित आबादी- लगभग 20 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति (1.1 से 1.2 प्रतिशत) और सामान्य वर्ग आबादी (लगभग 4 प्रतिशत) है.
तमिलनाडु में ब्राह्मणों की राजनीति हाशिए पर क्यों?
साल 1947 में आजादी के बाद मद्रास प्रेसीडेंसी बनी. इसमें केरल (मलयालम भाषी) और आंध्र प्रदेश (तेलुगु भाषी) भी शामिल था. साल 1953 में आंध्र प्रदेश और साल 1956 में केरल अलग हुआ. इसके बाद मद्रास राज्य बना. मद्रास प्रेसीडेंसी में आजादी के पहले से ब्यूरोक्रेसी, पॉलिसी और राजनीति में भी ब्राह्मणों का दखल था.
पेरियार ने साल 1925 में जातीय वर्चस्व के खिलाफ 'आत्मसम्मान आंदोलन' शुरू किया. इस आंदोलन का उद्देश्य जातीय वर्चस्व की खिलाफत और पिछड़े-दलितों को सामाजिक समानता दिलाना था. इस आंदोलन ने राज्य की राजनीति को भी प्रभावित किया. साल 1954 में बनी कांग्रेस सरकार का नेतृत्व पिछड़ी जाति से आने वाले के कामराज के हाथ में दिया गया. उनके नेतृत्व में मद्रास पहला राज्य बना जिसके मंत्रिमंडल में कोई ब्राह्मण नहीं था. इसके बाद से तमिलनाडु में पक्ष और विपक्ष दोनों में द्रविड़ पहचान (ओबीसी-दलित) की राजनीति करने वाली पार्टियां ही मुकाबले में रही हैं.
पेरियार के विचारों ने तमिलनाडु की राजनीति को काफी गहराई से प्रभावित किया. उनके विचारों की बुनियाद पर ही DMK और AIADMK जैसी पार्टियां बनीं. सामाजिक न्याय और द्रविड़ पहचान इन राजनीतिक दलों के एजेंडे में सबसे ऊपर है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, रॉबर्ड एल. हार्डग्रेव अपनी किताब ' द द्रविड़ियन मूवमेंट' में लिखते हैं,
आत्मसम्मान आंदोलन ने ब्राह्मण समुदाय को गैर-बराबरी और उत्पीड़न के अलग-अलग प्रतीकों के तौर पर स्थापित कर दिया. तमिलनाडु में ब्राह्मण विरोध एक बयानबाजी भर नहीं बन कर एक विचार के तौर पर स्थापित हो गया.
एस. नारायण अपनी किताब ' द द्रविड़ियन ईयर्स' में लिखते हैं,
तमिलनाडु में द्रविड़ आंदोलन केवल उच्च जातियों के खिलाफ बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा है. इससे निकली सत्ता ने ओबीसी और दलित समुदाय के लिए अवसरों की बराबरी सुनिश्चित की है. यहां प्रशासन और राजनीति ने मिलकर अगड़े समुदाय के वर्चस्व से मुक्ति दिलाई.
यही कारण है कि DMK और AIADMK जैसी बड़ी पार्टियां ब्राह्मणों को टिकट देने से बचती रही हैं. या फिर सांकेतिक प्रतिनिधित्व ही देती रही हैं.
बीजेपी ने टिकट क्यों नहीं दिया?
द्रविड़ पार्टियों और कांग्रेस के अलावा बीजेपी ने भी एक भी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया है. RSS विचारक एस. गुरुमूर्ति से लेकर बीजेपी प्रवक्ता नारायणन तिरुपति तक राज्य में कई ब्राह्मण प्रभावी हैं, लेकिन उनमें से कोई भी चुनाव नहीं लड़ रहा है. ये स्थिति तब है जब राज्य में बीजेपी को 'ब्राह्मण पार्टी' के तौर पर देखा जाता है.
मद्रास यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर रहे राम मणिवन्नन का मानना है,
बीजेपी को इसका जवाब देना चाहिए. पार्टी में ब्राह्मण नेतृत्व अपना दबदबा चाहता है. निर्णय लेने में अपनी भूमिका चाहता है. लेकिन चुनाव नहीं लड़ना चाहता.
तमिलनाडु में बीजेपी द्रविड़ पॉलिटिक्स के खिलाफ जाए बिना सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति के सहारे आगे बढ़ना चाहती है. जबकि DMK और उसकी सहयोगी पार्टियां बीजेपी पर सामाजिक न्याय और द्रविड़ विरोधी राजनीति करने का आरोप लगाती रही हैं. बीजेपी ने ब्राह्मण वोटर्स से किनारा करके विपक्षियों के इन आरोपों को अप्रासंगिक बनाने की कोशिश की है.
नए पावर सेंटर कौन हैं?
हालांकि द्रविड़ राजनीति के दबदबे वाला तमिलनाडु भी जातीय राजनीति से अछूता नहीं है. DMK और AIADMK के शासनकाल में सत्ता कुछ मजबूत ओबीसी जातियों के इर्द गिर्द ही घूमती नजर आती है. जयललिता के दौर में थेवर समुदाय का दबदबा था. इसकी एक बड़ी वजह जयललिता की करीबी सहयोगी वीके शशिकला थीं. जयललिता के निधन के बाद ये संतुलन गौंडर समुदाय की ओर झुक गया. साल 2016 में जयललिता की जीत में भी इस समीकरण का बड़ा रोल रहा. AIADMK के मंत्रिमंडल में भी इन समुदायों का दबदबा था. तब गौंडर समुदाय से आठ और थेवर समुदाय से सात मंत्री थे.
डीएमके की राजनीति भी जाति के असर से बची नहीं है. राज्य में कभी ब्राह्मण संस्थागत रूप से सबसे मजबूत थे. आज मुदलियार जैसे समूहों ने उनकी जगह ले ली है. यानी तमिलनाडु में जाति खत्म नहीं हुई. केवल वर्चस्व का केंद्र बदल गया है. इन समूहों ने ब्राह्मण राजनीति का स्पेस खत्म कर दिया है. इसलिए ब्राह्मणों को सियासी प्रतिनिधित्व मिलना मुश्किल हो रहा है.
सीमान और विजय ने दिया है टिकट
एक्टर-डायरेक्टर से नेता बने सीमान की पार्टी ने 6 ब्राह्मण कैंडिडेट को टिकट दिया है. वहीं एक्टर से नेता बने थलपति विजय की पार्टी तमिलगा वेत्रि कझगम (TVK) ने 2 ब्राह्मणों को टिकट दिया है. इन्होंने मायिलापुर और श्रीरंगम जैसे इलाकों में ये टिकट दिए हैं. जहां ब्राह्मण वोटर्स की निर्णायक भूमिका होती है.
LTTE के समर्थक सीमान द्रविड़ (पेरियारवादी) विचारधारा के विरोधी हैं. वे जाति-धर्म से परे सभी तमिलों के लिए अलग राज्य में यकीन रखते हैं. उनका मानना है कि उत्तर भारत से आने वाली समस्याओं का मुकाबला करने के लिए तमिलों के हितों की रक्षा करना जरूरी है. AIADMK और बीजेपी से टिकट नहीं मिलने से नाराज ब्राह्मण वोटर्स का एक हिस्सा सीमान की ओर जा सकता है. लेकिन इस रास्ते उनको विजय से चुनौती मिलने वाली है. विजय ने साफ किया है कि उनकी पार्टी पेरियार के विचारों को फॉलो करती है. लेकिन वे ब्राह्मणों के विरोधी नहीं हैं.
वीडियो: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच राजनीतिक विवाद क्यों?





















