चुनाव केवल दो चरण में होते हैं. एक- नेताजी आपके चरणों में. और दूसरा- आप नेताजी के चरणों में.
जोक समाप्त. असल दुनिया में आते हैं. लोकसभा चुनाव का पहला चरण समाप्त हो गया है. बाकी 6 चरणों के लिए चुनाव प्रचार जोरों पर है. और जोरों पर है बयानबाजी. नेताओं की बयानबाजी के आधार पर हमने इनके लिए दो कैटेगरी बनाई है.
एक होते हैं हाथ जोड़कर वोट मांगने वाले. दूसरे हाथ तोड़ने की धमकी देकर वोट मांगने वाले.
पहले टाइप में आते हैं संबित पात्रा. ओडिशा के पुरी से चुनाव लड़ रहे हैं. इनका प्रचार का स्टाइल सोशल मीडिया पर खूब वायरल है. कहीं जमीन पर पड़े हैं तो कहीं खाने पर भिड़े हैं. कहीं साईकिल चला रहे हैं तो कहीं बच्चों को खिला रहे हैं. साथ में चुनाव प्रचार भी कर रहे हैं. टीवी पर भले ही कितना चीखें चिल्लाए, धमकी दें लेकिन चुनाव पूरी शालीनता से लड़ रहे हैं.

संबित पात्रा के चुनाव प्रचार की ये फोटोज सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहीं हैं. (फोटो- फेसबुक)
लेकिन ये जो दूसरे टाइप के लोग होते हैं इनकी सारी कर्मठता, विनम्रता और शालीनता पोस्टर्स तक ही सीमित होती हैं. असल जिंदगी में इनका इससे दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता. दूसरे टाइप के लोगों में कई सारे नाम हैं. उदाहरण के लिए साक्षी महाराज को ले लीजिए. उत्तर प्रदेश के उन्नाव से चुनाव लड़ रहे हैं. कुछ दिन पहले खुद को पिछड़ी जाति का बताकर पार्टी से टिकट मांग रहे थे. ये अलग बात है कि संन्यासी की कोई जाति नहीं होती. अब खुद को संन्यासी बताकर वोट मांग रहे हैं. 12 अप्रैल को एक सभा में बोले,
''मैं एक संन्यासी हूं और एक संन्यासी जब भिक्षा मांगता है और उसे भिक्षा नहीं मिलती तो गृहस्थी के पुण्य ले जाता है. अगर आपने एक संन्यासी को वोट नहीं दिया तो मैं अपने पाप आपको दे जाऊंगा.''
कुछ लोग इसे धमकी बता रहे हैं. लेकिन ये भी कोई धमकी है भला? हम नहीं मानते. हम इसलिए नहीं मानते कि साक्षी महाराज के वोट मांगने के इस तरीके को धमकी कहना धमकी शब्द की बेइज्जती है. धमकी तो मेनका गांधी ने दी है. सीधे, एकदम खुल्लम-खुल्ला. बोलीं, अगर मुसलमान मुझे वोट नहीं देते तो हम भी उनका काम नहीं करेंगे. ये होती है धमकी. देखिए वीडियो-

साक्षी महाराज की वोटों के लिए धमकी में कोई दम नजर नहीं आता. (फोटो- फेसबुक)
लेकिन साक्षी महराज की ये बात काम की है
''मैं धन या दौलत नहीं मांग रहा हूं. लोगों से वोट मांग रहा हूं, जिससे 125 करोड़ देशवासियों की किस्मत बदलनी है. मतदान, कन्यादान करने के बराबर होता है. जब कन्यादान करते हैं तो हजार बार खूब सोच समझकर करते हैं. कन्यादान से तो एक बेटी के भाग्य का फैसला होता है. यहां तो लाखों लोगों के भाग्य की बात है. इसलिए सभी लोग घर से निकलकर मतदान करें.''साक्षी महाराज की इस लाइन से हम बिल्कुल सहमत हैं. खूब सोच समझकर मतदान करें. आखिर 125 करोड़ देशवासियों के किस्मत की बात है. खूब सोच समझकर चुनिए.
और अंत में एक चुनावी भाषण पढ़ते जाइए. डिस्क्लेमर- आजकल के नेताओं के भाषण को देखते हुए हमें इस तरह के चुनावी भाषण और बयान की उम्मीद बिल्कुल नहीं है. ये हम बस जनरल नॉलेज के लिए बता रहे हैं.
साल 1951. दिसंबर का महीना. देश में पहली बार लोकसभा का चुनाव होने जा रहा था. प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अपने गृहनगर इलाहाबाद में आनंद भवन के पास एक सभा को संबोधित कर रहे थे. बोले, ''काफी अरसे बाद इलाहाबाद में आपके सामने हूं. तब भी आपसे ये नहीं कह सकता कि लोकसभा का चुनाव लड़ रहा हूं इसलिए मुझे वोट दीजिए. मैं यह भी नहीं कह सकता कि अगर आप मुझे वोट नहीं दोगे तो मैं आपको छोड़कर चला जाऊंगा. चाहे वह इलाहाबाद हो या कोई दूसरी जगह. मैं कहीं भी न तो अपना बचाव करूंगा और न वोट देने की अपील करूंगा. यह बिल्कुल अजीब बात है कि जब मैंने अपना पूरा जीवन जनता की सेवा में बिता दिया. कुछ अच्छा काम किया और कुछ गलतियां भी कीं. तो अब जब मेरी जिंदगी के चंद साल बाकी हैं तो मैं झूठे वादे क्यों करूं?''
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