अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में रिकॉर्ड गिरावट आई है. आप सोच रहे होंगे कि इसमें कौन सी बड़ी बात है, रुपये में गिरावट तो हम रोज ही सुनते रहते हैं. लेकिन यह गिरावट कई मायनों में बड़ी है. सोमवार 9 मई को रुपया डॉलर के मुकाबले अब तक के सबसे निचले स्तरों तक जा गिरा यानी 77.50 रुपये प्रति डॉलर तक. यह गिरावट एक ऐसे दौर में आई है, जब अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ाने का सिलसिला थमा नहीं है और भारत में महंगाई सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है. आज हम इसी गुत्थी को सुलझाएंगे कि रिकॉर्ड लेवल तक गिरता रुपया, कैसे सरकारी बजट ही नहीं आपके अपने घर का बजट भी बिगाड़ सकता है. वह पहले से कहर ढाती आ रही महंगाई की आग में कैसे घी का काम करेगा. यही नहीं, शेयर, म्यूचुअल फंड, बॉन्ड में निवेश से लेकर आपके बैंक बैलेंस और जमापूंजी पर इसका क्या असर होगा ?
रुपये में रिकॉर्ड गिरावट का आपकी जेब और जमापूंजी के लिए क्या मतलब है ?
यह गिरावट एक ऐसे दौर में आई है, जब अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ाने का सिलसिला थमा नहीं है और भारत में महंगाई सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है.


बढ़ती महंगाई और ब्याज दरें
रुपये में रिकॉर्ड गिरावट के साथ ही देश का विदेशी मुद्रा भंडार कई महीने बाद 600 बिलियन डॉलर से नीचे चला आया है. विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट का मतलब है, हमारा विदेशी बाजारों में खरीद क्षमता का घटना. शेयर बाजारों में लगातार गिरावट से तो आप वाकिफ हैं ही. आज भी सेंसेक्स करीब 364 पॉइंट टूटकर बंद हुआ. इन सब गिरावटों के पीछे की कहानी जहां से शुरू होती है, वहीं आकर खत्म होती है.यानी महंगाई. दुनिया भर में महंगाई कई वर्षों के रिकॉर्ड तोड़ रही है. दुनिया की सबसे बड़ी इकॉनमी अमेरिका में यह 40 साल के उच्चतम स्तर पर 8 फीसदी से भी ज्यादा है. बात यहीं से शुरू करते हैं. अमेरिका में बढ़ती महंगाई से निपटने के लिए फेडरल रिजर्व यानी वहां के केंद्रीय बैंक ने करीब चार साल बाद बाजारों से नकदी समेटने का फैसला किया. इसके लिए ब्याज दरों में इजाफे का दौर शुरू हुआ, जो अगले कई महीनों तक चलेगा. पिछले हफ्ते ही अमेरिकी ब्याज दरों में 50 बेसिस पॉइंट यानी करीब आधा फीसदी की फिर बढ़ोतरी की गई. जिस देश में ब्याज दरें जीरो फीसदी के आसपास रही हों, वहां आधा फीसदी इजाफे का अंदाजा आप लगा सकते हैं.
दुनिया में डॉलर का दबदबा
दुनिया की तमाम मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की कीमत बढ़ रही है. इसे मापने का एक पैमाना डॉलर इंडेक्स भी है. यह इंडेक्स दुनिया की छह सबसे बड़ी करंसी के औसत मूल्य के मुकाबले डॉलर की कीमत दर्शाता है. दुनिया का 85 फीसदी व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता है. करीब 40 फीसदी लोन डॉलर में लिए और दिए जाते हैं. हमारे रिजर्व बैंक यानी RBI जैसे दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों के विदेशी मुद्रा भंडार में 60 फीसदी से ज्यादा डॉलर ही होता है. ज्यादातर देश आपसी व्यापार में भी अपनी मुद्रा के बजाय डॉलर ही लेते और देते हैं. ऐसे में भारत जैसे देश जो निर्यात से ज्यादा आयात करते हैं. उनका खर्च बढ़ जाता है और उनकी मुद्रा भी कमजोर होती है. तो रुपये की कीमत में मौजूदा गिरावट की वजह तो आप समझ गए होंगे. लेकिन कहानी में अभी कई ट्विस्ट हैं.
FII ने निकाले 1.3 लाख करोड़
जब डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर हुआ तो यहां के शेयर बाजारों और दूसरे निवेश जरियों मे पैसा लगाने वाले विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी FII का रिटर्न यानी कमाई घट जाती है. जाहिर है, वो अपना पैसा यहां के बाजारों से निकालने लगते हैं. जैसा कि FII ने भारतीय शेयर बाजारों में बिकवाली की है. इस साल जनवरी से लेकर अब तक FII ने भारतीय शेयर बाजारों से 1.3 लाख करोड़ रुपये निकाल लिए हैं. इससे आपको निवेश पर तो चपत लगी होगी, लेकिन महंगा डॉलर सबसे ज्यादा कोहराम कहीं और मचाता है. बताते हैं. भारत अपनी जरूरत का 85 पर्सेंट क्रूड ऑयल विदेश से मंगाता है, जिसकी कीमत डॉलर में चुकानी होती है. यूक्रेन-रूस वॉर के बाद क्रूड ऑयल के दाम करीब 40 फीसदी तक चढ़ गए. एक समय यह रिकॉर्ड 139 डॉलर प्रति बैरल तक चला गया. जाहिर है, भारत का इम्पोर्ट बिल भी इसी अनुपात में बढ़ा होगा. सरकार ने अपना बजट यह सोचकर बनाया था कि क्रूड के दाम 70-80 डॉलर के बीच रहेंगे. यानी सरकार का पूरा बजट गड़बड़ा गया और आपको मिलने वाली कई रियायतें धरी रह गई होंगी. लेकिन हमारी कहानी आपको कुछ और ही समझाने चली थी, तो उधर ही चलिए. हुआ यों कि जब क्रूड के दाम रिकॉर्ड लेवल पर चले गए और इम्पोर्ट बिल बढ़ गया तो पेट्रोल-डीजल के साथ कई चीजें अचानक महंगी हो गईं. देश की खुदरा महंगाई दर करीब 7 फीसदी के रिकॉर्ड लेवल तक जा पहुंची. नतीजतन पिछले दिनों आरबीआई ने भी आनन-फानन में ब्याज दरें बढ़ाने की घोषणा कर दी. ब्याज दरें बढ़ाने के पीछे मकसद सिर्फ महंगाई कंट्रोल करना ही नहीं होता है. डॉलर के मुकाबले गिरते रुपये को थामना भी होता है.
क्या-क्या होगा असर
लेकिन अब, जब ब्याज दरों में इजाफे के बाद भी रुपया गिरता ही जा रहा है, तो सवाल उठता है कि अब आरबीआई क्या करेगा ? क्योंकि गिरता रुपया नहीं थमा, तो यह आप पर कई तरह की गाज गिराएगा. पहला यह कि महंगाई दर और ऊपर जाएगी. रसोई गैस से लेकर खाने-पीने की जिन तमाम चीजों की महंगाई से आप परेशान हैं, वो यहां से भी कहीं ऊपर और महंगाई होती नजर आएंगी. दूसरा, ब्याज दरें बढ़ने से आपके कर्ज महंगे हो जाएंगे और मासिक किस्तें बढ़ जाएंगी, जो अब बढ़ने भी लगी हैं. कहने का मतलब यह कि यह सिलसिला तेजी पकड़ेगा. अगर आप इस मुगालते में जी रहे हैं कि चलो लोन महंगे होंगे तो बैंक में हमारी जमा पूंजी पर भी तो ज्यादा ब्याज मिलेगा. मसलन, फिक्स्ड डिपॉजिट के रेट भी तो बढ़ेंगे. आपकी खुशफहमी भी दूर किए देते हैं. अगर एफडी पर आपको ब्याज 6 फीसदी की जगह 7 फीसदी ब्याज मिलने लगे और महंगाई 7 फीसदी पर कायम रहे तो आपको वास्तविक रिटर्न मिलेगा निल यानी शून्य. कुछ भी नहीं. और रुपया गिरता रहा और रिटेल महंगाई दर 8 फीसदी या इससे ज्यादा हो जाए तो आपको रिटर्न मलेगा नेगेटिव यानी बैंक में रखा पैसा दिखने में बढ़कर आएगा लेकिन वास्तव में उसका मूल्य घट चुका होगा.
गिरते रुपये और चढ़ते डॉलर का एक दूसरा पहलू भी है. अगर बाहर से आने वाला माल महंगा पड़ता है तो जाहिर है देश से बाहर जाकर बिकने वाला माल ज्यादा मुनाफा भी देगा. यानी भारत से जितना कुछ निर्यात होगा, उस पर अतिरिक्त कमाई होगी. देश की आईटी और फार्मा कंपनियां सबसे ज्यादा एक्सपोर्ट करती हैं. इस हिस्से का उनका रेवेन्यू डॉलर में आता है. ऐसे में आईटी कंपनियों के लिए ये हालात फायदेमंद होंगे. इसी तरह देश के लाखों मजदूर और कर्मचारी विदेश में काम कर रहे होते हैं. उनकी सैलरी तो उतनी ही रहती है, लेकिन डॉलर के महंगा होने से घर आने वाला पैसा बढ़ जाता है. इसके उलट अगर रुपया मजबूत होने लगे तो एक समय ऐसा आएगा, जब भारत से माल मंगाने वाले विदेशी इम्पोर्टर दूसरे बाजारों का रुख करने लगेंगे यानी हमारा एक्सपोर्ट गिरेगा.
अब आप सोच रहे होंगे कि गिरते रुपये को संभालने के लिए सरकार और आरबीआई कुछ करते क्यों नहीं ? भारत में रुपये का मूल्य सरकार तय नहीं करती. यह पूरी तरह फॉरेन एक्सचेंज मार्केट के हवाले होता है. हालांकि साल 1975 तक करंसी रेट में सरकार का दखल खूब हुआ करता था. जैसा कि चीन सहित दुनिया के कई देश अब भी करते हैं. हालांकि आज भी आरबीआई रुपये को गिराने या चढ़ाने में बहुत हद तक दखल दे सकता है. मसलन, रुपये को ताकत देने के लिए फरवरी से ही आरबीआई डॉलर की खूब बिकवाली कर रहा है. इसी के चलते इसका विदेशी मुद्रा भंडार 8 महीने के निचले स्तर तक गिरकर आज 600 अरब डॉलर से भी कम हो गया है. इसके अलावा वह ब्याज बढ़ाकर भी रुपये में गिरावट थाम सकता है, जैसा कि उसने अभी हाल ही में किया है. लेकिन दोनों ही हथियार दोधारी हैं. यानी इससे अपना भी नुकसान हो सकता है. मसलन, अगर रुपया खूब मजबूत हो जाए तो एक्सपोर्ट गिरेगा यानी देश में डॉलर कम आएगा. इस तरह से आरबीआई का विदेशी मुद्रा भंडार फिर घटने लगेगा.
( इस मसले पर डिटेल्ड वीडियो और एक्सपर्ट व्यू के लिए देखें- खर्चापानी, एपिसोड-324
अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ीं तो भारत के लोगों की जेब पर कैसे होगा असर?




















