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हेल्थ इंश्योरेंस लेते समय कहीं आप भी तो नहीं करते ये 10 गलतियां?

वेटिंग पीरियड, हॉस्पिटल का खर्चा जैसी कई और अहम चीजें हैं जिन्हें पढ़कर ही सही पॉलिसी चुननी चाहिए.

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मेडिकल इंश्योरेंस लेते समय कभी भी कंपनी से हेल्थ को लेकर कोई झूठ नहीं बोलना चाहिए. (तस्वीर साभार- Freepik)

बीमा कंपनियों से पॉलिसी लेना जितना आसान होता है उतना ही मुश्किल होता है उनसे क्लेम का पैसा वापस लेना. पॉलिसी होल्डर्स की यही शिकायत रहती है कि बीमा कंपनी क्लेम का पैसा देने में आनाकानी कर रही है. मगर यहां पर जितनी गलती कंपनियों की है उसे थोड़ी ज्यादा आपकी है. पॉलिसी लेते वक्त लोग कई गलतियां करते हैं, जिसकी वजह से उन्हें क्लेम मिलने में दिक्कत आती है. जैसे- नियमों-शर्तों को हल्के में लेना, उनकी डिटेल अच्छे से न पढ़ना-समझना आप पर बाद में भारी पड़ता हैं. इसलिए आइए जानते हैं हेल्थ इंश्योरेंस लेते समय कौन सी गलतियां हो सकती हैं और उनसे कैसे बच सकते हैं. 

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शहर के हिसाब से चुनें पॉलिसी

कई इंश्योरेंस कंपनियां इलाके के हिसाब से पॉलिसी का दाम तय करती हैं. टियर-1 यानी मेट्रो सिटीज में पॉलिसी का प्रीमियम ज्यादा होता है. जबकि, टियर-2 और टियर-3 शहरों में मेडिकल का खर्चा बड़े शहरों के मुकाबले सस्ता होता है. इसलिए यहां का प्रीमियम भी सस्ता होता है. अगर आप टियर-2 या टियर-3 में रहते हैं तो बीमा कंपनी से सिटी स्पेसिफिक इंश्योरेंस पॉलिसी मांग सकते हैं. इससे आपका प्रीमियम सस्ता हो जाएगा.

आंख खोलकर पढ़ें नियम-शर्तें

पॉलिसी के नियमों में ये साफ-साफ लिखा होता है कि किस स्थिति में बीमा का पैसा मिलेगा और कब नहीं. वैसे तो पॉलिसी देते वक्त बीमा कंपनी ये सभी चीजें बता देती है. मगर ये ग्राहकों की जिम्मेदारी होती है कि पॉलिसी में लिखी सभी चीजें एक बार खुद से पढ़ लें. अगर कोई चीज समझ नहीं आ रही है तो बीमा कंपनी से उसे समझ लें. हर बीमा पॉलिसी 15 दिनों के फ्री लुक पीरियड में आती है. पॉलिसी को पढ़ते हुए अगर पॉलिसी होल्डर को कोई चीज नहीं जमती है तो वो आराम से फ्री लुक पीरियड में पॉलिसी कैंसिल कर सकता है. बीमा कंपनी सारा पैसा भी वापस करेगी.

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कितने का हो कवरेज?

ज्यादातर लोग मेडिकल इंश्योरेंस के नाम पर जितनी रकम का बीमा कमाते हैं, वो उनकी जरूरत से काफी होता है. बड़ी बात ये है कि उन्हें इसका अंदाजा भी नहीं होता. जब कोई मेडिकल इमरजेंसी आती है, और क्लेम करने पर मालूम पड़ता है कि बीमा के पैसे तो कम पड़ गए. अगर अंदाजा लगाने में दिक्कत आ रही हो तो ये फॉर्म्यूला अपना सकते हैं. सैलरी का 50 फीसदी प्लस पिछले तीन सालों में जितना भी हॉस्पिटल का खर्चा आया है वो सब जोड़ लें….इस तरह जो रकम आए उतने का कवरेज आपके लिए काफी होगा. इसके अलावा फैमिली में कितने सदस्य हैं, उनकी सेहत कैसी है, उन्हें कोई बीमारी तो नहीं है…इन चीजों को देखते हुए पॉलिसी चुनें.

को-पे की शर्तें

कई इंश्योरेंस पॉलिसी ऐसी होती हैं जिनमें क्लेम का एक तय फीसदी हिस्सा पॉलिसी होल्डर को देना पड़ता है. बाकि का खर्चा बीमा कंपनी उठाती है. टोटल क्लेम का कितना हिस्सा आप भरेंगे ये बीमा कंपनी और आपकी स्थिति पर निर्भर करता है. ज्यादातर पॉलिसी में 10 से 20 फीसदी खर्चा पॉलिसी होल्डर करता है. ये प्रावधान अक्सर उन लोगों की पॉलिसी में जोड़ा जाता है, जिन्हें कोई खास तरह की बीमारी हो, नॉन-नेटवर्क हॉस्पिटल में या मेट्रो शहरों में इलाज करा रहे हों या फिर सीनियर सिटिजन के लिए. को-पेमेंट वाली पॉलिसी का प्रीमियम दूसरे तरह के हेल्थ प्लान से सस्ता होता है.

हॉस्पिटल का खर्चा

पॉलिसी में हॉस्पिटल में भर्ती होने पर कौन-कौन सा खर्च कवर होगा, ये जरूर देख लें. जैसे कि डॉक्टर की फीस, डायग्नोस्टिक टेस्ट का खर्चा, ICU चार्ज, सर्जरी का खर्चा, हॉस्पिटल रूम का किराया. हॉस्पिटल में भर्ती होने से पहले भी काफी खर्चा आ जाता है. एक अच्छी पॉलिसी में हॉस्पिटलाइजेशन के साथ-साथ 15 से 60 दिनों से पहले का खर्चा भी कवर होता है. इसमें डॉक्टर विजिट, डायग्नोस्टिक टेस्ट और अन्य खर्चे आते हैं. इसी तरह पॉलिसी में हॉस्पिटल से डिस्चार्ज के बाद भी कई छोटे-मोटे खर्चे होते हैं. कई कंपनियां हॉस्पिटल से डिस्चार्ज के बाद 30 से 90 दिनों तक जो भी खर्चा आता है, उसे भी वापस करती हैं.

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फ्री हेल्थ चेक अप

कई हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी फ्री हेल्थ चेकअप की सुविधा भी देती हैं. ताकि, कोई दिक्कत दिख रही हो तो उसे शुरुआती स्टेज में ही ट्रीट किया जा सके. इसमें कस्टमर और बीमा कंपनी दोनों का फायदा होता है. इसलिए पॉलिसी लेते हुए देख लेना चाहिए कि हर साल कितने रुपये तक का फ्री चेक अप करा सकते हैं.

वेटिंग पीरियड

पॉलिसी में कुछ खास तरह की बीमारियों के लिए एक से 4 साल तक का वेटिंग पीरियड होता है. वेटिंग पीरियड वाला समय बीतने के बाद ही पॉलिसी के तहत क्लेम कर सकेंगे. कई बार ऐसा होता है कि लोग वेटिंग पीरियड के बारे में ज्यादा पता नहीं करते हैं. बाद में क्लेम करने पर मालूम पड़ता है कि वेटिंग बीतने के बाद ही क्लेम किया जा सकता है. कई बार थोड़ा बहुत प्रीमियम बढ़ाकर वेटिंग पीरियड कम करावाया जा सकता है.

सब लिमिट से जुड़े नियम-शर्तें हैं जरूरी

हेल्थ इंश्योरेंस में सब-लिमिट सबसे अहम होते हैं. दरअसल, बीमा कवर का पैसा अलग अलग स्थितियों जैसे कि कोई खास बीमारी या कोई खास खर्च के नाम पर बांटा जाता है. जिस स्थिति पर अधिकतम जितने रुपये की सब लिमिट तय है कंपनी उससे ज्यादा पैसा वापस नहीं करती. जानकारी ना होने की वजह से लोग लिमिट से ज्यादा खर्च देते हैं और बाद में क्लेम के समय पछतावा करते हैं.

कंपनियां हॉस्पिटल रूम रेंट, एंबुलेंस चार्ज, डॉक्टर कंसल्टेशन फीस या किसी खास मेडिकल ट्रीटमेंट जैसे कि घुटना प्रत्यारोपण (Knee Transplant) या किडनी प्रत्यारोपण (Kidney Transplant) पर सब लिमिट तय करती हैं. सब लिमिट के साथ आने वाले प्लान अक्सर दूसरे तरह के प्लान के मुकाबले सस्ते होते हैं. इसलिए अगर आप सिर्फ सस्ता प्रीमियम देखकर कोई हेल्थ प्लान ले रहे हैं तो सब-लिमिट के बारे में जरूर पता कर लें.

बीमारी छुपाने की गलती न करें

कई लोग हेल्थ बीमा लेते समय बीमारी या अपना पुराना मेडिकल रिकॉर्ड छिपा लेते हैं. उन्हें डर होता है कि सारी चीजें बताने से पॉलिसी नहीं मिलेगा या फिर ज्यादा प्रीमियम देना पड़ेगा. इंश्योरेंस कंपनियां और इंश्योरेंस एक्सपर्ट्स सालों से ये सलाह दे रहे हैं कि ये गलती कभी नहीं करनी चाहिए. 

दरअसल, बीमारी छिपाकर आपको हेल्थ प्लान तो मिल जाएगा. बाद में जब बीमा क्लेम करने जाएंगे तो पैसा देने से पहले कंपनी डिटेल में जांच पड़ताल करती है. इस जांच पड़ताल में सब निकल आता है, आपको पहले से कौन सी बीमारी है और आपने उसकी जानकारी कंपनी को नहीं दी. इस हाल में आपका क्लेम रद्द कर दिया जाता है. साथ ही बाद में आपको अन्य कंपनी पॉलिसी देने से बचेगी.

सेटलमेंट क्लेम में देरी

कई पॉलिसीहोल्डर शिकायत करते हैं कि बीमा कंपनी पैसा देने में काफी समय लगाती हैं.  इससे पॉलिसीहोल्डर्स को अतिरिक्त मानसिक और वित्तीय दबाव उठाना पड़ता है. इससे बचने के लिए पॉलिसीहोल्डर्स को पहले से सारे कागज तैयार रखने चाहिए. इसमें टेस्ट रिपोर्ट, रसीद, बिल, पॉलिसी के नियम कानूनों की कॉपी, क्लेम फॉर्म जैसी चीजों हो सकती हैं. जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी सारे कागज जमा कर दें. इन कदमों से क्लेम की प्रक्रिया तेजी से बढ़ती है. इसके बाद भी अगर क्लेम सेटल होने में देरी हो रही है तो बीमा कंपनी के बड़े अधिकारियों के पास शिकायत कर सकते हैं. 

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