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यूपी इलेक्शन में पार्टियां जीतेंगी तो इसलिए, और हारेंगी तो इसलिए!

भारतीय पंचांग के हिसाब से मकर संक्रांति के बाद सूर्य उत्तरायण हो जाता है. दिन बड़े होने लगते हैं और बसंत दस्तक देने के लिए तैयार हो जाता है. वैसे बसंत आमों में बौर आने का भी मौसम है और आम जनों के बौराने का भी.

यूपी के चुनाव में कई सारे अगर-मगर अब निपट चुके हैं. साइकिल को हाथ धक्का देगा इसकी तस्दीक हो चुकी है. भाजपा ने भी उम्मीदवारों की दो लिस्ट जारी कर दी हैं. अब वो समय शुरू हो चुका है जिसमें तमाम चुनावी विश्लेषक आंकड़ों के गणित से खेलना शुरू कर देते हैं. इन सब से इतर नज़र डालते हैं इस चुनाव में टॉप पार्टियों की कमज़ोरियों और ताकत परः


1. समाजवादी पार्टी

साल 2016 का नवां महीना चल रहा था, उत्तर प्रदेश में एक नए नेता के जन्म लेने के लक्षण दिखने लगे थे. अफवाहें चाहे जो भी कह रही हों मगर अंदर की खबर रखने वाले जानते थे कि चाचा-भतीजे की ये लड़ाई नकली नहीं है. लोग मुलायम सिंह को स्क्रिप्ट राइटर समझ रहे थे. नेताजी में इतनी ही समझ होती तो कब का प्रधानमंत्री बनने का अपना सपना सच कर चुके होते. अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में पार्टी की गुंडागर्दी वाली छवि से खुद को अलग करने के लिए मोहरे लगाने में लगे थे. एक ऊंची टीआरपी वाले न्यूज़ शो में इंटरव्यू देना, पत्नी को बराबरी से अपने पूरे पॉलिटिकल कैंपेन का हिस्सा बनाना, बीवी व बच्चों के साथ लगाव को खुलकर दिखाना – ये अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के कैंपेन से लिए गए कुछ ऐसे सूत्र हैं जिनकी सफलता आज की पीआर वाली राजनीति में असंदिग्ध है. खैर, इसके बाद क्या हुआ ये तो आपको पता ही होगा तो सीधे बात करते हैं अखिलेश की (अब सपा से बड़ा ब्रांड वो ख़ुद हैं).

पार्टी की ताकतः

# अखिलेश ने काम तो किया है मगर..! मगर के बाद आने वाला ये फिल इन द ब्लैंक ही अखिलेश की सबसे बड़ी समस्या थी और लग रहा है कि इस तमाम सियासी ड्रामे के बाद वो इससे लगभग छुटकारा भी पा गए हैं. हालांकि एक बात मान कर चलिए कि दोबारा सत्ता मिलने की स्थिति में अखिलेश फिर से शिवपाल को जगह देंगे और अपने कुनबे के बाकी समाजवादियों को भी. बस एक ही नई चीज़ होगी कि आगे से अखिलेश इस वानर सेना के नए कोच कबीर खान होंगे. यानी एक टीम में एक ही…. समझ गए न.

# 2012 में जब समाजवादी पार्टी को बहुमत मिला तो उन्हें कुल 29 प्रतिशत वोट मिले थे और वो बहुमत में आ गए. 2014 में मोदी लहर में जब सारे तम्बू उखड़ गए तब भी सपा को 22 प्रतिशत वोट मिला. माना जा सकता है कि  लगभग 20 प्रतिशत का ये वोटर सपा का अपना वोटर है जो इस चुनाव में भी ‘टीपू’ के साथ रहेगा. इसके साथ ही 2014 में कांग्रेस को वोट देने वाले 7.50 प्रतिशत वोटर भी जोड़ लिए जाएं तो वोटिंग के आंकड़ों के आधार पर ये युवा समाजवादी अभी मज़बूत स्थिति में दिख रहे हैं.

कमज़ोरियांः

# भले ही उदय प्रताप सिंह जैसे पुराने दिग्गज भी मुलायम को छोड़कर अखिलेश की तरफ हो गए हों, मगर दो फाड़ हुआ है तो नुकसान तो होगा ही.

# खास तौर से मुस्लिम वोटर को अभी भी अनिश्चितता से देखा जाना चाहिए. यूपी के मुसलमान आखिरी समय में इक तरफा वोटिंग करने के लिए जाने जाते हैं और मायावती इस समय उन्हें लुभाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं. मुज़फ्फरनगर के ज़ख्म अभी भी कुरेदे जा सकते हैं.

# उत्तर प्रदेश में 54 फीसदी पिछड़ी जातियों की आबादी है. अखिलेश के उम्मीदवारों की लिस्ट में शिवपाल का भी नाम है. अधिकांश सवर्ण वोटर 2012 में ही बीएसपी से किनारा कर चुका है. ऐसे में भाजपा इस विवाद के स्क्रिप्टेड होने और शिवपाल, मुलायम और अखिलेश के अंदर से एक होने का भरोसा दिलाना चाहेगी. ऐसा होने पर उसके लिए सवर्ण वोट हासिल करने के साथ-साथ कई ओबीसी जातियों से वोट पाना बहुत मुश्किल नहीं होगा. ये कॉम्बिनेशन अगर जीत का पक्का फॉर्मुला न भी हो तो भी बहुमत के काफी करीब तो पहुंचा ही सकता है.


2. भाजपा

देश की सबसे बड़ी पार्टी से एक ही गलती हुई. अखिलेश यादव लंबे समय से जगह-जगह अपने इंटरव्यू में हल्के-फुल्के अंदाज़ में कह रहे थे कि टिकट तो मैं ही बांटूंगा, मैंने एक ट्रंप कार्ड बचा कर रखा है. सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी की खबरों के बीच इन बयानों को काफी हद तक अनदेखा कर दिया गया था. जब तक काउंटर करने की तैयारी शुरू हुई तो दौर बदल चुका था. दूसरी गलती, केंद्र के भाजपा नेताओं की ये बात है कि उत्तर प्रदेश में कोई काम नहीं हुआ. अखिलेश यादव को टैकल करने में ये रणनीति काम करेगी एेसा मुश्किल है. कुछ बेहतर चाहिए होगा.

पार्टी की ताकतः

# पुराना पड़ने के बाद भी सर्जिकल स्ट्राइक का रेफरेंस कारगर है.

# डीमोनेटाइज़ेशन पर अर्थशास्त्र के विद्वान चाहे जो भी कहें मगर आम धारणा है कि ये देशहित में लिया गया कठोर फैसला है. एटीएम की लाइनों का छोटा होना भी केंद्र सरकार के पक्ष में जाता है.

# पोलराइज़ेशन तो है ही. ब्राह्मण और ओबीसी वोट बैंक में सेंध लगाकर पार्टी सत्ता वापसी कर सकती है.

कमज़ोरियांः

# इस चुनाव में पार्टी की सबसे बड़ी समस्या मुख्यमंत्री का कोई चेहरा न होना है.

# दूसरी दिक्कत विवादास्पद बयान वाले नेताओं को कंट्रोल न कर पाने की करने की है.

# व्यापारी वर्ग पिछले साल के गोल्ड टैक्स विवाद और इस साल की नोटबंदी के चलते खफा है और ऐसे नेताओं के हाथ में ताकत आने से डरता है.


3. बसपा

कहा जाता है मायावती के पास उनका खास वोट बैंक है जो कभी कहीं नहीं जाता है. 21 प्रतिशत दलितों के अलावा खराब कानून-व्यवस्था से नाखुश जनता को अपने साथ लाकर बहनजी सत्ता में वापसी करती रही हैं. मगर इस बार स्थिति अलग है. 2014 में खाता न खुलने से कॉन्फिडेंस तो कम है ही, सपा की गुंडागर्दी वाली इमेज को खुद अखिलेश ने काफी हद तक ठिकाने लगा दिया है.

पार्टी की ताकतः

# बहनजी इस बार 21 प्रतिशत दलित और 19 प्रतिशत मुसलमान वाला दांव खेल रही हैं, अगर ये सही बैठ जाए तो सब कुछ हाथी के फेवर में जा सकता है.

कमज़ोरियांः

# मायावती के खिलाफ एक ही नकारात्मक बात हो सकती है. मुसलमान वोटर को ‘साम्प्रदायिक ताकतों’ के खिलाफ एक चेहरा चाहिए और टीपू भैया इस जगह को भरने में कामयाब हो सकते हैं. अगर ऐसा हुआ तो ये मायावती के करियर का सबसे बड़ा झटका साबित हो सकता है.


4. कांग्रेस

2012 में 28 सीट पर सिमटी कांग्रेस को गठबंधन के चलते 105 सीटों पर लड़ने का मौका मिल रहा है. इससे पहले 1996 में पार्टी ने बसपा के साथ गठबंधन किया था और 126 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. इस चुनाव के साथ ही उत्तर प्रदेश की सियासत में कांग्रेस हाशिये पर चली गई थी. स्ट्रेचर पर पड़ी हुई पार्टी को अपनी प्रासंगिकता पाने का मौका मिल रहा है. मगर इतिहास का एक और पक्ष ये भी है कि इसी उत्तर प्रदेश में जब बीजेपी ने मायावती को समर्थन दिया था तब से पार्टी यूपी में सत्ता से दूर हो गई. कहीं सकारात्मक सा लगता कांग्रेस का ये दांव पूरी कांग्रेस के लिए नेगेटिव न साबित हो.

पार्टी की ताकतः

# कांग्रेस के लिए एक ही सकारात्मक बात है, वो ये कि पार्टी ने जैसे तैसे सपा के साथ गठबंधन कर ही लिया. ऐसे में कमज़ोर ही सही मगर एक उम्मीद है कि पार्टी से दूर जा चुका मुसलमान और किसान वोटर वापस आ जाए.

कमज़ोरियांः

# कांग्रेस की नकारात्मक बातों की लिस्ट कितनी लंबी होगी इसका अंदाज़ा तो देश की सियासत में सबको है. इनमें फिलहाल सबसे खतरनाक बात ये है कि कहीं कांग्रेस का बचा खुचा वोटर भी अखिलेश भैया के खाते में न चला जाए.


ये तो अभी के आंकड़े हैं, सियासत में चीज़ें रोज़ बदलती हैं तो आगे जैसे-जैसे घटनाक्रम बदलेगा हम आपको बताते रहेंगे. चुनाव से जुड़ी हुई लल्लनटॉप खबरों और किस्सों के लिए हमारे साथ बने रहिएगा.


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