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मऊ से ग्राउंड रिपोर्ट: 'मुख्तार अंसारी को इस बार बस मोदी जी ही बचा सकते हैं'

‘अगर रमज़ान में बिजली मिलती है, तो दीवाली में भी बिजली मिलनी चाहिए.’

मऊ में नाश्ता करके होटल से निकले ही थे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ये आवाज़ सुनाई दी. एक काली स्कॉर्पियो लाउडस्पीकर पर उनके भाषण का यह अंश लूप में बजाती हुई निकल गई. चुनावी गीत तो गाड़ियों में हर जगह बज रहे हैं, लेकिन पहली बार प्रधानमंत्री के भाषण का ‘चुनिंदा हिस्सा’ लाउडस्पीकर वाले चुनाव प्रचार में सुनाई दिया. मऊ की सियासत से ही अपेक्षित था कि वो इस तरह आपका स्वागत करे.

SUPPORTERS OUTSIDE OFFICE

मऊ की पहचान कभी कांग्रेस सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे कल्पनाथ राय से थी. वो यूपी की घोसी सीट से चार बार सांसद बने और कांग्रेस ने तीन बार उन्हें राज्यसभा भेजा. मऊ अब मुख्तार अंसारी का इलाका कहलाता है, जिनके लिए अंग्रेजी में बहुत सारे लोग ‘माफिया डॉन’ का विशेषण इस्तेमाल करते हैं. मुख्तार अंसारी के दो बड़े भाई हैं, सबसे बड़े सिबकतुल्लाह अंसारी, फिर अफजाल अंसारी. ये प्रतिष्ठित परिवार रहा है. इनके दादा मुख्तार अहमद अंसारी 1926-27 में कांग्रेस के अध्यक्ष थे. तब मोतीलाल नेहरू पार्टी सचिव हुआ करते थे. जब गाजीपुर में कोई क्रिकेट जानता नहीं था, तब इनके पिता बढ़िया ऑलराउंडर थे. बाद में वो भी सियासत में आए और नगरपालिका चेयरमैन रहे. उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी इनके पटीदार हैं और रिश्ते में चचा लगते हैं.

2005 में मऊ में सांप्रदायिक दंगे हुए थे, जिसमें सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 9 लोगों की मौत हो गई थी. लेकिन स्थानीय अखबारों ने 14 से 17 मौतों की खबर छापी थी. मुसलमानों से पूछा तो उन्होंने खुलकर बात नहीं की. हिंदुओं ने बताया कि दंगों के समय मुख्तार अंसारी यहां खुली जीप में घूमे थे. किसी ने उनके मुंह से भड़काऊ बात नहीं सुनी थी, लेकिन उनकी मौजूदगी से दंगाइयों को बल मिला था. अफजाल अंसारी को मोहम्मदाबाद से चुनाव हराने वाले बीजेपी नेता कृष्णानंद राय की हत्या का आरोप मुख्तार पर ही लगा था.

Mau Police

लेकिन अखिलेशवादी सपा से निकाले जाने के बाद अंसारी बंधु बसपा में लौट आए हैं. 2007 में वो बसपा से जुड़े थे और 2010 में आपराधिक हरकतों से ही मायावती ने उन्हें निकाल दिया. इसके बाद उन्होंने अपनी पार्टी बना ली, नाम रखा- कौमी एकता दल. चुनाव से पहले मुलायम उनका सपा में विलय चाहते थे, लेकिन अखिलेश अड़ गए और ऐसा नहीं होने दिया. उधर बसपा को पूर्वांचल में मुस्लिम वोटों की जरूरत थी, तो उन्होंने अंसारी बंधुओं को तुरंत नीली टोपी पहना दी. मायावती ने कहा कि अंसारी बंधुओं को झूठे आरोपों में फंसाया गया है.

बसपा की जनसभा
बसपा की जनसभा

अब मऊ और गाजीपुर जिले में अंसारी परिवार के तीन लोग बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. मऊ से खुद मुख्तार अंसारी जो जेल में हैं. पड़ोस की घोसी सीट से उनका बड़ा बेटा अब्बास अंसारी, जो नेशनल लेवल का शूटर रहा है. और गाजीपुर जिले की यूसुफपुर-मोहम्मदाबाद सीट से मुख्तार के सबसे बड़े भाई सिबकतुल्लाह अंसारी.

अब्बास अंसारी (फोटो उन्हीं की फेसबुक वॉल से)
अब्बास अंसारी (फोटो उन्हीं की फेसबुक वॉल से)

अब आगे आप मऊ सीट के समाचार सुनिए. मतलब पढ़िए.

ये उत्तर प्रदेश के उन इलाकों में है, जहां हिंदू-मुस्लिम का खेल बहुत ज्यादा होता है. मुख्तार अंसारी लगातार चार बार से विधायक हैं. जेल में रहते हुए चुनाव जीत जाते हैं. पहली बार बसपा से जीते थे, फिर दो बार निर्दलीय और चौथी बार कौमी एकता दल से. 2009 के आम चुनावों में मुरली मनोहर जोशी को सांसें रोकने वाली टक्कर दी थी. 2014 में भी मोदी के खिलाफ लड़ने वाले थे लेकिन सेक्युलर वोटों का बंटवारा ना हो, इसलिए नाम वापस ले लिया. मुख्तार पर हत्या और हत्या के प्रयास के चार-चार केस हैं.

मऊ, जहां 4 मार्च को चुनाव हैं.
मऊ, जहां 4 मार्च को चुनाव हैं.

इस बार मऊ में समीकरण काफी बदल गए हैं. यहां मुस्लिम बुनकर, राजभर और दलित वोट काफी अहम है. मुख्तार के बसपा में जाने से दलित तो उनके साथ आ गया है, लेकिन अखिलेशवादी मुसलमान टूट गया है. पिछली बार मुख्तार सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (भासपा) से गठबंधन करके लड़े थे. इसलिए 60 हजार राजभर वोटों का बड़ा हिस्सा उन्हें मिला था. लेकिन इस बार ये पार्टी बीजेपी के साथ है.

इस सीट से बीजेपी नहीं लड़ रही है. मतलब ये है कि बीजेपी ने भासपा से गठबंधन किया है और ये सीट उनके खाते में गई है. इस पार्टी के अध्यक्ष हैं ओमप्रकाश राजभर. बीजेपी चाहती थी कि ओमप्रकाश खुद यहां से लड़ें, लेकिन उन्होंने महेंद्र राजभर को उम्मीदवार बनाया है. इस पर स्थानीय लोग कहते हैं कि ओमप्रकाश इसीलिए यहां से नहीं लड़े क्योंकि यहां उनकी लड़ाई आसान नहीं होती.

अंतिम समय पर ध्रुवीकरण न हो तो यहां मुकाबला सपा और बसपा का ही लग रहा है. सपा से जिलाध्यक्ष रहे बुनकर नेता अल्ताफ अंसारी लड़ रहे हैं जिन्हें पिछली बार 54 हजार वोट मिले थे. मऊ सदर के बाजार में ही एक शख्स ने कहा, ‘असली अंसारी वही हैं.’

altaf ansari

पिछली बार भाजपा यहां चौथे नंबर पर थी. उसे 10 हजार वोट भी नहीं मिले थे. आजमगढ़, मऊ और गाजीपुर वो क्षेत्र है, जहां अफवाहें भी काम कर जाती हैं. मऊ भी सांप्रदायिक तौर पर संवेदनशील इलाका माना जाता है. ये बात हिंदू और मुसलमान दोनों वोटरों ने बताई कि चुनाव से पहले यहां बीजेपी के जीतने की अफवाह फैलाई जाती है और इसके लिए प्रभावशाली धार्मिक नेताओं का भी इस्तेमाल किया जाता है. गाजीपुर तिराहे के पास लोगों का कहना था कि पिछली बार भी ऐसी अफवाह फैलाई गई थी, जिसका फायदा मुख्तार को मिला था और वो 6 हजार वोटों से जीत गए थे. दूसरे पर बसपा थी, लेकिन इस बार वो खुद बसपा से लड़ रहे हैं तो जातीय समीकरण उनके पक्ष में हैं.

Afzal Ansari
अफ़ज़ाल अंसारी का घर.

मुख्तार अंसारी जेल में हैं. उन्होंने चुनाव प्रचार के लिए पैरोल पर बाहर आने की इजाजत मांगी है, जिस पर हाई कोर्ट सोमवार को फैसला देने वाला है. मुख्तार के बड़े बेटे अब्बास घोसी में एक मुश्किल चुनाव लड़ रहे हैं, इसलिए मऊ सदर को ज्यादा समय नहीं दे पा रहे. इसलिए यहां प्रचार की कमान मुख्तार के छोटे बेटे उमर ने कार्यकर्ताओं के साथ संभाली है.

उमर अंसारी
उमर अंसारी (फोटो : फेसबुक वॉल से)

उमर अभी बालिग भी नहीं हैं. वो 12वीं की पढ़ाई कर रहे हैं. लेकिन मुख्तार समर्थक बताते हैं कि लड़का बोलने-चालने में तेज है. रविवार को यहां नसीमुद्दीन सिद्दीकी की रैली में उमर भी मंच पर थे.

ये उमर अंसारी की फेसबुक वॉल से लिया गया है, जिसका कमेंट पढ़ा जाना चाहिए
ये उमर अंसारी की फेसबुक वॉल से लिया गया है फोटो है, जिसका कैप्शन पढ़ा जाना चाहिए, जो उन्होंने लिखा है.

यूसुफपुर में अंसारी बंधुओं के पुश्तैनी घर पर भी गया. परिवार का कोई सदस्य घर पर नहीं था, पर उनके कार्यकर्ताओं से मुलाकात हुई. वहां एक समर्थक ने बताया, ‘एक बार उमर ने चैनल वालों के सामने बहुत अच्छी बात कही. तो हम लोगों ने पूछा कि आपने ये कहां से सीखा. जवाब मिला- ‘कहीं से नहीं’. तो वो अपने आप सीख गए हैं. मछली के बच्चे को तैरना थोड़े ना सिखाया जाता है.’

अफ़ज़ाल अंसारी के घर पर कार्यकर्ता.
अफ़ज़ाल अंसारी के घर पर कार्यकर्ता.

यहां मोहम्मदाबाद में सिकबतुल्लाह के चुनाव संचालक रामबलि पटेल से लंबी बात हुई. उनसे अखिलेश से मिले तिरस्कार के बारे में पूछा तो बोले, ‘अखिलेश यादव उस बात को नहीं समझते हैं. नेताजी ने अफजाल अंसारी को बुलाया था. लेकिन अखिलेश के इर्द गिर्द सामंती और सांप्रदायिक मिजाज के लोग हो गए हैं.’

रामबलि पटेल
रामबलि पटेल

‘तो क्या आगे सपा में लौटने की संभावनाएं खत्म हैं?’
‘राजनीति में संभावनाएं जो हैं, हमेशा बनी रहती हैं.’
‘मुख्तार अंसारी पर जो इतने आपराधिक आरोप हैं, उन पर यहां के लोग क्या सोचते हैं?’
‘मुख्तार अंसारी पर जितने केस दर्ज हैं, वो अपनी जमीन-जायदाद के निजी झगड़े के नहीं हैं. वो सब लोगों पर हो रहे अत्याचारों की लड़ाई लड़ने के केस हैं.’
‘मान लीजिए चुनाव के बाद ऐसी स्थितियां बनीं कि मायावती ने बीजेपी से हाथ मिला लिया तो?’
‘बहनजी हमारी नेता हैं. जो फैसला लेंगी सर्वमान्य है. लेकिन हमसे राय मांगी जाएगी तो हम लोग कहेंगे कि सांप्रदायिक ताकतों से हाथ न मिलाया जाए.’

देखिए मुख़्तार अंसारी का घर

मुख्तार अंसारी ने आपराधिक छवि के बावजूद ‘गरीबों के मसीहा’ वाली छवि बनाने की कोशिश की है. लोग बताते हैं कि बाकी बाहुबलियों की तरह वो भी गरीब बच्चियों की शादी वगैरह करवाते रहे हैं. लेकिन असल बात यही है कि इस बार उनकी सीट फंस गई है.

राजभर वोट भासपा-भाजपा वाले ले जाएंगे. पूरा यादव, कुछ चौहान और काफी मुसलमान सपा के साथ दिखाई पड़ रहा है. पढ़े-लिखे और नौजवान मुसलमानों के अलावा बुनकरों का बड़ा हिस्सा भी 20 साल के मुख्तार-काल के खिलाफ बोल रहा है. और सपा की तरफ झुकता नजर आ रहा है.

भासपा के ओमप्रकाश पास के जहूराबाद से लड़ रहे हैं
भासपा के ओमप्रकाश राजभर, जहूराबाद से लड़ रहे हैं

मोमिनपुरा में 20 साल के फैजान ने कहा कि यहां एक भी ढंग का डिग्री कॉलेज न होने से उसे आजमगढ़ जाना पड़ता है. मोमिनपुरा और लच्छीपुरा के बीच नौजवान मुसलमानों ने कहा कि 20 साल में मऊ की तकदीर बदली जा सकती थी, लेकिन विकास के मोर्च पर काम दिखता ही नहीं है. उनसे पूछा कि फिर जीतते कैसे हैं तो बोले, ‘सिर्फ भाजपा का डर दिखाकर.’

मोमिनपुरा
मोमिनपुरा में लोगों से बातचीत

पिछली बार भी मुख्तार 6 हजार वोटों के अंतर से जीते थे, जो एक बाहुबली नेता के लिए बहुत सम्मान की जीत नहीं कही जाएगी. मुख्तार की मुश्किल ये है कि बुनकर अभी तक सपा के पक्ष में ज्यादा दिख रहे हैं. कई वजहें हैं. पर एक यह कि सपा सरकार ही थी, जिसने बुनकरों के लिए बिजली का बिल 72 रुपये फिक्स कर दिया. छोटे बुनकरों के लिए ये बिल पहले 800-900 रुपये आता था. आप जानते हैं कि बुनकरों का काम बिजली आश्रित होता है.

बसपा कार्यकर्ता बुकलेट बांटते हुए.
बसपा कार्यकर्ता बुकलेट बांटते हुए.

फेसबुक लाइव में एक मुख्तार समर्थक ने कहा, ‘मुख्तार अंसारी रॉबिनहुड हैं. वो इसलिए जीतते हैं क्योंकि उनके जीतने पर हम लोग सेफ महसूस करते हैं. दैट्स व्हाई.’ पूछा कि ‘खतरा’ किससे है तो बोले, ‘फिरकापरस्त ताकतों से.’ वहीं एक नौजवान ने कहा कि ये गलत बात है. जब से मुख्तार मऊ की राजनीति में आए हैं, तब से फिरकापरस्ती बढ़ी है.

अभी तक यहां का मुसलमान मानता है कि भासपा-भाजपा लड़ाई में नहीं है, लेकिन 28 फरवरी को प्रधानमंत्री की रैली के बाद वो लड़ाई में आ सकती है. बहुत सारे लोगों को लगता है कि उसके बाद बसपा और सपा में जा रहा हिंदू वोट भगवा गठबंधन की तरफ लौट सकता है.

सपा की बाइक रैली
सपा की बाइक रैली

मोमिनपुरा में फेसबुक लाइव के दौरान ही सपा की मोटरसाइकल रैली गुजरी तो लोगों ने कहा कि आप माहौल देख लीजिए. इस बार हम लोग सब बदलने वाले हैं. ये ताने और बाने की नगरी है और यहां का ताना-बाना बदलने वाला है. फैजान ने कहा कि मुख्तार जेल में रहते हैं और मैंने उन्हें कभी देखा नहीं. बस लोगों से सुना है कि वो गरीबों की मदद करते हैं. एक और शख्स ने कहा, ‘हमारे जीने-मरने, सुख-दुख में तो वो आते नहीं हैं. जो आदमी जेल में है उसे कब तक वोट देंगे.’

क्या मुख़्तार अंसारी का गढ़ ख़तरे में है?

लेकिन ऐसा नहीं है कि मुख्तार को सिर्फ मुसलमान ही वोट करते हैं. हट्ठी मदारी पुलिस चौकी के पास एक सज्जन ने कहा, ‘काफी ठाकुर वोट भी मुख्तार अंसारी के साथ हैं, क्योंकि ठेकेदारी का काफी काम उन्हें मुख्तार के जरिये मिलता है. जिन हिंदुओं का काम मुख्तार से चल रहा है वे तो उसे वोट देते ही हैं. मैं मुख्तार का सपोर्टर नहीं हूं. लेकिन मुझे लगता है कि अभी वही लीड कर रहे हैं. 50-60 परसेंट मुसलमान, पूरा दलित और उनका व्यक्तिगत हिंदू वोट उनके साथ है. लोग अभी सपा की बात करते मिलेंगे, लेकिन चुनाव से पहले ध्रुवीकरण होना तय है. ये यहां हर बार की कहानी है.’

CPI office

वाम मोर्चे से भी यहां कैंडिडेट लड़ रहा है. रामसोच यादव लड़ाई में नहीं हैं, पर सियासी राय लेने CPI के दफ्तर चला गया. वहां कॉमरेड इम्तियाज मिले जो 1991 में यहां से विधायक रहे हैं. उन्होंने दो बातें बताईं, कि 2012 में यहां बहुत ज्यादा ध्रुवीकरण नहीं हुआ था और मुख्तार अंसारी सिर्फ मुसलमान वोटों से नहीं जीतते हैं.

कॉमरेड इम्तियाज़
कॉमरेड इम्तियाज़

मुख्तार के असर से मऊ शहर में आपको नीला रंग खूब दिखता है. जगह जगह झंडे लगे हैं. चूंकि मुख्तार जेल में हैं, इसलिए उनके कार्यकर्ता छोटे-छोटे समूहों में झंडा-बैनर लेकर चुनाव प्रचार करते हैं. ऑटो वाले नीली टोपी लगाकर सवारी बैठाते मिले. एक आदमी अपने ठेले पर नीला पेंट कर रहा था. उससे भी पूछ लिया कि ये मुख्तार के लोगों ने दिया है क्या, तो वो हंसने लगा. बोला- खुद लेकर आया हूं. वो देखिए दूसरा भी मैंने ही पेंट किया है.

पेंट करने बिज़ी
पेंट करने में बिज़ी.

एक दिलचस्प चीज और दिखी. नुकीली मूंछों वाले मुख्तार अंसारी को आपने ज्यादातर सिर पर हरा साफा बांधे देखा होगा. इस बार भासपा-भाजपा के कार्यकर्ता भगवा साफा बांधकर प्रचार करते दिखे. काउंटर नैरेटिव सिर्फ बोलकर नहीं खड़ा किया जाता. चुनावों में टोपियों का इस्तेमाल लगभग खत्म ही हो गया था, जिसे दिल्ली में AAP ने दोबारा पैदा किया. अब UP में भी तीनों प्रमुख पार्टियों की टोपियां चल रही हैं हैं.

BJP KARYAKARTAS
बीजेपी कार्यकर्ता

एक बात और! योगी आदित्यनाथ का संगठन है, हिंदू युवा वाहिनी. 2005 के मऊ दंगों की चार्जशीट में एक तरफ मुख्तार अंसारी और उनके लोग थे तो दूसरी तरफ हिंदू युवा वाहिनी के अजीत सिंह चंदेल और सुजीत कुमार सिंह. इस नौजवान हिंदू ग्रुप पर भी दंगे और हत्या के आरोप लगे थे. तब से मऊ में हिंदू युवा वाहिनी का भी नाम लोग जानते हैं. इस चुनाव में योगी की हिंदू युवा वाहिनी ने भाजपा-भासपा के संयुक्त प्रत्याशी को समर्थन नहीं दिया है. बल्कि यहां से लड़ रहे शिवसेना प्रत्याशी को समर्थन दिया है. शिवसेना की प्रचार गाड़ी में बाकायदा इसका ऐलान किया जाता है -‘हिंदू युवा वाहिनी समर्थित शिवसेना उम्मीदवार कौशलेंद्र प्रताप सिंह.’ इसकी खबर मिलने पर अमित शाह ने जरूर अपनी पर्सनल डायरी में कुछ नोट किया होगा.

AUGHAD BABA

मुख़्तार अंसारी के इलाक़े में लाल झंडे वाले भी हैं

मऊ में आप मुख्तार अंसारी समर्थकों से पूछेंगे तो वो अपना मुकाबला भासपा-भाजपा गठबंधन से बताएंगे. बीजेपी मुख्य मुकाबले में है, के परसेप्शन से उन्हें फायदा होता है. लेकिन इस बार अभी तक सपा और मुख्तार की लड़ाई है. अब बस दो घटनाओं पर सबकी नजर है. अगर मुख्तार अंसारी को पैरोल मिल गई तो बंदूकों की निगरानी में ही सही, वो क्षेत्र में घूमकर प्रचार करेंगे और इससे नया मूमेंटम बन सकता है. एक स्थानीय ब्यूरो चीफ ने कहा, ‘हो सकता है वो खुली जीप में प्रचार के लिए निकले. आप समझिए कि इसके मायने अलग होंगे. वो बिना कुछ कहे, बहुत कुछ याद दिला देंगे.’

खौफ दिखाया जाता है और ध्रुवीकरण होने पर बीजेपी हार जाती है.
खौफ दिखाया जाता है और ध्रुवीकरण होने पर बीजेपी हार जाती है. (सभी फोटो : अमितेश)

दूसरा, सबकी नजर अब सोमवार को होने वाली नरेंद्र मोदी की रैली पर है, जिसके बाद हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण हो सकता है. एक चाय की दुकान पर अखबार पढ़ते मिले 21 साल के आमिर ने कहा था, ‘मुख्तार को इस बार बस मोदी जी ही बचा सकते हैं.’


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