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टोटल तिवारी, जो रुपैया में तीन अठन्नी भुनाते हैं

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हम छीमी भर के थे तब से टोटल तिवारी को जानते हैं. पहले उनके चाल, चरित्र, स्वभाव, धार्मिक राजनीतिक निष्ठा, कद काठी पर बात कर लेते हैं. बाकी आदतें तो उनकी चलते चलते पता लग ही जाएंगी.

कद लंबा करीब 6 फिट का. चौड़ाई का क्या बताएं? पतंग देखे हो? उसमें कागज को टाइट रखने के लिए जो बांस की फर्ची लगती है. बस उसी जैसा शारीरिक सौष्ठव है. नशा ऐब कोई नहीं. सिर्फ तमाखू खाते हैं घड़ी के देखते 15 मिन्ट के अंतराल पर. पूरी कोशिश रहती है कि चिनौटी किसी दूसरे की हो. अपनी वाली रखने के लिए पटरा वाली चड्ढी के नाड़े वाले नेफे से लटकती थैली लगवाई है. अंदर अंडकोषों की तरफ. इस गंधैलेपन की वजह से उनसे कभी कोई तंबाकू मांग कर नहीं खाता. तो वह अकेले में सिर्फ खुद खाने के काम आती है. तमाखू खाने से ज्यादा कलात्मक होता है उनका निकालना. पहली खुराक का रस आंतों में पहुंचा चुकने के बाद वो अपनी तर्जनी उंगली से एक हुक बनाते हैं. उसको होठों के बीच डालकर पूरी तमाखू फंसाकर निकाल लेते हैं. और उस पर एक उड़ती सी नजर डालकर वहीं नीचे फेंक खटिया के पाए में हाथ पोंछ लेते हैं. फिर अगली खुराक की तरफ कूच करते हैं.

फिलहाल इतना इंट्रोडक्शन काफी है. बाकी की चीजें आगे पता चलती रहेंगी. पहले उनका एक किस्सा सुना देते हैं. पढ़े लिखे हैं. हुसियार हैं. हिंदी में बीए किया है. पूरी राम चरित मानस कंठस्थ है. तुलसीदास वाली भी. ‘गड़बड़ रामायण’ भी. गड़बड़ रामायण यूपी वाले जानते होंगे जिसमें गालियों की चौपाई होती है. उनको बचपन से अखंड रामायण पाठ में जाने का शौक है. बाकायदा मंडली बना रखे थे. दूर दूर गांवो में रात रात भर “सुनि सिय सत्य असीसि हमारी” होता था. हमाए पापा के परम मित्र थे तो उनको लालटेन की तरह आगे लटका के चलते थे. जब भी रात में आते तो उनका पाला पहले मम्मी से पड़ता.

मम्मी कहती “खुद तो बहे हो. अपने साथ चार हाथ पगहौ ले जाओ.”

टोटल कहते “भउजी, भगवान के काम में तो अड़ंगा न लगाव कम से कम.”

फिर मम्मी “बियाह हो जाए तो देखते हैं. कैसे सारी रात रतजगा होता है पराए गांव में.”

टोटल बात का दि एंड करते हुए कहते “भउजी हम हनुमान जी के भक्त हैं. राम के काम से मंगल ग्रह पर चले जाएंगे. और भउजी तुम्हारी कसम. आसिरबाद दो. बिस्व सुंदरी मेहरिया लाएंगे बिस्व सुंदरी. अगल बगल दस कोस में वैसी न होगी.”

फिर भाईसाहब वह दिन भी आया जब टोटल की शादी हुई. नै नै पहले तिलक हुआ. हम 7- 8 साल के थे. तिलक में बंपर भीड़ थी. टाट पट्टी पर खाने वाला सिस्टम था. शायद सन 96- 97 की बात होगी. जंगलेटर चल रहा था जिसके सहारे डेक मशीन रेंक रही थी. चारों दिशाओं में भोंपू लगा रखे थे. गाना बज रहा था अताउल्ला खान का. अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का. शादी में ऐसा गाना बजाना इंकलाब था भाईसाहब जो इन आंखों ने देखा. कानों ने सुना और थोड़ा सा झूमे भी.

शादी की तारीख पर जामा पहन के जोकर भी बने टोटल. फिर बारात लेकर लौटे तो साथ में बिस्व सुंदरी भी आई थी. गांव की औरतें आज तक उस घड़ी के बारे में बताती हैं.

“दुलहिन की मुंह देखाई मा गवा पइसा तो पानी होईगा. टोटल की करिहाईं(कमर) तक है. एक अंखियो दबी है.”

खैर उनकी शादी, सुहागरात और उससे उत्पन्न पुत्र रत्न हाहाकारी पुत्तन का किस्सा फिर कभी. अभी इतना जान लो कि टोटल के वीर्य में उबलता खून था. पुत्तन ने 10 साल की उम्र में गांव की सबसे बुजुर्ग औरत सुशीला बुवा को स्टूल रखकर तीन कंटाप मारे थे. वो सब छोड़ो नहीं कहानी चिंगम की तरह लंबी हो जाएगी.

तो चूंकि टोटल बजरंगी के भक्त हैं. तो जाहिर है बजरंगी उन पर आते ही होंगे. गांव में जो सबसे गंधौरा आदमी होता है उस पर कोई न कोई देवी देवता की सवारी जरूर रहती है. तो टोटल पर हनुमान जी की है. पूरे गांव में कोई भी तकलीफ का मारा होता है तो उनका सहारा होता है सिर्फ एक. टोटल.

एक दिन नकछेद लंबरदार का ‘केस’ उनके पास पहुंचा. उनको एक हफ्ते से लगातार दस्त हो रहे थे. बड़ी पतली टट्टी. जिस पर उनका 4 साल का नाती एक दिन फिसल कर गिर गया था. उसी का इलाज कराने आए थे. डॉक्टर के पास जाते तो चमनप्राश के डिब्बे में रखे सौ के कई नोटों में से एक तोड़वानी पड़ती. फिर टोटल बाबा नजदीक भी पड़ते हैं. और घर के आदमी हैं.

टोटल ने दन्न से अपनी अनामिका उंगली और अंगूठे से नाक दबाई. ये हनुमान जी का आह्वान करने के लिए पैटर्न लॉक जैसा है. जिसे खोले बिना वो एंट्री नहीं करते. फिर उसके बाद नाक छोड़ी और पूछा:

“कुछ संकल्पे हो?”

“जउन कहौ बाबा”

फिर टोटल को जुकाम के कारण नाक आ गई. उन्होंने अपनी हथेली की अंजुली बनाई. उसे नाक के दोनों छेदों के सेंटर पर स्थापित किया और अंदर से दोनों नाल फायर झोंक उठीं. हथेली में कोई पचास ग्राम भेभन रख गया. फिर उसको आंखें फैलाकर देखा कि कहीं अशर्फी तो नहीं निकल आई नाक की जगह. पूरी तरह इत्मीनान हो जाने पर वहीं नीचे फेंका और हाथ चड्ढी में पोंछ लिया. फिर आगे बोले:

“पउवा भर बतासा, एक नया अंगोछा, 10 ठो रुपइया, एक पूड़ा अगरबत्ती औ एक माचिस. इत्ता दे जाओ फिर निसाखातिर रहो. बीमारी सांझ तक खतम होइ जाई.”

टेंटुआ दबाया जाना नकछेद को खला तो बहुत लेकिन अब फंस गए थे. बोले “जउन कहौ बाबा.” इतना कहकर वो वापस इंतजाम करने गए. लौटे भी. पूरा इलाज कराया. बीमारी का पता नहीं कि कैसा गया सफर. हां, वह इन छोटे छोटे इलाजों से बहुत फेमस होते गए.

लेकिन एक बार टोटल के साथ गेम हो गया. हनुमान जी उनके साथ “एक हफ्ता हादसों का” क्विज खेल डाले. पहले दिन बछिया मर गई. दूसरे दिन उड़द का खेत नीलगाय चर गईं. तीसरे दिन खेत से टुब्बिल का पंखा टाप दिए चोर लोग. चौथे दिन खुद साइकिल से गिरकर खटिया ले लिया. बड़े परेशान कि कौन साला फिरकी ले रहा है. तब उनको सहारा चाहिए था.

 

हमारे पापा झाड़फूंक करते हैं गांव में. उसपर उनको खुद कितना भरोसा है ये रहस्य की बात है. लेकिन वो करते हैं. और उनपर टोटल भरोसा करते हैं. जानते हैं कि हमारी तरह ये पब्लिक का चू*या नहीं काट रहे. बस यही उम्मीद उनके हमारे दर पर खींच लाई. पापा से जब अपनी समस्या बताई तो वो बड़े जोर से हंसे. कहा कि जिंदगी भर तुम मौज लियो हनुमान की अब वो ले रहे हैं. लेकिन टोटल पूरी तरह न्यूटल थे. कहा कि “भाय, कुछ करो.”

भैया जान गए कि इसका कष्ट काटे बिना पीछा नहीं छूटने वाला. अपनी छाती के 8 बाल नोच के ताबीज बनाया और टोटल को दे दिया. उस दिन से टोटल की ग्रहदशा सुधर गई और उनकी आस्था ताबीज वाले भैया पर एकदम से कई गुना बढ़ गई.

 

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