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खेलमंत्री जी, फर्जी फोटोशॉप करने वालों को अवॉर्ड देकर ओलंपिक में मेडल्स जीतेगा भारत?

भारत में तीन चीजें खूब मिलती हैं- क्रिकेटर, एक्टर और पुरस्कृत. पुरस्कृत माने वो लोग, जिन्हें कोई ना कोई पुरस्कार/अवॉर्ड/सम्मान मिल चुका है. हमारा देश अवॉर्ड देने में शायद सबसे आगे है. इतना आगे है कि, इस मामले में हम जल्दी ही ब्लैक होल में गिरने वाले हैं. फिर अगर कोई हमारे आसपास आने की कोशिश भी कर रहा होगा, तो वो भी हमसे लाखों प्रकाशवर्ष दूर हो जाएगा.

इस क्रम में हमारे यहां हर साल राष्ट्रीय खेल दिवस का आयोजन होता है. इसमें खेलों में अच्छा प्रदर्शन करने वाले एथलीट्स, कोच, संस्थाओं को सम्मानित किया जाता है. आपने भी सुना ही होगा, अर्जुन अवॉर्ड, द्रोणाचार्य अवॉर्ड, राजीव गांधी खेल रत्न अवॉर्ड… . सिर्फ हिंदी में पढ़ते हैं तो इससे आगे आप बमुश्किल ही गए होंगे. लेकिन बाबूमोशाय, दुनिया इसके आगे भी है. इससे आगे होते हैं तेनज़िंग नोर्गे पुरस्कार, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद पुरस्कार और राष्ट्रीय खेल प्रोत्साहन पुरस्कार.

# तेनज़िंग नोर्गे पुरस्कार

बाद के तीन नामों में इस बार ज्यादा फोकस तेनज़िंग नोर्गे पुरस्कार पर है. इसलिए हम बात करेंगे तेनज़िंग नोर्गे पुरस्कार की. आपको बताएंगे कि क्यों इस बार इन अवॉर्ड्स पर इतना फोकस है. बेसिक्स से शुरू करते हैं. लेकिन सबसे पहले, अगर आप तेनज़िंग नोर्गे को नहीं जानते, तो जाइए स्कूल की उन किताबों को खोजकर लाइए, जिनमें आज भी उन पर चैप्टर्स हैं.

नोर्गे एवरेस्ट फतह करने वाले पहले मनुष्य थे. नोर्गे ने न्यूज़ीलैंड के एडमंड हिलेरी के साथ यह कारनामा किया था. इन्हीं नोर्गे के नाम पर भारत में हर साल एडवेंचर स्पोर्ट्स करने वाले धुरंधरों को पुरस्कार दिया जाता है. एडवेंचर लिखा है तो पता ही चल गया होगा कि किन खेलों की बात हो रही है. वही सब, पहाड़-वहाड़ चढ़ने वाले खेल.

तो इस बार इस अवॉर्ड की शुरुआती लिस्ट में कुल आठ नाम थे. जैसा कि हमारे यहां नियम है- जहां ग्लैमर ना हो, वहां नहीं जाते. इसका पालन करते हुए सबका पूरा ध्यान खेल रत्न, अर्जुन अवॉर्ड और द्रोणाचार्य अवॉर्ड्स तक ही सीमित रहा.

# नरेंदर सिंह यादव

इस बीच कुछ पर्वतारोहियों, हां पहाड़ चढ़ने वालों को ऑफिशली यही कहते हैं बबुआ. हां तो इन्हीं लोगों ने लिस्ट के एक नाम पर आपत्ति जाहिर की. यह नाम था- नरेंदर सिंह. पूरा नाम नरेंदर सिंह यादव, गाम नेहरूगढ़, जिला रेवाड़ी, स्टेट हरयाणा. और उपलब्धि-? एवरेस्ट समेत पांच महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों को फतह करना.

हरियाणा के इस लाल का नाम लिस्ट में आने के बाद मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने खट्ट से ट्वीट कर इसे बधाई दी. खट्टर ने लिखा,

दो शब्द कम कर सेम इसी टेक्स्ट के साथ केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने भी नरेंदर को बधाई दी.

आठवले ने लिखा,

लिस्ट में नाम आने के बाद नरेंदर को कई लोगों ने सम्मानित भी किया. उनका ट्विटर अकाउंट ऐसे छोटे-छोटे सम्मान समारोहों से भरा पड़ा था. लोग धड़ाधड़ ट्वीट कर उन्हें सराह रहे थे और नरेंदर उन ट्वीट्स पर बाकायदा अभार ज्ञापित कर रहे थे. सबकुछ सही चल रहा था, तभी एवरेस्ट पर क़रीबी नज़र रखने वाले एक नेपाली ट्विटर हैंडल, एवरेस्ट टुडे की नज़र इस ख़बर पर पड़ गई. इधर कुछ भारतीय पर्वतारोही भी इसे देख चुके थे. बस, फिर क्या था, विवाद खड़े हो गए.

इन लोगों को साल 2016 याद आ गया. स्क्रीनशॉट्स तैरने लगे. कहा जाने लगा कि नरेंदर तो कभी एवरेस्ट पर चढ़े ही नहीं. मतलब उन्होंने चढ़ने के लिए ऑक्सीजन की जगह कम्प्यूटर का सहारा लिया. एवरेस्ट के रास्ते पर पैर नहीं हाथ बढ़ाए और घर बैठे फोटोशॉप के जरिए एवरेस्ट पर तिरंगा फहरा दिया. इन लोगों ने अपने दावों के पक्ष में कई सारे सबूत भी दिए.

# FAKE नरेंदर सिंह यादव

लोगों ने 2016 में एवरेस्ट गई उस पार्टी के नेता को भी खोज निकाला, जिसमें शामिल होकर नरेंदर एवरेस्ट फतह का दावा कर रहे थे. नबा कुमार फुकोन नाम के इस पर्वतारोही ने इस बारे में कहा,

‘मैं पहले दिन से कह रहा था कि यादव का एवरेस्ट फतह का दावा फ़र्जी है. उन्होंने अपनी तस्वीरें मॉर्फ की थी. मैं उस दल का नेता था और वह टीम में शामिल थे. वह ऊपर तक नहीं पहुंच पाए थे और यहां तक कि उन्हें शीतदंश का सामना भी करना पड़ा था.

नरेंदर और हरियाणा की एक और पर्वतारोही सीमा रानी गोस्वामी को शेरपाओं ने किसी तरह से बचाया था. पर्याप्त ऑक्सीजन ना होने के चलते यादव के शेरपा और मैंने उन्हें आगे ना जाने की सलाह दी थी. बाद में मैं शिखर तक गया और वापसी में मुझे यादव मिले, जहां मैंने शीतदंश की शिकार उनकी उंगलियां भी देखीं.’

एवरेस्ट टुडे ने इस बारे में लकपा शेरपा नाम के एक नेपाली पर्वतारोही से भी बात की थी. सात बार एवरेस्ट फतह कर चुका यह पर्वतारोही उस रोज यादव के साथ मौजूद था. लकपा ने कहा,

‘मैं कभी भी खुद को किसी विवाद में नहीं डालना चाहता लेकिन यह उन सभी पर्वतारोहियों के लिए बेहद अपमानजनक है जिन्होंने सच में इस ऊंचाई तक पहुंचने के लिए इतने समर्पण के साथ प्रयास किए. एक पर्वतारोही के रूप में ऐसी चीजें देखना बेहद दुखद और तकलीफदेह है.

उसके साथ एक महिला पर्वतारोही भी थी. बालकनी (8400 मीटर ऊंचाई) पर कम ऑक्सीजन और गाइडों के साथ वे लोग बुरे हाल में थे. वे भाग्यशाली थे कि हमारे शेरपा गाइडों ने उन्हें खोज निकाला और अपनी ऑक्सीजन देकर सुरक्षित वापस ले आए.’

लकपा ने आगे कहा,

‘साल 2016 में नरेंदर यादव अनचाहे कारणों के चलते माउंट एवरेस्ट पर नहीं चढ़ पाए थे. मैं उस सीजन रेस्क्यू टीम में था और हमारे कुछ शेरपा गाइड्स मिलकर उसे एवरेस्ट बालकनी (8400 मीटर ऊंचाई) से वापस लाए थे. वह बालकनी से आगे जाने की हालत में नहीं था.

बाद में उसके हाथ में एवरेस्ट विजय का सर्टिफिकेट देख मैं चौंक गया था. यह नेपाल की ऑपरेटिंग कंपनी की ग़लती है, कैसे उन्होंने ऑफिशल्स के लिए एवरेस्ट फतह के सर्टिफिकेट के लिए अप्लाई किया. इसलिए मुझे लगता है कि इस प्रतिष्ठित अवॉर्ड के लिए ना तो उसका नॉमिनेशन होना चाहिए और ना ही उसे यह मिलना चाहिए.’

# इतना सन्नाटा क्यों है भाई?

बात बढ़ती गई. भारतीय पर्वतारोही भी इसमें शामिल हुए. सबने नरेंदर के सेलेक्शन पर आपत्ति जाहिर की. यहां तक कि तेनज़िंग नोर्गे के बेटे धामे तेनज़िंग नोर्गे को भी इस बहस में आना पड़ा. उन्होंने भी यादव के सेलेक्शन को दुखद करार दिया. इसके बाद इंडियन माउंटेनियरिंग फाउंडेशन ने खेल मंत्रालय से बात की और इसके बाद मंत्रालय ने चुपचाप नरेंदर को लिस्ट से बाहर कर दिया.

गुरुवार 27 अगस्त को हुई नेशनल अवॉर्ड्स सेरेमनी की रिहर्सल में नरेंदर शामिल थे. लेकिन शुक्रवार देर शाम को पता चला कि उनका नाम लिस्ट में नहीं है. कोई सफाई नहीं, कोई प्रेस रिलीज नहीं, कुछ भी नहीं. बस नाम गायब. हिंदुस्तान टाइम्स का दावा है कि खेल मंत्रालय ने इस बारे में जांच का भी फैसला किया है, लेकिन मंत्रालय या मंत्री किरण रिजिजू के ट्विटर हैंडल पर ऐसी कोई जानकारी नहीं है.

बात नरेंदर की एवरेस्ट फतह की करें तो दावा है कि उनके दोस्तों ने साल 2014 में चंदा जुटाकर उनके लिए 25 लाख रुपयों का प्रबंध किया था. जिसे लेकर वह एवरेस्ट फतह के लिए गए थे. एवरेस्ट से लौटने के बाद नरेंदर के गांव में जश्न भी हुआ था. लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि उन्होंने ना सिर्फ अपने गांव, अपने राज्य, बल्कि पूरी दुनिया को बेवकूफ बनाया.

इस हद तक बनाया कि वह अपनी कैटेगरी का सबसे बड़ा राष्ट्रीय अवॉर्ड लगभग जीत ही चुके थे. दबे स्वर में यह भी कहा जा रहा है कि उन्हें बीजेपी से नजदीकी का फायदा मिला. नरेंदर का ट्विटर हैंडल क़रीब से देखेंगे तो आपको उसमें 80 परसेंट बीजेपी और 10 परसेंट सपा से जुड़े लोग मिलेंगे. नरेंदर अक्सर अपने ट्वीट्स में बीजेपी, ABVP और अखिलेश यादव को टैग करते रहते हैं.

ख़ैर बात जो भी हो, इसकी कवरेज वैसी नहीं हुई जैसी होनी चाहिए. हिंदी मीडिया पर नज़र मारेंगे तो आपको हम पर भरोसा हो जाएगा. नरेंदर को अवॉर्ड मिलने की ख़बरें जहां हर दिशा में छाई हुई थीं, वहीं इस फ़र्जीवाड़े की बात पर हिंदी में एकदम सन्नाटा है.

नरेंदर साल 2016 से फ़र्जी एवरेस्ट विजय का सर्टिफिकेट लेकर घूम रहे थे. तारीफें बटोर रहे थे, जाने कितने अवॉर्ड्स भी इसी के दम पर हासिल किए होंगे. लेकिन अपने खेल मंत्रालय को कुछ पता नहीं था.

दावा है कि नरेंदर के नाम कुल 18 वर्ल्ड रिकॉर्ड हैं. नवभारत टाइम्स, अमर उजाला जैसे प्रतिष्ठित अखबारों का दावा है कि कई वर्ल्ड रिकॉर्ड संस्थाएं इन्हें वर्ल्ड किंग का सम्मान भी दे चुकी हैं. साल 2019 में उन्हें लॉस एंजल्स डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट, लॉस एंजल्स ने डॉक्टर ऑफ मोटिवेशन की उपाधि भी दी थी. अब नरेंदर अपना नाम डॉक्टर नरेंदर सिंह यादव लिखते हैं. ख़ैर लिखने को तो वह खुद को एवरेस्ट विनर भी लिखते हैं और सरकार मान भी लेती है.

# जैसे शायर का ख़्वाब

स्पोर्ट्स मिनिस्टर किरण रिजिजू हर रोज ओलंपिक मेडल्स की बात करते हैं. माननीय राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी नेशनल स्पोर्ट्स डे के अपने भाषण में कहा,

‘मुझे विश्वास है कि सबकी भागीदारी के बल पर किए गए सामूहिक प्रयासों से भारत एक खेल महाशक्ति के रूप में उभरेगा. 2028 के ओलंपिक खेलों में Top Ten Podium Finisher Countries में रहने का हमारा लक्ष्य है. हम इस लक्ष्य को अवश्य प्राप्त करेंगे.’

ये सुनने/पढ़ने में बड़ी दिलकश बात लगती है, लेकिन जमीन पर देखेंगे तो, जैसे शायर का ख़्वाब, जैसे उजली किरण, जैसे वन में हिरण, जैसे नाचता मोर, जैसे लहरों का शोर. यानि, ये सब पढ़ने/सुनने में बहुत अच्छी बातें हैं, लेकिन इन्हें हासिल कर पाना लगभग नामुमकिन है. अगर देश के सबसे प्रतिष्ठित स्पोर्ट्स अवॉर्ड में ऐसे सेलेक्शन होता है, तो टीम सेलेक्शन का तो जाने कौन ही मालिक है.  और टीम सेलेक्शन का जो मालिक होता है, वही मेडल्स का भी मालिक होता है.

तो भैया ओलंपिक भले एक साल के लिए टल गए हों, लेकिन इसमें हमारे खुश होने के लिए कुछ नहीं है. अपना तो ऐसे ही चलता रहेगा. हम ऐसे ही किसी श्रीनिवास गौड़ा, रामेश्वर गुर्जर और फ़र्जी नरेंदर यादव में ओलंपिक मेडल खोजते रहेंगे और निराश होते रहेंगे. क्योंकि वो क्या है ना, कि भारत में तीन C ही चलते हैं- Cinema, Cricket और… छोड़ो जाने दो, फिर कभी.

तमाम ट्वीट्स के आर्काइव लिंक यहां हैं.

फाइनल लिस्ट

मनोहर लाल खट्टर

रामदास आठवले

नरेंदर सिंह यादव


किसी को उसैन बोल्ट बताने की जगह हमें इंडियन स्पोर्ट्स कल्चर को बनाने पर ध्यान देना चाहिए

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