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इंडिया के पहले 'हिंदू हृदय सम्राट' ने जो कहा, जानकर गो-गुंडे दुखी हो जाएंगे

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नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (NCP) के चीफ शरद पवार ने कहा है: ‘वीर सावरकर ने देश की आजादी के लिए अपना जीवन दिया. इसमें कोई शंका नहीं है. पर उन्होंने ही कहा था कि गाय किसानों पर बोझ नहीं बननी चाहिए. अगर कोई गाय का मांस खाना चाहता है, तो मैं उसको अपराधी नहीं मानता.’

पवार का ये बयान RSS चीफ मोहन भागवत के बयान के बाद आया है. भागवत ने बीते रविवार को कहा था: ‘गो-हत्याबंदी सरकार के अधीन है. हमारी इच्छा है कि सम्पूर्ण भारत में गोवंश की हत्या बंद हो. इस कानून को प्रभावी बनाना सरकार की जिम्मेदारी है.’

विनायक दामोदर सावरकर का नाम हिंदूवादी संगठन रेफरेंस के तौर पर इस्तेमाल करते हैं. ऐसा प्रोजेक्ट करते हैं, जैसे उनके तर्कों से ही इनके काम होते हैं. सावरकर ने बहुत सारी बातों पर अपनी राय दी भी थी. इसी में उन्होंने गाय पर भी अपनी राय दी थी. लेकिन उनकी राय गो-रक्षकों की राय से अलग थी.

सावरकर ही पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने हिंदुत्व शब्द दिया था. सबसे पहले उनको ही हिंदू हृदय सम्राट कहा गया था. पर उन्होंने ही कहा था कि गाय एक उपयोगी जानवर है, जिसे जरूरत पड़ने पर खाया जा सकता है. मराठी में उन्होंने एक किताब लिखी थी जिसका नाम था विज्ञान निष्ठा निबंध. इसमें कई बातें थीं.

savarkar
विनायक दामोदर सावरकर

1. सावरकर ने ‘विज्ञान निष्ठा निबंध’ में लिखा है:

भारत जैसे कृषिप्रधान देश में गाय को मानना सामान्य बात है. गाय से लोगों को दूध और कई चीजें मिलती हैं. जो हमारी जरूरत की होती हैं. कई परिवारों के लिए गाय परिवार का हिस्सा हो जाती है. तो ये हमारे लिए उपयोगी होती है. ये हमारी कृतज्ञता होती है कि गाय को ईश्वरीय बना दिया जाता है. पर ये भी है कि अगर आप लोगों से गाय की दैवीयता के बारे में पूछें तो लोग सिर्फ इसकी उपयोगिता ही बता पाते हैं.

तो अगर आप गाय का मैक्सिमम उपयोग करना चाहते हैं, तो इसको भगवान बनाना छोड़ना होगा. ईश्वर सबसे ऊपर है. फिर इंसान आता है और इसके नीचे जानवर. गाय भी एक जानवर है, जिसके पास मूर्ख मनुष्य से भी कम बुद्धि है. अगर हम गाय को ईश्वर मानें, तो ये इंसान का अपमान होगा.

गाय एक तरफ खाती है और दूसरी तरफ अपने ही पेशाब और गोबर में लेटती है. अपनी पूंछ से सारा गंदा अपने शरीर पर लपेट लेती है. एक प्राणी जो कि सफाई नहीं समझता, कैसे ईश्वरीय माना जा सकता है?

गाय का पेशाब और गोबर कैसे पवित्र हो सकते हैं, जबकि अंबेडकर जैसे मनुष्य की परछाईं को लोग अपवित्र मानते हैं. इसी से पता चलता है कि इंसान की बुद्धि कितनी भ्रष्ट हो गई है. अगर ईश्वर मानने लगें इसे, तो इसका मतलब है कि मनुष्य गाय के लिए है. पर ऐसा नहीं है. गाय की केयर करो, क्योंकि ये उपयोगी है. इसका मतलब ये है कि लड़ाई के दिनों में या फिर जब ये बोझ बन जाए तो कोई वजह नहीं है कि इसे न मारा जाए.

ये अतिश्योक्ति नहीं होगी अगर कहा जाए कि गाय की पूजा करने से देश को घाटा हुआ है. इतिहास बताता है कि हिंदू राज्य इसी भरोसे के चलते खो गए. राजाओं ने कई बार लड़ाइयां हारी हैं क्योंकि उन्होंने गाय को मारने से इनकार कर दिया. मुस्लिमों ने गाय को ढाल की तरह इस्तेमाल किया और वो निश्चिंत थे कि हिंदू गाय को कोई नुकसान नहीं पहुंचाएंगे.

2. ‘X Rays, समग्र सावरकर वांग्मय’ में लिखा है:

गाय दूध देने वाला जानवर है. पर ये हिंदुत्व का प्रतीक नहीं है. हिंदुत्व का प्रतीक नरसिंह है. ईश्वर के गुण उसके पूजा करने वाले के अंदर आ जाते हैं. गाय की पूजा करने से पूरा हिंदू देश गाय के समान ही हो गया. घास खाना शुरू कर दिया. अगर हम अपने देश को किसी जानवर से ही जोड़ना चाहते हैं, तो वो जानवर शेर ही होना चाहिए. अपने पंजे से एक बार में शेर बड़े-बड़े जानवरों को धराशायी कर देता है. वही हिंदुत्व का परिचायक होना चाहिए.

3. ‘समाज चित्रे’ में लिखा है:

गाय और भैंस जैसे जानवर और पीपल, बरगद जैसे पेड़ हमारे बहुत काम आते हैं. इसलिए हम उनके प्रति अनुरक्त हो जाते हैं. इतना कि उनकी पूजा करने लगते हैं. ये भी मान लेते हैं कि यही हमारा धर्म है. पर क्या ये नहीं होता कि विशेष परिस्थितियों में वो जानवर या पेड़ हमारे लिए समस्या बन जाते हैं और तब उनको खत्म करना ही हमारा धर्म हो जाता है?

4. ‘सावराकराच्या गोष्टी’ में लिखा है:

एक वस्तु जितना खाने लायक होती है, उतना ही इंसान के लिए फायदेमंद होती है. पर इससे धर्म को जोड़ देना इसको ईश्वरीय स्टेटस दे देता है. ये अंधविश्वास देश की बुद्धि को भ्रष्ट कर देता है.

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