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सऊदी अरब के शहजादे साहब फिलिस्तीन को भूलकर इजरायल की तरफदारी क्यों कर रहे हैं?

प्रिंस सलमान का ये बयान बहुत बड़ा यू-टर्न है. कहां तो इस्लामिक देश इजरायल को देश ही नहीं मानते. उसका अस्तित्व तक नकारते हैं. और कहां अब सऊदी अरब का होने वाला सुल्तान इजरायल की तरफदारी कर रहा है. सऊदी के इस हृदय परिवर्तन का राज क्या है?

ये खबर पढ़ने से पहले एक कहानी सुनिए. इस कहानी के पात्र और घटनाएं काल्पनिक नहीं हैं.

बहुत बरस पहले एक आदमी था. सैमुअल ज़ेमुरे. सैमुअल का परिवार रूस में रहता था. यहूदी थे वो लोग. रूस से भागकर अमेरिका आ गए. अमेरिका पहुंचकर गुजारा कैसे चले? सैम 18 का था. उसने सोचा, केले बेचता हूं. मगर पैसे तो थे नहीं इतने कि खूब केले खरीदे. तो उसने दिमाग लगाया. तब शहर में बाहर की जगहों से केले आते. जहाजों में भरकर. इनमें से काफी केले बहुत ज्यादा पक जाते. उन्हें छांटकर निकाल दिया जाता था. इन केलों का ये हिसाब था कि उसी दिन खपत हुए तो ठीक, वरना बर्बाद. सैमुअल इन्हें कौड़ियों के भाव खरीदता और बेचता. खूब भागता, ताकि जल्द से जल्द पूरे केले बिक जाएं. उसने पैसे जोड़े. फिर एक पुराना सा जहाज खरीद लिया. उस जहाज से वो होन्डुरास जाता. वहां केले उगते थे. सैमुअल वहां से कच्चे केले खरीदकर लाता और उसे अमेरिकी बाजारों में बेचता. धीरे-धीरे वो इतना बड़ा कारोबारी बन गया कि उसने गुआटेमाला की 70 फीसद से ज्यादा प्राइवेट जमीन खरीद ली. करीब एक लाख लोग उसके यहां काम करते थे. दुनिया के करीब एक दर्जन देशों में उसका बिजनस था. उसके पास दुनिया की सबसे बड़ी प्राइवेट नौसेना थी. अमेरिका के राष्ट्रपति फ्रेंकलिन रूजवेल्ट के पास किसी भी वक्त पहुंच सकता था. यहां तक कि उसने होन्डुरास में तख्तापलट भी करवाया. लोगों ने सैमुअल का नाम रख दिया. सैम, द बनाना मैन.

ये जेरुसलेम की तस्वीर है. दूर वो जो पीले रंग की गुंबद नजर आ रही है, वो है डोम ऑफ रॉक. उधर ही है पुराना जेरुसलेम शहर.
ये जेरुसलम की तस्वीर है. दूर वो जो पीले रंग का गुंबद नजर आ रहा है, वो है डोम ऑफ रॉक. उधर ही है पुराना जेरुसलम शहर. दुनिया की सबसे विवादित जगह. इस एक शहर पर तीन सभ्यताएं अपना दावा करती हैं. यहूदी, ईसाई और मुसलमान, तीनों इसपर अपना ज्यादा हक जताते हैं. तीनों धर्मों की सबसे पवित्र मानी जाने वाली जगहें हैं यहां.

इजरायल एक सपना था, दिक्कत तब हुई जब सपना सच हो गया
हमने आपको ‘सैम, द बनाना मैन’ की कहानी क्यों सुनाई? क्योंकि हमें आपको इजरायल की एक बात बतानी है. हम किसी ऐसे यहूदी से बात शुरू करना चाहते थे, जिसने बस इजरायल का सपना नहीं देखा. बल्कि उस सपने को पूरा करने में बहुत कुछ खर्च भी किया. ये बहुत पुरानी बात है. इजरायल के बनने के वक्त की. 14 मई, 1948. वो तारीख जब इजरायल बना. जिन लोगों की वजह से ये दिन आया, उनमें एक नाम ‘सैम, द बनाना मैन’ का भी है. पर्दे के पीछे रहकर खूब काम किया था सैमुअल ने. इजरायल बन तो गया, लेकिन इसके साथ अक्सर ‘नाजायज’ की तरह बर्ताव होता रहा. दुनिया में कई देश हैं, जिनके लिए इजरायल होकर भी नहीं है. करीब 36 देश हैं, जिन्होंने इजरायल को कभी मान्यता ही नहीं दी. उसके साथ कभी कोई रिश्ता ही नहीं रखा. इनमें से ज्यादातर इस्लामिक देश हैं.

सऊदी खुद को सुन्नी मुसलमानों का मसीहा कहता है. ईरान खुद को शिया मुस्लिमों का नुमाइंदा कहता है. इन दोनों के बीच की होड़ एक बड़ी दिक्कत बन गई है. सीरिया और यमन जैसे देशों में जो जंग हो रही है, उसके पीछे भी इस होड़ का बहुत बड़ा हाथ है.
सऊदी खुद को सुन्नी मुसलमानों का मसीहा कहता है. ईरान खुद को शिया मुस्लिमों का नुमाइंदा कहता है. इन दोनों के बीच की होड़ एक बड़ी दिक्कत बन गई है. सीरिया और यमन जैसे देशों में जो जंग हो रही है, उसके पीछे भी इस होड़ का बहुत बड़ा हाथ है.

ईरान और सऊदी अरब के बीच बस इजरायल ही तो कॉमन था
दुनिया में एक धर्म है इस्लाम. मगर असलियत में इस्लाम एक नहीं है. शिया और सुन्नी, बहुत कॉम्पीटिशन है इनमें. ये होड़ सबसे ज्यादा कहीं दिखती है, तो वो है मिडिल ईस्ट में. ईरान शियाओं का नुमाइंदा है. सऊदी अरब सुन्नियों का सरदार. ये दोनों दो गुटों के प्रतिनिधि हैं. इनकी आपस में कभी नहीं पटती. ये किसी मुद्दे पर रजामंद नहीं होते, सिवाय एक के. वो इकलौती चीज, जिसके ऊपर दोनों एक जुबान और एक खयाल होते हैं, वो है इजरायल. दोनों इजरायल को नहीं मानते. 1979 में ईरान के अंदर हुई इस्लामिक क्रांति के बाद तो इजरायल उसका कट्टर दुश्मन हो गया. इनका कहना है कि इजरायल जहां है, वो उसकी जमीन नहीं. वो फिलिस्तीन है. जिसके ऊपर इजरायल ने कब्जा किया हुआ है. यहूदियों की सबसे पवित्र जगह जरुसलम (जो इस्लाम और ईसाइयों के लिए भी बेहद पवित्र हैं) को ये इजरायल का नहीं, बल्कि फिलिस्तीन का मानते हैं. फिलिस्तीनी देश की राजधानी.

प्रिंस सलमान फिलहाल अरब देशों के बीच सबसे मजबूत शख्सियत हैं. सुल्तान की गद्दी उनके पिता किंग सलमान के पास है. लेकिन सारे अहम फैसले प्रिंस सलमान लेते हैं. फिर चाहे वो यमन में जंग लड़ने का फैसला हो, या फिर कतर की नाकाबंदी का फैसला.
प्रिंस सलमान फिलहाल अरब देशों के बीच सबसे मजबूत शख्सियत हैं. सुल्तान की गद्दी उनके पिता किंग सलमान के पास है. लेकिन सारे अहम फैसले प्रिंस सलमान लेते हैं. फिर चाहे वो यमन में जंग लड़ने का फैसला हो या फिर कतर की नाकाबंदी का फैसला.

सऊदी के शहजादे ने वो कह दिया है, जो कोई सोच भी नहीं सकता था
ऐसा लगता था कि ईरान और सऊदी में भले कितनी भी ठने, लेकिन इस बात पर दोनों एक रहेंगे. मगर नहीं. लगता है आने वाले दिनों में इन दोनों देशों के बीच का इकलौता कॉमन इंट्रेस्ट भी खत्म हो जाएगा. सऊदी के राजकुमार हैं प्रिंस सलमान. उनके पिता किंग सलमान सऊदी के सुल्तान हैं. प्रिंस सलमान क्राउन प्रिंस हैं. यानी सऊदी के होने वाले सुल्तान. लोग कहते हैं कि किंग सलमान बस नाम के सुल्तान हैं. असली हुकूमत तो प्रिंस की ही चलती है. उन्हीं प्रिंस ने एक बड़ा बारूदी बयान दिया है. कहा है कि इजरायल को भी होने का, जीने का हक है. शहजादे साहब अमेरिका गए हुए हैं. वहां कई इंटरव्यू दे रहे हैं. एक इंटरव्यू अटलांटिक को भी दिया. उनसे पूछा गया कि क्या यहूदियों को एक देश हासिल करने का हक है? ऐसा देश, जिसमें उनके पूर्वजों की जमीन का कम से कम कुछ हिस्सा शामिल हो? इसके जवाब में शहजादे साहब ने कहा:

मुझे लगता है कि फिलिस्तीन और इजरायल, दोनों को अपनी जमीन पर जीने का हक है. लेकिन हमें एक शांति समझौता करना ही होगा. ताकि ये सुनिश्चित हो कि हर कहीं पर स्थिरता रहेगी और रिश्ते सामान्य हो सकेंगे.

आधी सदी से भी ज्यादा समय से जिस बात पर अड़े हों, उसे रातो-रात छोड़ दें तो ताज्जुब नहीं होगा? वो भी तब, जब कि इस बात का रिश्ता दुनिया के सबसे विस्फोटक (इजरायल-फिलिस्तीन विवाद और जेरुसलम पर किसका हक) से जुड़ा हो!

शहजादे सलमान के इस बयान की टाइमिंग भी बहुत संवेदनशील है. हाल ही में इजरायल ने फिलिस्तिनी प्रदर्शनकारियों पर हमला किया. जब वो जान बचाकर भागे, तो उनकी पीठ पर गोली मारी. 17 लोग मारे गए. सऊदी अब तक फिलिस्तीन का हमदर्द था. प्रिंस सलमान के बयान के बाद किंग सलमान ने एक बयान जारी कर फिलिस्तीन के प्रति समर्थन जताया.
शहजादे सलमान के इस बयान की टाइमिंग भी बहुत संवेदनशील है. हाल ही में इजरायल ने फिलिस्तिनी प्रदर्शनकारियों पर हमला किया. जब वो जान बचाकर भागे, तो उनकी पीठ पर गोली मारी. 17 लोग मारे गए. सऊदी अब तक फिलिस्तीन का हमदर्द था. प्रिंस सलमान के बयान के बाद किंग सलमान ने एक बयान जारी कर फिलिस्तीन के प्रति समर्थन जताना पड़ा.

इतना बड़ा यू-टर्न!
1967 में इजरायल की एक लड़ाई हुई थी. अपने पड़ोसी मुल्कों के साथ. इस जंग को ‘सिक्स डे वॉर’ कहते हैं. कहां तो लड़ाई हुई थी इजरायल को सबक सिखाने के लिए. और कहां इजरायल ने और जमीन कब्जा ली. उसके बाद अरब मुल्कों का स्टैंड क्लियर था. कि वो पहले वेस्ट बैंक और गाजा पर से कब्जा छोड़े. वो जेरुसलम पर भी समझौता करने को तैयार नहीं. अरब देशों का कहना था कि इजरायल ये करे, उसके बाद आगे की बात होगी. मतलब जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक ये विवाद भी नहीं सुलझेगा. न ही शांति आने की राह बनेगी. इतने सालों से इस स्टैंड पर अड़े रहने के बाद अब सऊदी अरब के शहजादे ने बड़ा कर्वी यू टर्न लिया है. ये हल्की बात नहीं. जो इंसान कुछ साल बाद सऊदी अरब का मुस्तकबिल तय करेगा (अभी भी कर ही रहा है वैसे), वो इजरायल के होने की हक की वकालत कर रहा है. ये इवेंट ऑफ द सेंचुरी है. मगर ऐसा हुआ क्यों?

इजरायल और सऊदी अरब की कुंडली क्या कहती है?
हम प्रिंस सलमान के दिमाग को नहीं पढ़ सकते. लेकिन घटनाओं को पढ़ सकते हैं. उनकी बात करने से पहले हमें इजरायल और सऊदी की कुंडली मिलानी होगी. ये देखने के लिए कि दोनों के कितने गुण मिलते हैं. सऊदी और इजरायल के बीच जो कॉमन है, वो है:

1. ईरान से दुश्मनी
2. अमेरिका से दोस्ती
3. इस्लामिक आतंकवाद का खतरा

सऊदी अरब, अमेरिका और इजरायल की इस तिकड़ी के बीच एक चीज कॉमन है. तीनों ही ईरान को अपना दुश्मन मानते हैं.
सऊदी अरब, अमेरिका और इजरायल की इस तिकड़ी के बीच एक चीज कॉमन है. तीनों ही ईरान को अपना दुश्मन मानते हैं. ईरान के लिए उनकी नफरत उनकी इस दोस्ती की सबसे मजबूत वजह साबित हो रहा है.

जैसे माइनस-माइनस प्लस होते हैं, वैसे ही दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है
ये ही तीनों कॉमन गुण अब सऊदी और इजरायल को जोड़ रहे हैं. ईरान के साथ दोनों का छत्तीस का आंकड़ा है. दोनों उसको दुश्मन मानते हैं. ईरान दोनों के लिए खतरा है. सऊदी और ईरान के बीच शिया-सुन्नी की लड़ाई है. उन्हें एक-दूसरे के खिलाफ होने में ही अपना फायदा, अपना हित नजर आता है. इजरायल और ईरान की भी दुश्मनी है. ईरान तो खुलकर कसम खाता है. कि वो इजरायल को खत्म कर देगा. पिछले कुछ वक्त से ईरान मजबूत हुआ है. सीरिया के अंदर उसने रूस के साथ मिलकर असद सरकार को बचाया. अब वो रूस के साथ मिलकर तालिबान से बात कर रहा है. आप देखिए कि कैसे ईरान का दायरा बढ़ा है. ये चीज सऊदी और इजरायल दोनों के लिए बर्दाश्त के बाहर की चीज है.

ट्रंप के आने के बाद से अमेरिका और सऊदी के बीच करीबियां बढ़ी हैं.
ट्रंप के आने के बाद से अमेरिका और सऊदी के बीच करीबियां बढ़ी हैं. ट्रंप इजरायल-फिलिस्तीन विवाद को अपने तरीके से, अपने हिसाब से सुलझाना चाहते हैं. उन्हें पता है कि सऊदी को साथ लिए बिना ये विवाद हल नहीं होने वाला.

एक तो अमेरिका, ऊपर से ट्रंप वाला अमेरिका
दूसरी बात है अमेरिका से दोस्ती. इजरायल और अमेरिका के रिश्तों पर क्या ही कहा जाए. जब से इजरायल बना है, तब से वो अमेरिका का करीबी है. अमेरिका लगातार इजरायल को सहलाता रहा है. मदद करता रहा है. बतौर राष्ट्रपति अपने दो कार्यकालों में ओबामा ने फिर भी थोड़ी दूरी बनाने की कोशिश की. लेकिन ये अमेरिका और इजरायल के बीच की दिक्कत नहीं थी. ओबामा को असल में इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू की आक्रामकता और ‘दुनिया मेरे ठेंगे पर’ वाले व्यवहार से दिक्कत थी. उनके बाद ट्रंप आए. वो इजरायल को लेकर बहुत सॉफ्ट हैं. उन्होंने तो वो किया, जिसे करने की कोई सोच भी नहीं सकता. अमेरिकी दूतावास को तेल अबीब से जेरुसलम ले जाने का ऐलान. किसी भी देश के अंदर किसी दूसरे देश का दूतावास कहां होता है? राजधानी में. तो अगर अमेरिका अपना दूतावास जेरुसलम ले जाता है, माने वो जेरुसलम को इजरायल की राजधानी मानता है.

प्रिंस सलमान ने कहा कि ईरान के सुप्रीम लीडर के सामने हिटलर भी अच्छा नजर आता है.
प्रिंस सलमान ने कहा कि ईरान के सुप्रीम लीडर के सामने हिटलर भी अच्छा नजर आता है. उनका कहना है कि हिटलर जहां बस यूरोप पर राज करना चाहता था, वहीं ईरान पूरी दुनिया को कब्जे में करना चाहता है.

जब दोस्त और दुश्मन कॉमन हों, तो कैसे न पटेगी?
दूसरी तरफ सऊदी है. सऊदी और अमेरिका की करीबी बढ़ी है. राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप सऊदी के दौरे पर भी गए. वहां से सीधे इजरायल पहुंचे. अमेरिका सऊदी को खूब हथियार बेच रहा है. दोनों यमन में भी साथ हैं. ट्रंप चाहते हैं कि वो इजरायल-फिलिस्तीन विवाद सुलझाएं. अपने दामाद जेरेड कुशनर को भी उन्होंने खास इस काम पर लगाया है. ट्रंप का मानना है कि इस मिशन में सऊदी की जरूरत पड़ेगी. उसके बिना बात नहीं बनेगी. बात सही भी है. एक सऊदी को साधने से कितने सारे देश सध जाएंगे. संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मिस्र, जॉर्डन. सारे अहम खिलाड़ी. सऊदी को भी अमेरिका की जरूरत है. वो ऐसे फ्यूचर की तैयारी कर रहा है, जब कच्चा तेल खत्म हो जाएगा. तब जेब में पैसा कहां से आएगा? इसकी तैयारी में खूब निवेश कर रहा है सऊदी. वैसे अमेरिका, इजरायल और सऊदी की इस तिकड़ी के बीच भी एक कॉमन इंट्रेस्ट है. ईरान. ट्रंप को ईरान से हद चिढ़ है. इसी चिढ़ के कारण वो ओबामा कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि- न्यूक्लियर डील को भी मटियामेट करने पर तुले हैं.

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ट्रंप ईरान से बेहिसाब नफरत करते हैं. ऐसा वो खुद कहते हैं. ओबामा के समय ईरान के साथ हुई न्यूक्लियर डील के भी वो खिलाफ हैं. उन्होंने कई बार कहा है कि ईरान इस समझौते का बेजा फायदा उठा रहा है. वो कई बार इस डील को तोड़ने की धमकी दे चुके हैं.

जब आतंकवादियों ने दो हफ्ते तक सऊदी को बंधक बना लिया
अब बात रही तीसरे पॉइंट की. यानी इस्लामिक आतंकवाद की. सऊदी और इजरायल (अमेरिका को भी गिन लीजिए) दोनों को इससे खतरा है. आपको ग्रैंड मॉस्क सीज़र याद है? वो घटना, जब इस्लामिक कट्टरपंथियों ने सऊद वंश (जिसका शासन है सऊदी अरब में) को हटाने के लिए मक्का की मस्जिद अल-हरम पर हमला कर दिया था. ये 1979 की बात है. 20 नवंबर से 4 दिसंबर तक पूरी मस्जिद उन आतंकवादियों की बंधक रही. करीब दो हफ्ते तक सऊदी (और दुनिया) की सांसें थमी रहीं. इस्लाम की सबसे पवित्र जगह दांव पर थी. इस घटना का असर ये हुआ कि सऊदी बहुत कट्टर हो गया. उसे लगा कि इस्लामिक कट्टरपंथियों का सामना करने के लिए उसे भी खूब ज्यादा कट्टर होना होगा. तभी उसे लेजिटिमेसी मिलेगी. इस एक घटना से आप समझ सकते हैं. कि इस्लामिक कट्टरपंथियों से सऊदी को कितना खतरा है.

सऊदी और इजरायल को अपना फायदा दिख रहा है
किसी रिश्ते को बनने-बिगड़ने के लिए कॉमन ग्राउंड चाहिए होता है. ऐसा चारागाह, जहां दोनों चर सकें. जहां दोनों को फायदा हो. जहां दोनों के हित सधते हैं. सऊदी और इजरायल को अपने बीच का कॉमन ग्राउंड दिख गया है. दोनों को लगता है कि उनके बीच के मतभेद इतने बड़े नहीं, जितने बड़े उनके फायदे हैं. प्रिंस सलमान की वाहवाही ये है कि वो इसे समझ गए हैं. ये जो इजरायल के लिए उनका हृदय परिवर्तन हुआ है, वो उसी समझ का असर है.


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