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स्कूलों में जिसे बैन करोगे, बच्चे उसे खुरचकर पढ़ेंगे

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राजस्थान में नई सरकारों के आने के साथ स्कूलों की किताबें बदलने का किस्सा पुराना है. और जिस तरह इस प्रदेश में बीजेपी और कांग्रेस हर पांच साल में सत्ता की उलट-पलट करती हैं, ऐसे मौके हर पीढ़ी के बच्चे की ज़िन्दगी में आ ही जाते हैं.

राजस्थान की स्कूली किताबें फिर खबरों में हैं. पिछले कुछ महीनों में इस फ्रंट से बड़ी दिलचस्प खबरें आती रहीं:

1.

फरवरी में विदेशी लेखकों के पाठों को आठवीं तक की किताबों से निकालने की सूचना आई. कीट्स, टॉमस हार्डी, विलियम ब्लैक, टीएस एलियट जैसे लेखकों को अंग्रेज़ी की नई किताबों से निकाल दिया गया.

2.

फिर ‘ज्यादा उर्दू शब्दों के पीछे की मुश्किलात’ बताकर इस्मत चुगताई, सफ़दर हाशमी और हरिशंकर परसाई के लिखे पाठ किताब से निकाले गए.

3.

फिर इस हफ्ते खबर आई कि आठवीं कक्षा की समाज विज्ञान की किताब में स्वतंत्रता आन्दोलन वाले पाठ से जवाहरलाल नेहरू का नाम गायब है. देश के पहले प्रधानमंत्री के रूप में उनका नाम भी स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वाले हिन्दुस्तान से जुड़े पाठ से गायब है.

4.

नई खबर है कि पांचवीं की किताब में ‘गौमाता’ की अपने बच्चों को लिखी चिठ्ठी शामिल की गई है. गौ महिमा के साथ किताबें गीता महिमा को भी अपने पाठ में शामिल करती हैं. यह भी कि अब से ‘महान’ शब्द अकबर के साथ नहीं जोड़ा जाएगा, महाराणा प्रताप के नाम के साथ जोड़ा जाएगा.

ये तमाम बदलाव राजस्थान की नई बीजेपी सरकार की नीति के अनुरूप ही हुए हैं. राजस्थान के स्कूली शिक्षामंत्री वासुदेव देवनानी ने पिछले साल इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में विस्तार से बताया था,

“कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों को बाकी दुनिया के बारे में पढ़ने की क्या ज़रुरत? पहले उनको राजस्थान के बारे में जानना चाहिए और फिर हिंदुस्तान के बारे में. फिर आगे बड़ी कक्षाओं में वो दुनिया के बारे में पढ़ सकते हैं.” शिक्षा मंत्री ने इसे लागू करने का एक गणितीय सूत्र भी बताया, “क्लास 1 से 5 तक बच्चों को 75 प्रतिशत सामग्री राजस्थान से जुड़ी पढ़नी चाहिए. बाकी 25 फीसदी में नेशनल कल्चर, इतिहास और व्यक्तित्वों के बारे में पढ़ाया जाना चाहिए.”


लेकिन ये स्कूल की किताबों पर मारामारी क्यों? दरअसल इस मारामारी की वजह तीन तरह की स्थापित समझदारियां हैं, आज के समय जिन पर सवाल खड़ा किया जाना ज़रूरी है.

पहली समझदारी: हमारे यहां बच्चों की स्कूली किताबों का मकसद आज भी उन्हें ‘सही उत्तर सिखाना’ समझा जाता है, सवाल पूछना नहीं.

दूसरी समझदारी: ऐसे फैसलों के पीछे सोच यह है कि ‘कोर्स की किताबें’ पढ़कर बच्चे अपने जीवन के सबसे यादगार सबक सीखते हैं.

और तीसरी समझदारी: कि बच्चे की मासूमियत बचाने के लिए उसे तमाम असहज करने वाले या विवादित मुद्दों-लोगों-व्यक्तित्वों से ‘बचाया’ जाना चाहिए. छुपाया जाना चाहिए.

इन तीनों प्रचलित धारणाओं को बारी बारी से कठघरे में खड़ा करने की जरूरत है.

1.

स्कूली शिक्षा का मकसद बच्चे को पका-पकाया ‘ज्ञान’ देना नहीं होता, नहीं होना चाहिए. जब हम स्कूल की किताबों को राजनीति की रणभूमि बनाते हैं, तो यह भूल जाते हैं कि अंतत: स्कूली शिक्षा बच्चे को खुद ज्ञान हासिल करने के औजारों से लैस करने के लिए होती है. और इस प्रक्रिया का सबसे सहज हिस्सा है सवाल पूछना. ऐसे में यह अप्रासंगिक है कि आप किताब में नेहरू को पढ़ाएं या सावरकर को. ज़रूरी यह होना चाहिए कि बच्चा उनके बारे में, उनके कामों के बारे में अपनी राय बना पाने के औजारों से लैस हो.

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एक ही क्लास में एक ही मुद्दे के बारे में अलग राय रखने वाले बच्चों का वजूद संभव हो, और इसे सराहा जाए, ये किसी क्लास की सफलता होनी चाहिए. खास तौर से भारत जैसे विविधरंगी देश की.

2.

मुझे ज्ञानरंजन की लिखी वो पंक्ति याद आती है, “इस बात को अच्छी तरह याद रखना ज़रूरी है कि थानों के बाद सबसे ज्यादा क्रूरता के अड्डे हमारे स्कूल ही हैं.” सच्चाई ये है कि हमारे बच्चों की दुनिया के असली पाठ ‘कोर्स की किताबों’ से बाहर मौजूद हैं. मेरा अपना अनुभव है कि आज हिन्दी साहित्य को सबसे ज्यादा प्यार करने वाले मेरे वो दोस्त हैं जिन्होंने ‘कोर्स की किताबों’ में हिन्दी नहीं पढ़ी. इतिहास में भी, कोर्स की किताबों से हटाया जाना किसी भी ऐतिहासिक किरदार को ‘अधिकृत’ व्याख्याओं से आज़ाद कर देता है. अौर कई बार इसके कमाल के सकारात्मक नतीजे भी निकल जाते हैं.

नेहरू को और उनके विचारों को किताब से हटाने वाले साथियों को मैं बस यह याद दिलाना चाहूंगा कि भगत सिंह और आंबेडकर के विचार भी लंबे समय तक हमारे स्कूलों की कोर्स की किताबों में शामिल नहीं रहे हैं. लेकिन आज युवा वर्ग में उनकी लोकप्रियता नेहरू पर भारी पड़ती है.

3.

और अंतिम बात, हमें यह याद रखना चाहिये कि बच्चे की बड़ी सामान्य सी समझदारी होती है. उससे जो कुछ भी जान-बूझकर छिपाया जाता है, वो उसे और ज्यादा जानने की कोशिश करता है. अगर उसके लिए हम सही रास्तों को बंद करेंगे, तो वो उन्हें गलत रास्तों से जानता है. कक्षा में ‘आदर्श टेक्स्ट’ पढ़ाना, या कक्षा में ‘आदर्श’ कायम करने की कोशिश दरअसल असमानताओं को मिटाना नहीं, उन्हें कालीन के नीचे छुपाना भर है. बच्चा इसी समाज का सदस्य है, और इस नाते वह उन तमाम विवादों, असमानताओं और बहसों से सीधे जुड़ा हुआ  है, जो हमारे बीच मौजूद हैं. ऐसे में, स्कूल की कक्षा उसे इन सवालों का सामना करने के काबिल बनाए, यह तभी होगा जब हम अपने कोर्स की किताबों में सीधे इन मुश्किल सवालों का सामना करेंगे.

यह भी कि बच्चे से चीज़ें छुपाया जाना किसी तरह की समस्या का समाधान नहीं. बल्कि स्कूली शिक्षा में बच्चे की हर नई चीज़ को जानने की इच्छा को ‘समस्या’ मानना ही सबसे बड़ी समस्या माना जाना चाहिए.

मुझे हमारे स्कूल के दौर का एक बहुत मजेदार किस्सा याद आता है. तब भी प्रदेश में नई सरकार आई थी. फिर जैसी परम्परा है, स्कूल की किताबों की समीक्षा हुई और कुछ किताबों से चंद ‘विशेष पाठों’ को हटाने का फैसला लिया गया. लेकिन एक समस्या थी. नया सत्र नज़दीक था और किताबों की छपाई का काम पूरा हो चुका था. अब क्या हो? तय हुआ कि छपकर तैयार हुई किताबों की जिल्दें खोली जायेंगी और ‘आपत्तिजनक’ पाठ किताब से बाहर किये जायेंगे. क्योंकि सरकार का फरमान था, फैसले पर अमल भी फ़ौरन हुआ. लेकिन फिर भी एक दिक्कत रह गई. बड़ी भोली सी तकनीकी दिक्कत.

दरअसल किताब में पाठ पेज के दोनों ओर छपे होते हैं. इन किताबों में भी कई पाठ ऐसे थे जिनका आखिरी पेज जहां ख़त्म होता था, उसके ठीक पीछे से अगला पाठ शुरू हो जाता था. जब किताब से कुछ चुनिंदा पाठों को हटाने का फैसला लिया गया, तो इस किताबी गणित का ध्यान नहीं रखा गया. नतीजा ये था की ‘अस्वीकृत’ पाठ को हटाने से कई जगह ‘स्वीकृत’ पाठ का पहला पेज भी साथ में शहीद हो रहा था. ऐसे में एक यूनीक हल तलाशा गया. पहली बार राजस्थान के स्कूलों में बच्चों के हाथ में ऐसी किताबें थीं जिनके बीच में कई पेजों पर काला पेंट किया गया था. जिन ‘अस्वीकृत’ पाठों के जिन पृष्ठों को तकनीकी रूप से किताब से हटाया जाना असंभव था, उन्हें काले पेंट से पोत दिया गया था.

लेकिन इस किस्से का सबसे दिलचस्प पहलू इसके आगे है. मेरे जिन दोस्तों को ये किताबें पढ़ने को दी गईं, उनकी दिलचस्पी उन ‘काले रंगे हुए’ पन्नों में अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई थी. कोर्स की किताब के नाम से ही दूर भागने वाले मेरे कई साथी उन चंद पन्नों को पढ़ने के लिए पिछले सालों की किताबें ढूंढ रहे थे. खुरच खुरचकर काला रंग निकालने की कोशिश कर रहे थे.

इस अजाने को जान लेने की जिज्ञासा में ही बच्चे की सबसे बड़ी ताकत छिपी है, जिसे हम बड़े कई बार उम्र बढ़ने के साथ खो देते हैं. किताबों में शामिल नामों पर लड़ रहे लोगों को यह ख्याल रखना चाहिए कि बच्चा भी इस देश का नागरिक है. और चाहे उससे आप कितनी भी असलियत छुपाएं, अंतत: वो सब ‘जान’ लेता है.

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