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राजस्थान उपचुनाव: इन 4 वजहों से चारों खाने चित्त हुई है बीजेपी

राजस्थान में दो लोकसभा और एक विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने क्लीन स्वीप किया. इन तीनों सीटों पर पहले बीजेपी काबिज़ थी. 1 फरवरी को आया इस उपचुनाव का नतीजा बजट के शोर में दब गया, लेकिन इसकी आंच बीजेपी तक ज़रूर पहुंची है. दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करने वाली बीजेपी के लिए ये ‘सिर्फ एक हार’ नहीं है.

जो पार्टी अपना हर चुनाव आखिरी चुनाव समझकर लड़ती है, जिसके लिए राज्य का छोटा या बड़ा होना मायने नहीं रखता, जो निकाय चुनाव तक में अपनी सारी मशीनरी झोंक देती है, उसके लिए तीन-तीन काबिज सीटों पर उपचुनाव में हार जाना किसी गंभीर मेसेज से कम नहीं है.

खासकर उस राज्य में, जहां वो तीन चौथाई से ज़्यादा बहुमत से सत्ता में आई और जहां उसे इसी साल के आखिर में विधानसभा चुनाव लड़ना है. राजस्थान की जनता ने अपने मूड का टीज़र दे दिया है.

अजमेर उपचुनाव में वोट डालने के लिए खड़े लोग
अजमेर उपचुनाव में वोट डालने के लिए खड़े लोग

कांग्रेस की जीत और बीजेपी की हार के क्या कारण रहे, इससे पहले इन तीनों सीटों और यहां लड़ने वाले कैंडिडेट्स का हाल जान लीजिए.

#1. अजमेर लोकसभा सीट

2014 में बीजेपी के सांवर लाल जाट सांसद बने. सांवर लाल 1993, 2003 और 2013 में राजस्थान सरकार में मंत्री रहे.
9 अगस्त 2017 को हार्ट अटैक की वजह से इनकी मौत हो गई, जिसकी वजह से उपचुनाव हुए.
उपचुनाव में कांग्रेस की तरफ से रघु शर्मा और बीजेपी की तरफ से सांवर लाल जाट के बेटे रामस्वरूप लांबा ने चुनाव लड़ा. इस सीट पर जाट वोटर बड़ा फैक्टर हैं.

सांवर लाल जाट
सांवर लाल जाहट

रघु शर्मा
56 साल के हैं. राजस्थान यूनिवर्सिटी में छात्रसंघ अध्यक्ष रहे. 2008 में केकड़ी से विधायक बने और कांग्रेस सरकार में मुख्य सचेतक रहे.
ब्राह्मण वर्ग से आते हैं, जिसका पूरा सपोर्ट मिला. सचिन पायलट गुट के माने जाते हैं. सचिन ने इनके लिए चुनाव प्रचार भी किया था.

सचिन पायलट के साथ रघु शर्मा (पगड़ी लगाए)
सचिन पायलट के साथ रघु शर्मा (पगड़ी लगाए)

राम स्वरूप लांबा
34 साल के हैं. MBA किया है. पिता के रहते कोई सियासी करियर नहीं था, पर पिता की मौत के बाद पार्टी ने अजमेर बीजेपी युवा मोर्चा का महामंत्री बनाया.
लांबा को कैंडिडेट बनाकर पार्टी ने जाट कार्ड खेला, जबकि जाटों ने इस बार खुलकर कांग्रेस का समर्थन किया.

राम स्वरूप लांबा
राम स्वरूप लांबा (पगड़ी लगाए)

अजमेर लोकसभा उपचुनाव का नतीजा:

रघु शर्मा को मिले: 6,11,514 वोट (2014 में कांग्रेस के सचिन पायलट को 4,65,891 वोट मिले थे.)
रामस्वरूप लांबा को मिले: 5,27,100 वोट (2014 में बीजेपी के सांवर लाल को 6,37,874 वोट मिले थे.)

रघु की जीत का अंतर: 84,414 वोट
चार साल में कांग्रेस के 1,45,623 वोट बढ़ गए.


#2. अलवर लोकसभा सीट

2014 में बीजेपी के महंत चांदनाथ योगी सांसद बने. 2004 में योगी बीजेपी के टिकट पर बहरोड़ से विधायक बने.
– 17 सितंबर 2017 को इनकी मौत हो गई. इनके शिष्यों ने कहा कि शरीर त्यागा है. 29 जुलाई 2016 को ये अपना उत्तराधिकारी चुन चुके थे.
उपचुनाव में कांग्रेस से डॉ. करण सिंह यादव और बीजेपी से डॉ. जसवंत सिंह यादव ने चुनाव लड़ा, जिसे डॉक्टर बनाम डॉक्टर की लड़ाई बताया गया.

महंत चांदनाथ योगी
महंत चांदनाथ योगी

डॉ. करण सिंह यादव
73 साल के हैं. जयपुर मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर रहे हैं. दिल के डॉक्टर हैं. वहां से VRS लेकर 1998 में पहली बार विधायकी का चुनाव लड़ा था.
बहरोड से विधायक रहे हैं. 2004 में अलवर से सांसद बने.

सोनिया गांधी के साथ करन सिंह यादव
सोनिया गांधी के साथ करन सिंह यादव

डॉ. जसवंत सिंह यादव
65 साल के हैं. BAMS डिग्रीधारक डॉक्टर हैं, लेकिन अलवर में कभी डॉक्टरी नहीं की.
25 साल से पॉलिटिक्स में हैं. जिला प्रमुख रह चुके हैं और बीजेपी के टिकट पर सांसदी और विधायकी का चुनाव जीत चुके हैं.

जसवंत सिंह यादव (लाल घेरे में)
जसवंत सिंह यादव (लाल घेरे में)

अलवर लोकसभा उपचुनाव का नतीजा:

डॉ. करण सिंह यादव को मिले: 6,42,416 वोट (2014 में कांग्रेस के भंवर जीतेंद्र सिंह को 3,58,383 वोट मिले थे.)
डॉ. जसवंत सिंह यादव को मिले: 4,45,920 वोट (2014 में बीजेपी के महंत चांदनाथ को 6,42,278 वोट मिले थे.)

डॉ. करण सिंह यादव की जीत का अंतर: 1,96,496 वोट
चार साल में कांग्रेस के 2,84,033 वोट बढ़ गए.


#3. मांडलगढ़ विधानसभा सीट (जिला भीलवाड़ा)

2013 में बीजेपी की कीर्ति कुमारी विधायक बनी थीं. ये बिजोलिया राजपरिवार से आती हैं. 2003 और 2008 में विधानसभा चुनाव हारीं और 2013 में जीतीं.
28 अगस्त 2017 को 50 साल की उम्र में स्वाइन फ्लू से कीर्ति की मौत हो गई, जिसके बाद उपचुनाव हुए.
उपचुनाव में कांग्रेस से विवेक धाकड़ और बीजेपी से शक्ति सिंह हाडा ने चुनाव लड़ा.

कीर्ति कुमारी
कीर्ति कुमारी

विवेक धाकड़
41 साल के हैं. जिला प्रमुख रहे हैं. पिता इंजी. कन्हैया लाल धाकड़ पहले बीजेपी में थे, लेकिन सीपी जोशी के प्रभाव में 2009 में कांग्रेस में आ गए.
पिता ने विवेक को स्थापित कराया. जोशी के सपोर्ट से 2013 में टिकट मिला, लेकिन हार गए. इस बार भी जोशी ने टिकट दिलाया और जीत गए.

विवेक धाकड़ (बीच में, सफेद जैकेट में)
विवेक धाकड़ (बीच में, सफेद जैकेट में)

शक्ति सिंह हाडा
31 साल के हैं. MBA किया है. कोई सियासी बैकग्राउंड नहीं है. दो साल पहले बीजेपी जॉइन की थी. भीलवाड़ा जिला परिषद के जिला प्रमुख बने.
आरोप लगे कि जिला प्रमुख का चुनाव और बीजेपी का टिकट पैसों के बूते हासिल किया. इन्हें टिकट मिलने से बीजेपी कार्यकर्ताओं में नाराजगी भी बताई गई.

शक्ति सिंह हाडा
शक्ति सिंह हाडा

मांडलगढ़ विधानसभा उपचुनाव का नतीजा:

विवेक धाकड़ को मिले: 70,146 वोट (2013 में भी यही लड़े थे और इन्हें 64,544 वोट मिले थे.)
शक्ति सिंह हाडा को मिले: 57,170 वोट (2013 में कीर्ति कुमारी को 83,084 वोट मिले थे.)

विवेक धाकड़ की जीत का अंतर: 12,976 वोट
चार साल में कांग्रेस के 5,602 वोट बढ़ गए.


इन तीनों ही सीटों के चुनाव में एक बात कॉमन है कि ये कांग्रेस की जीत से ज़्यादा बीजेपी की हार है. लोगों का गुस्सा उन नरेंद्र मोदी के प्रति नहीं है, जिनकी लहर पर बीजेपी ने राजस्थान में विधानसभा और लोकसभा मजबूती से जीते. लोगों की नाराजगी मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया से है, जिनके बारे में लोग मान चुके हैं कि वो जनता के काम नहीं कर रही हैं.

मध्य प्रदेश में जो नारा शिवराज सिंह चौहान के लिए चला था कि ‘मोदी तुझसे बैर नहीं, पर मामा तेरी खैर नहीं’. वो राजस्थान पहुंचकर वसुंधरा के खिलाफ हो गया है कि ‘मोदी तुझसे बैर नहीं, पर रानी तेरी खैर नहीं’. आइए जानते हैं किस सीट पर हार-जीत के क्या फैक्टर रहे.

नरेंद्र मोदी और वसुंधरा राजे: इस बार आसान नहीं डगर
नरेंद्र मोदी और वसुंधरा राजे: इस बार आसान नहीं डगर

#. अजमेर लोकसभा सीट

अजमेर में जाट वोटर काफी हैं. स्थानीय सूत्र बताते हैं कि इसी वजह से अजमेर में अधिकतर जाट अधिकारियों की पोस्टिंग की है, जिसका फायदा बीजेपी के जाट कैंडिडेट को मिलता है. लेकिन पार्टी ने जब इस बार भी जाट कैंडिडेट उतारा, तो बाकी जातियां लामबंद हो गईं और कांग्रेस के समर्थन में चली गईं.

अजमेर की हार लांबा से ज़्यादा वसुंधरा की हार है, क्योंकि लोगों की नाराजगी उनसे है. पिछले 3 महीने में वो 20 बार अजमेर गईं, लेकिन जातिगत आधार पर लोगों से मुलाकात की. इस बात से लोग खासे नाराज हुए. एंटी-इनकम्बेंसी अजमेर में बड़ा फैक्टर रही.

आनंदपाल सिंह
आनंदपाल सिंह

आनंदपाल एनकाउंटर और पद्मावती विवाद की भी भूमिका रही. इन मामलों ने बीजेपी के परंपरागत वोटर्स माने जाने वाले राजपूतों को नाराज किया. उन्हें संगठन में पदों से भी महरूम रखा गया, नतीजतन उन्होंने खुलकर कांग्रेस का सपोर्ट किया.

अजमेर लोकसभा सीट पर कुल आठ विधानसभा सीटें हैं और चुनाव नतीजों के बाद आई रिपोर्ट्स के मुताबिक बीजेपी इन आठों विधानसभा क्षेत्रों में हारी है. वजह ये बताई गई कि शहरी वोटर नाराज है. व्यापारी नोटबंदी और जीएसटी से नाराज हुए, जबकि बाकी काम न होने से नाराज हैं.

रघु शर्मा के रोडशो में राज बब्बर, नगमा और सचिन पायलट
रघु शर्मा के रोडशो में राज बब्बर, नगमा और सचिन पायलट

#. अलवर लोकसभा सीट

अलवर में कांग्रेस और बीजेपी, दोनों ही पार्टियों ने यादव कैंडिडेट उतारे थे. इस सीट पर यादव और मुस्लिम वोटर, दो फैक्टर रहते हैं. बीजेपी को यादव वोटों से उम्मीद थी, लेकिन इस चुनाव में मुस्लिम और यादव, दोनों ही वोट कांग्रेस के पाले में चले गए.

अलवर में गौपालक पहलू खान की हत्या का मुद्दा भी बड़ा फैक्टर रहा. पहलू खान कानूनी दस्तावेजों के साथ मवेशी ले जा रहे थे और कथित गौरक्षकों ने उन्हें मार डाला था.

पहलू खान
पहलू खान

यहां बीजेपी का एक अंदरूनी संघर्ष भी था. बीजेपी ने वसुंधरा सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे जसवंत सिंह यादव को टिकट दिया था, जिनका इस इलाके से कोई खास लेना-देना नहीं थी. वो खुद भी पत्रकारों से कह रहे थे कि वो अलवर से नहीं लड़ना चाहते. पार्टी को लग रहा था कि कैबिनेट मंत्री के लड़ने से सीट सुरक्षित हो जाएगी, पर ऐसा नहीं हुआ.

#. मांडलगढ़ विधानसभा सीट

– यहां बीजेपी की हार का सबसे बड़ा कारण शक्ति सिंह हाडा को टिकट देना रहा. लोग उनसे कनेक्ट नहीं कर पाए और पार्टी कार्यकर्ता पहले से ही हाडा से नाराज थे. हाडा की जनता के बीच कोई खास छवि भी नहीं थी.

शक्ति सिंह हाडा
शक्ति सिंह हाडा

कांग्रेस की जीत में कुछ भूमिका कांग्रेस के ही बागी गोपाल मालवीय की रही. गोपाल चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन टिकट न मिलने पर बगावत कर दी. निर्दलीय उतर गए. उन्हें पर्दे के पीछे से कुछ कांग्रेसियों का सपोर्ट भी था. माना जा रहा था कि वो कांग्रेस के चुनाव काटेंगे, लेकिन उन्होंने सेंध लगाई बीजेपी के वोटबैंक में. गोपाल को करीब 40 हज़ार के आसपास वोट मिले.

गोपाल मालवीय
गोपाल मालवीय

राजस्थान के उपचुनाव के नतीजे ये बताने के लिए काफी हैं कि कुछ ही महीनों बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में जनता का क्या मूड रहेगा. यकीनन कांग्रेस इसे ऐसे प्रदर्शित करने की कोशिश करेगी कि मोदी-लहर खत्म हो गई है, पर राजस्थान की जनता में वसुंधरा के प्रति गुस्सा तो साफ दिख रहा है. वसुंधरा को भी इसका अंदाजा है. वो उप-चुनाव वाले क्षेत्रों में अपने नेता-मंत्रियों के साथ डेरा भी डाले रहीं, लेकिन नतीजा सिफर रहा. राजस्थान में बीजेपी के लिए 2018 का चुनाव मुश्किल होने वाला है.

modi-shah


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