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अतीत की वो चार घटनाएं जिनके जरिए नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर हमला बोला

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7 फरवरी को 16वीं लोकसभा की आखिरी सत्र था. सदन के नेता और बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी धन्यवाद भाषण दे रहे थे. यह लोकसभा चुनाव से पहले संसद में उनका आखिरी भाषण था. नरेंद्र मोदी ने इस मौके को भुनाने की पूरी कोशिश की. कांग्रेस पिछले काफी समय से मोदी सरकार पर संवैधानिक संस्थाओं को खत्म करने का आरोप लगाती रही है. नरेंद्र मोदी ने इसके जवाब में अतीत की चार घटनाओं का जिक्र करते हुए कांग्रेस को अपने गिरेबान में झांकने की सलाह दे डाली. उन्होंने अपने भाषण में 1959 में केरल की कम्युनिस्ट सरकार गिराए जाने का जिक्र किया. एनटी रामा राव का जिक्र किया. एमजी रामचंदारण का जिक्र किया. मोदी के भाषण में आए यह संदर्भ 30 से 60 साल तक पुराने थे. हम आपको इन चारों घटनाओं के बारे में बताने जा रहे हैं. जिनका जिक्र गाहे-ब-गाहे राजनीतिक बहसों में अब भी हो जाता है.

1. इलाज करवाने विदेश गए, पीछे से तख्तापलट हो गया

1983 का आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव ऐतिहासिक था. तेलगु फिल्मों के सुपर स्टार नन्दमूरि तारक रामाराव ने एक शेवरले वैन को रथ में तब्दील किया और आंध्र प्रदेश के तूफानी दौरे पर चल पड़े. राम के भेष में वो ‘तेलगु वारी आत्म गौरवम” का नारा लागते हुए आंध्र प्रदेश की सभी 294 सीटों पर पहुंचे. चुनाव के नतीजे आज भी भरतीय राजनीति में करिश्मे की तरह याद किए जाते हैं. 294 में से एनटीआर की महज एक साल पुरानी तेलगु देशम पार्टी को 201 सीटों पर कामयाबी हासिल हुई. एनटीआर आन्ध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने.

अपने दामाद चंद्रबाबू नायडू के साथ एनटी रामा राव
अपने दामाद चंद्रबाबू नायडू के साथ एनटी रामा राव

साल 1984. एनटीआर अपने दिल की बाईपास सर्जरी करवाने के लिए अमेरिका गए. इधर उनके तख्तापलट की साजिश शुरू हो गई. कांग्रेस के एक नेता हुआ करते थे एन. भास्कर राव. पहले कांग्रेस में थे. टीडीपी बनने के बाद कांग्रेस छोड़कर टीडीपी में आ गए. लेकिन कांग्रेस पूरी तरह छूटी नहीं थी. एनटीआर अमेरिका में थे और इन्होने टीडीपी में तोड़-फोड़ शुरू कर दी. टीडीपी के 201 में से 92 विधायक भास्कर राव के पक्ष में चले गए. कांग्रेस के 57 विधायक भी उनका समर्थन कर रहे थे. उस समय आंध्र प्रदेश के राज्यपाल हुआ करते थे राम लाल. पुराने कांग्रेसी नेता. उन्होंने भास्कर राव को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी. तारीख थी 15 अगस्त 1984.

एनटीआर अमेरिका से इलाज करवा कर हैदराबाद लौटे. काले कपड़े पहनकर. रथ लेकर फिर से दौरे पर निकल गए. कहा कि 201 में से 157 विधायक अब भी उनके पक्ष में हैं. भास्कर राव की सरकार अल्प मत की सरकार है. असंवैधानिक सरकार है. कांग्रेस छोड़कर पूरा विपक्ष भी इस मामले में उनके साथ हो गया. एनटीआर के तख्तापलट को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तानाशाही की तरह देखा गया. आखिरकार केंद्र सरकार को घुटने टेकने पड़े. राज्यपाल रामलाल को हटाकर शंकर दयाल शर्मा को नया राज्यपाल बनाया गया. एनटीआर को फिर से मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी गई.

2.पति-पत्नी और सरकार की बर्खास्तगी

साल 1957. केरल के विधानसभा चुनाव दुनियाभर में चर्चा का विषय बन गए. दुनिया में पहली बार लोकतंत्र के रास्ते कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में आई थी. ईएमएस नंबूदरीपाद केरल के मुख्यमंत्री बने. उस समय इंदिरा गांधी कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष हुआ करती थीं. उनके पिता पंडित नेहरु देश के प्रधानमंत्री. केरल में कम्युनिस्ट सरकार बनने के बाद बीबीसी ने नेहरु का इंटरव्यू किया. नेहरु से पूछा गया कि अगर कम्युनिस्ट केरल की तरह पूरे देश में फैल गए तो क्या होगा? नेहरु का जवाब था,”यह हमारी बदनसीबी होगी. लेकिन हम इससे भी निपट लेंगे.”

1957 में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते नंबूरीपाद
1957 में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते नंबूरीपाद

1957 में हुई हार के बाद केरल की कांग्रेस पार्टी ईएमएस नंबूदरीपाद सरकार को घेरने का मौक़ा तलाश रही थी. 1959 में उन्हें यह मौक़ा मिल गया. ईएमएस नंबूदरीपाद ने शिक्षा के क्षेत्र में सुधार करने शुरू किए. केरल सरकार ने निजी शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों को सम्मानजनक मानदेय दिलाने के लिए कानून बनाया. केरल में कैथलिक मिशनरी और नायर जाति की चैरिटेबल संस्थाओं के शिक्षण संस्थान बड़ी तादाद में चलते थे. ये दोनों बिरादरी सरकार के फैसले के खिलाफ सड़क पर उतर गईं. कांग्रेस ने इन प्रदर्शनों को मौके की तरह भुनाया और प्रदर्शन में साथ आ गई.

केरल सरकार ने प्रदर्शनकारियों के साथ सख्ती से काम लिया. कई जगहों पर लाठीचार्ज हुआ. गोलियां दागी गईं. इंदिरा गांधी केरल के दौरे पर गईं. उन्होंने दिल्ली आकर केरल की कम्युनिस्ट सरकार को बर्खास्त करवाने के लिए जद्दो-जहद शुरू कर दी. कहते हैं कि शुरू में नेहरु इंदिरा के नजरिए से सहमत नहीं थे. लेकिन बाद में उन्हें इंदिरा की बात माननी पड़ी. जुलाई 1959 में नंबूदरीपाद सरकार को हटाकर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया.

इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी ने उनके इस फैसले का जमकर विरोध किया. तीनमूर्ति भवन में नाश्ते की टेबल पर उन्होंने नेहरु की मौजूदगी में इंदिरा को ‘फासिस्ट’ तक कह दिया था. फिरोज संसद के बाहर और संसद के भीतर इंदिरा के खिलाफ बोल रहे थे. फिरोज गांधी की जीवनी ‘फिरोज दी फॉरगॉटेड गांधी’ लिखने वाले बर्टिल फाल्क अपनी किताब में कहते हैं कि इंदिरा के साथ केरल के मुद्दे पर तनातनी के बाद दोनों की शादी खत्म होने की कगार पर आ गई थी.

3.दगा की सजा

साल 1972. दक्षिणी राज्य तमिलनाडु में द्रविड़ आंदोलन के दम पर खड़ी पार्टी डीएमके में वर्चस्व की जंग निर्णायक मोड़ पर आ गई. करूणानिधि और एमजी रामचंद्रन दोनों ही तमिल फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े हुए थे. दोनो अन्नादुराई की डीएमके पर अपना हक जता रहे थे. आखिरकार एमजीआर डीएमके से अलग हो गए और अपनी नई पार्टी बनाई, ‘अन्नाद्रमुक’.

करूणानिधि 1972 में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री थे. एमजीआर की नई पार्टी ने भ्रष्टाचार के मामले में करूणानिधि को घेरना शुरू किया. जून 1975 में देश में आपातकाल लागू हो गया. तमिलनाडु में एमजीआर लगातार करूणानिधि के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे. उस समय इंदिरा गांधी ने एमजीआर का खूब समर्थन किया. 1976 में जनता के प्रदर्शन का हवाला देते हुए केंद्र सरकार ने करूणानिधि की सरकार बर्खास्त कर दी.

1977 में देश में नए सिरे से लोकसभा चुनाव हुए. इंदिरा गांधी की कांग्रेस को पूरे देश में करारी हार का सामना करना पड़ा. तमिलनाडु में मामला अलग था. यहां कांग्रेस AIADMK के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रही थी. तमिलनाडु की 39 में से 34 सीटें कांग्रेस गठबंधन के खाते में गई. 1977 में इंदिरा गांधी सत्ता से बाहर थी. चरण सिंह गृहमंत्री थे और इंदिरा को जेल में डालने की कसम खाकर बैठे थे.

संकट की घड़ी में एमजीआर ने इंदिरा का साथ छोड़ दिया. इंदिरा ने इसे पीठ में खंजर की तरह लिया.
संकट की घड़ी में एमजीआर ने इंदिरा का साथ छोड़ दिया. इंदिरा ने इसे पीठ में खंजर की तरह लिया.

लोकसभा चुनाव के दो महीने बाद तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव हुए. एमजीआर ने मौके की नजाकत समझी और इंदिरा गांधी का हाथ झटक दिया. 1977 के तमिलनाडु विधानसभा में मुकाबला चौकोर था. जनता पार्टी, कांग्रेस, AIADMK और DMK के बीच सीधी टक्कर थी. एमजीआर यह मुकाबला जीतने में कामयाब रहे. 235 सीटों वाली विधानसभा में उन्हें 132 सीटों पर कामयाबी हासिल हुई.

मोरारजी देसाई ने प्रधनमंत्री बनने के बाद राज्यों में चल रही कांग्रेस सरकारों को बर्खास्त करना शुरू किया. एमजीआर को डर था कि मोरारजी उनकी सरकार के साथ भी वही सलूक ना करें. ऐसे में उन्होंने मोरारजी देसाई का दामन थामने में ही भलाई समझी. मोरारजी देसाई सरकार गिरने के बाद चरण सिंह के नेतृत्व में नई सरकार बनी. उस समय AIADMK पहला ऐसा क्षेत्रीय दल था जो केंद्र की कैबिनेट का हिस्सा बना.

राजस्थान में एक कहावत है, “ढाल में धक्का देना.” मतलब जब आदमी अपनी ढलान पर होता तो उसके करीबी उसे धक्का देने में पीछे नहीं रहते. इंदिरा को एमजीआर ने ढाल में धक्का दिया था. 1980 में जब इंदिरा सत्ता में लौटी तो उन्हें एमजीआर का धक्का याद था. उन्होंने एमजीआर की सरकार को बर्खास्त करने में कोई कोताही नहीं बरती.

4.मसखरों का समूह

1920-21 के साल में युवा जवाहर लाल नेहरु रूस की यात्रा पर थे. राजनीति के एक अभिनव प्रयोग को करीब से जांचने-परखने के लिए. लेनिन के नेतृत्व में 1917 में रूस की क्रांति नेगैरबराबरी और शोषण के खात्मे के यूटोपिया के बीज दुनिया के कोने-कोने में पसार दिए थे. नेहरु पर सोवियत रूस की यात्रा का गहरा प्रभाव पड़ा. यह मार्क्सवाद से जमीनी स्तर पर उनका पहला साबका था. रूस ने अपनी पंचवर्षीय योजनाओं से दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों में गजब का रोमांच पैदा किया. अक्टूबर क्रांति से पहले रूस मोटे तौर पर खेतिहर समाज था. स्टालिन के दौर में बड़े पैमाने पर औद्योगिकीकरण शुरू हुआ. उस समय रूस की जीडीपी ग्रोथ रेट 19 फीसदी के करीब हुआ करती थी. 1947 में आजदी के बाद नेहरु ने रूस की तर्ज पर भारत में पंचवर्षीय योजनों की शुरुआत की. मार्च 1950 में कैबिनेट के फैसले के बाद योजना आयोग की स्थापना हुई और 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना लागू की गई.

मनमोहन सिंह और राजीव गांधी.
मनमोहन सिंह और राजीव गांधी.

साल 1985. सातवीं पंचवर्षीय योजना खाका खींचा जा रहा था. मनमोहन सिंह उस समय योजना आयोग के उपाध्यक्ष हुआ करते थे. राजीव गांधी की जवानी यूरोप में बीती थी. वो पश्चिमी देशों की तरह भारत का शहरीकरण चाहते थे. योजना आयोग की बैठक के दौरान उन्होंने विकास को लेकर अपने विचार रखे. आधे घंटे के अपने भाषण में उन्होंने साफ किया कि वो देश में पश्चिम जैसा शहरीकरण चाहते हैं. जिसमें शॉपिंग मॉल, तेज गति की रेल और बड़े हाउसिंग कॉम्प्लेक्स जैसी चीजें शामिल हों.

मनमोहन सिंह राजीव गांधी के विजन से सहमत नहीं थे. उन्होंने राजीव गांधी के सामने चीजें साफ करते हुए कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था चौपट होने की कगार पर खड़ी है. अगर अभी चीजों को ठीक नहीं किया गया तो चीजें नियंत्रण से बाहर हो जाएंगी. मनमोहन सिंह का सुझाव था कि सातवी पंचवर्षीय योजना में लोक कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च कम किया जाना चाहिए. राजीव गांधी मनमोहन सिंह की बात पर खीझ गए. इसके कुछ दिन बाद पत्रकारों से बातचीत करते हुए राजीव ने  योजना आयोग को ‘बंच ऑफ जोकर्स’ कहा. यही वो चार घटनाएं थी जिनका जिक्र करते हुए नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस को घेरा.


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