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20 साल पहले: टूरिस्ट की लाश पर आतंकियों ने लिख दिया था 'अल फरान'

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पहलगाम एक बेहद खूबसूरत जगह. इत्ती खूबसूरत कि तस्वीरें देख लो तो दिल वहां जाने की तमन्ना करने लगे. साउथ जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले में है. स्विट्जरलैंड की मानिंद लगता है. यहां की लिद्दर नदी आपको लुभाएगी. वाटर राफ्टिंग के लिए आप खुद को नहीं रोक पाएंगे.

पहलगाम की बेताब वैली में लिद्दर नदी टूरिस्टों के लिए मन लुभावन जगह है.
पहलगाम की बेताब वैली में लिद्दर नदी टूरिस्टों के लिए मन लुभावन जगह है.

‘जब हम जवां होंगे जाने कहां होंगे’ गाना सुना होगा. 1983 में आई ‘बेताब’ फिल्म का है. सनी देओल और अमृता सिंह ने इसी फिल्म से डेब्यू किया था. इस फिल्म की शूटिंग पहलगाम में हुई और इस वजह से यहां की एक घाटी का नाम ही ‘बेताब वैली’ पड़ गया. पहलगाम अमरनाथ यात्रा का दौरान एक अहम पड़ाव है. 21 साल पहले ये खूबसूरत पहलगाम आतंक और जुल्म की दास्तान का हिस्सा बन गया.

पहलगाम अमरनाथ यात्रियों का अहम पड़ाव है.
पहलगाम अमरनाथ यात्रियों का अहम पड़ाव है.

4 जुलाई 1995 में यहां एक वारदात हुई. दिल-ओ-दिमाग को सुन्न कर देने वाली. विदेशी घूमने आते हैं और उन्हें किडनैप कर लिया जाता है. किडनैप करता है अल-फरान नाम का आतंकी संगठन. रूह कांप उठती है जब एक टूरिस्ट की लाश मिलती है, क्योंकि उस लाश के सीने पर आतंकियों ने धारदार हथियार से गोद कर लिखा था “अल-फरान.” ये दरिंदगी की गई थी इंडिया की जेल में बंद 21 आतंकवादियों को छुड़ाने के लिए. इन 21 में इंडिया की मोस्ट वांटेड लिस्ट में शामिल आतंकी मौलाना मसूद अजहर भी शामिल था. जो अब पाकिस्तान में छिपा बैठा है. ये आतंकी कश्मीर में दीन और आजादी का ढोंग रचकर यूथ को बरगला रहे हैं. खुद तो खाक में मिल ही रहे हैं और गुलिस्तां का मुस्तकबिल भी उजाड़ रहे हैं.

जो लाश कश्मीर में मिली उसका पोस्टमार्टम डॉ. तीरथ दास डोगरा ने AIIMS में किया था. ये वही डॉक्टर हैं जिन्होंने तंदूर कांड की परतें खोली थीं. तंदूर कांड कश्मीर किडनैपिंग केस से दो दिन पहले मतलब 2 जुलाई 1995 में हुआ. इस कांड में कांग्रेस के विधायक सुशील शर्मा ने अपनी बीवी नैना साहनी को पहले गोली मारी और बाद में एक होटल में ले जाकर लाश के टुकड़े किए और तंदूर में जला दिए. पहले पोस्टमार्टम में ये बात सामने नहीं आई थी कि नैना साहनी को गोली मारी गई थी. जब डॉ. तीरथ दास डोगरा ने पोस्टमार्टम किया तो सच सामने आ गया. सुशील ने अपनी बीवी को इस शक में मारा था कि वो बेवफाई कर रही हैं और किसी गैर मर्द से उसके संबंध हैं, जबकि नैना और सुशील की लव मैरिज हुई थी.

ये दोनों केस जुलाई में हुए. दोनों ने इंसानियत को झिंझोड़ दिया. नैना साहनी के मुजरिम को तो सजा मिल गई, लेकिन जम्मू कश्मीर में किडनैप हुए छह लोगों में से चार लोग कहां गए आज तक कुछ पता नही चला, क्योंकि दो की लाशें मिल गई थीं. आज फिर उसी साउथ जम्मू-कश्मीर में आतंक मचा है. तब अल-फरान था, अब हिजबुल मुजाहिद्दीन है. ये आतंकी संगठन था उस वक्त भी, लेकिन इतनी पॉवर में नहीं था जितना अब है.

सोचा नहीं होगा ये उनका आखिरी सफर है

ब्रिटेन के रहने वाले 33 साल के कीथ मंगन अपनी बीवी जूली के साथ और 23 साल के पॉल वेल्स अपनी गर्लफ्रेंड के साथ कश्मीर की सैर करने आए. अमेरिका के 43 साल के साइकोलॉजिस्ट डोनाल्ड हेचिंग्स और जॉन चिल्ड्स भी कश्मीर में घूमने आए थे. ये लोग खूबसूरत वादियों में ट्रैकिंग करने आए थे. उन्हें जरा भी इस बात का इल्हाम नहीं था कि ये ट्रैकिंग उनकी जिंदगी की आखिरी थका देने वाली होगी. पाकिस्तान के खतरनाक आतंकी गुट ‘हरकतुल अंसार’ के चमचा टाइप गुट ‘अल-फरान’ ने इन टूरिस्ट्स को किडनैप कर लिया. 8 जुलाई को जर्मनी के सैलानी का और 9 जुलाई को नार्वे के हंस किर्स्टन ऑस्ट्रो को भी किडनैप कर लिया गया. अल-फरान के बारे में सुरक्षा अधिकारियों को ज्यादा जानकारी नहीं थी.

अल-फरान सऊदी अरब की एक घाटी का नाम है. सुरक्षा अधिकारियों का मानना था कि ये हरकतुल अंसार का साथी गुट है. ये बात काफी हद तक सही भी लगती है क्योंकि ये जिन आतंकियों को छुड़ाने की मांग कर रहे थे उनमें तीन हरकतुल अंसार से ताल्लुक रखते थे. इनमें एक हरकतुल अंसार का सरगना सज्जाद खान, गुट का महासचिव और कराची की मैगजीन “सदा-ए-मुजाहिद” का एक्स-एडिटर मौलाना मसूद अजहर और हरकतुल जिहाद का सरगना नसरुल्लाह मंसूर लांग्रियाल शामिल थे. जो तिहाड़ जेल में बंद थे. मौलाना मसूद अजहर अब आतंकी गुट जैश-ए-मोहम्मद का सरगना है. जिसे वो पाकिस्तान के अधिकृत कश्मीर से चलाता है और इंडिया की बर्बादी के नारे लगाता है.

टूरिस्टों को छुड़ाने के लिए आतंकियों से हुई मुठभेड़

20 जून 1995 को अल-फरान के आतंकियों से मुठभेड़ होती है, लेकिन कोई कामयाबी नहीं मिलती. अल फरान के आतंकियों ने कहा, ‘इस मुठभेड़ में एक टूरिस्ट जख्मी हो गया है. अगर सरकार जल्द ही उनके 21 साथियों को नहीं छोड़ती तो वो सबको मार डालेंगे.’

सरकारी एजेंसियां इसे आतंकियों की एक चाल बताती हैं. कहा जाता है कोई मुठभेड़ नहीं हुई. एक आला अफसर ने कहा था कि अगर कोई मुठभेड़ हुई भी तो ये कैसे इकरार कर लें, क्योंकि ऐसा एतराफ करने पर सुरक्षा बलों के मनोबल पर बुरा असर पड़ेगा.

पत्रकारों को उन इलाकों से दूर कर दिया गया ताकि कोई जानकारी लीक न हो. वेस्टर्न मीडिया में ये मामला रोजाना सुर्खियां बना. अमेरिका और ब्रिटेन अपने देश के लोगों की रिहाई के लिए परेशान हुए. सारी कोशिशें बेकार जाती हैं. अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और नार्वे अलगाववाद समर्थक पार्टी हुर्रियत कांफ्रेंस और दूसरे उग्रवादी गुटों से मदद मांगते हैं. सिर्फ मायूसी के सिवा कुछ नहीं मिलता.

पाकिस्तान का भी था हाथ!

पाकिस्तान सीनेट के मेंबर और कट्टरपंथी जमायत-ए-उलेमा इस्लामी के महासचिव फजल-उर-रहमान इंडिया आता है. फजल-उर-रहमान दावा करता है कि उसे ब्रिटेन और अमेरिका ने टूरिस्टों को छुड़ाने के लिए बातचीत करने को भेजा है. अगर भारत सरकार चाहे तो वो आतंकियों से बात करने जाएंगे. उस वक्त फॉरेन स्टेट मिनिस्टर रघुनंदन लाल भाटिया ने कहा- उनसे मदद मांगने का सवाल ही नहीं है. हालात से निपटने को हमारा सिस्टम पहले से वहां मौजूद है. फजल-उर-रहमान का इंडिया आकर दावा करना इस बात की दलील है कि वो पहले से अल-फरान के आतंकियों से कांटेक्ट में थे. इससे जाहिर होता है कि इस कांड में पाकिस्तान का भी हाथ था.

आतंकियों से संपर्क साधने को कोई राजी नहीं था

सुरक्षा एजेंसियां टूरिस्टों को छुड़ाने के लिए हर एक कोशिश करती हैं. प्लेन के जरिए सर्च ऑपरेशन चलाया जाता है. आतंकवादियों से लगातार धमकियां मिलती हैं. अनंतनाग के पुलिस चीफ मुहम्मद अमीन शाह को अल-फरान से कांटेक्ट करने को कहा गया, लेकिन शाह तैयार नहीं हुए. इसकी वजह खौफ था. मौत का खौफ. हुआ ये था कि 1993 में हरकतुल अंसार ने दो टूरिस्ट को किडनैप किया था. उन्हें रिहा कराने के लिए शाह ने साउथ कश्मीर के मीरवाइज काजी निसार के साथ अहम रोल निभाया था. उस वक्त टूरिस्टों को तो छुड़ा लिया गया, लेकिन पाकिस्तान के कट्टरपंथ गुट ने मीरवाइज काजी निसार को बाद में बेरहमी से मार डाला था. ये ही डर था जिसने शाह को हिम्मत नही दी.

बीवियों को सामने लाया गया ताकि आतंकियों को रहम आ जाए

सारी कोशिशें बेकार होती गईं. हुर्रियत कांफ्रेंस ने भी बोल दिया, हम अल-फरान को नहीं जानते. उसकी विचारधारा क्या है, हमें कुछ नहीं पता. ऐसे में सिर्फ अपील ही कर सकते हैं. सब कोशिशें नाकाम होती गईं. टूरिस्टों की फैमिली को मीडिया के सामने लाया गया.

अमेरिकी बंधक डोनाल्ड हेचिंग्स की बीवी जेन हेचिंग्स अपने दुखों का इजहार करती हैं. कहती हैं, “हमें कश्मीरियों की तकलीफों से हमदर्दी हैं, लेकिन बंधक बनाए गए लोग तो बेखता हैं. हमारी क्या गलती है ? कीथ मंगन की बीवी कहती हैं, ‘गॉड के लिए प्लीज हमारे लोगों को छोड़ दो.’

किडनैप हुए टूरिस्ट की बीवियां उनकी रिहाई के लिए आतंकियों से अपील करती हैं. मगर अफ़सोस जालिमों पर कोई असर न हुआ. ये तस्वीर अगस्त 1995 में इंडिया टुडे मैगजीन में छपी.
किडनैप हुए टूरिस्ट्स की बीवियां उनकी रिहाई के लिए आतंकियों से अपील करती हैं. मगर अफ़सोस जालिमों पर कोई असर न हुआ. ये तस्वीर अगस्त 1995 में इंडिया टुडे मैगजीन में छपी.

इस अपील का असर ये हुआ कि अल-फरान ने आतंकियों को रिहा करने की मियाद दो दिन बढ़ा दी और कहा अगर रिहा नहीं किया गया तो वो कभी भी टूरिस्टों को मार देंगे.

फिर वो हुआ जो नहीं होना चाहिए था

13 अगस्त 1995, जगह पहलगाम. एक लाश मिलती है. पोस्टमार्टम होता है. वो लाश होती है नार्वे के हंस किर्स्टन ऑस्ट्रो की. सीने पर लिखा होता है अल-फरान. सभी के रोंगटे खड़े हो जाते हैं. बाकी बंधकों के रिश्तेदार खौफ से सहम जाते हैं. फिर भी इंडियन गवर्नमेंट आतंकियों को रिहा नहीं करती. 1997 में एक लाश और मिलती है. पुलिस उसकी पहचान नहीं कर पाती. डीएनए रिपोर्ट तैयार की जाती है. जिसमें पता चला कि वो लाश ब्रिटिश टूरिस्ट पॉल वेल्स की है. बाकी लोगों के साथ क्या हुआ, कुछ नहीं पता. जब एक आतंकी पुलिस के हत्थे चढ़ा तो उसने बताया कि चार लोगों को एक साथ गोली मार दी गई थी. पांच लोगों को कुर्बान करने के बाद भी मौलाना मसूद अजहर को जेल में कैद करके नहीं रखा जा सका. दिसंबर 1999 में आतंकियों ने इंडियन एयरलाइन का एक प्लेन हाईजैक किया और कंधार (अफगानिस्तान) ले गए. उसमें सवार लोगों को बचाने के लिए इंडियन गवर्नमेंट को हाफिज सईद समेत दो आतंकियों को छोड़ना पड़ा.

आज फिर वही साउथ जम्मू-कश्मीर है, जहां हिजबुल मुजाहिद्दीन कमांडर बुरहान वानी को इंडियन आर्मी मारती है. पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी हाफिज सईद और सैयद सलाहुद्दीन उसके लिए शोक सभा करते हैं. इंडिया के खिलाफ जहर उगलते हैं. बदहाली ये है कि कश्मीर हिंसा की आग में जल रहा है. बुरहान वानी के मरने के बाद भड़की हिंसा में सैकड़ों आर्मी वाले जख्मी हो गए. 35 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. कई जगह कर्फ्यू लगा है. इंटरनेट बंद है. अमरनाथ यात्रा उसी तरह रुक गई है, जैसे 1995 में रोक दी गई थी. तब भी हाल बदहाल थे आज भी हैं. अल्लाह ही जाने कब कश्मीर अमन की बारिश से सराबोर होगा. कब कमबख्त जाहिल आतंकी बिरादरी जमींदोज होगी.

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