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IS के राज में 'गे' लोगों को मिलती है सबसे खराब मौत

मैं फेसबुक स्क्रॉल करता हूं तो देखता हूं कि मेरे प्रेमी, दोस्त और कॉमरेड किस तरह आंसू बहा रहे हैं. मैं ये सोचने पर मजबूर हो जाता हूं कि हिंसा, अपने प्रियजनों को खोना, और मातम किस तरह से ‘क्वियर’ जीवन का केंद्र बन गए हैं. मैं उन खून से लथपथ लाशों के बारे में सोचता हूं, जिन्हें कुछ घंटे नाचने और शराब पीने की इतनी बड़ी सजा मिली. मैं अपने स्कूली दिनों के बारे में सोचता हूं. जब 20 मिनट के इंटरवल में अकेलापन काटता था, ‘लड़की जैसा’ होने की सजा के रूप में. मैं अपनी उस ‘ट्रांस’ दोस्त के बारे में सोचता हूं जिसका सर उसको रेप करने वालों ने फोड़कर खोल दिया गया था. मैं उन पलों के बारे में सोचता हूं जब मेट्रो में हर बार ‘गे’ बोलते समय मेरे साथियों की आवाज धीमी पड़ जाती है. मैं अपनी यूनिवर्सिटी के बारे में सोचता हूं, जहां समलैंगिकता पर बात करने के लिए हमें एक कमरा तक नहीं मिलता. जब मुझसे पूछा जाता है कि मैं हर चीज की ‘क्वियर’ एनालिसिस क्यों करना चाहता हूं. जब लोग मुझसे पूछते हैं, ‘तुम्हें कब पता चला तुम ऐसे हो?’ मैं उन पलों के बारे में सोचता हूं जब ‘क्वियर’ लोगों को अपने प्रेमियों और साथियों को रक्तदान करने से रोक दिया जाता है, जिससे उनकी ‘बीमारी’ दूसरों में न फैले, क्योंकि वो रंडियां हैं, बेशर्म रंडियां!

मैं आज (ऑरलैंडो शूटिंग) के बारे में सोचता हुए इन सब पलों के बारे में सोचता हूं. और पाता हूं कि हिंसा की समझ आने के पहले ही हमारे साथ हिंसा हो जाती है. ऑरलैंडो में हुई शूटिंग दिल दहला देने वाली है. लेकिन हिंसा से ज्यादा मुझे उस हिंसा की प्रस्तुति परेशान करती है. कि कितनी आम, नॉर्मल और व्यापक है ये हिंसा. मैं शोक मना रहा हूं. इस शोक के साथ मैं उन लोगों से जुड़ पा रहा हूं जिन्होंने हिंसा सही है, अपनों को खोया है. मातम एक मुश्किल चीज है. लेकिन यही एक चीज है जिससे इस हिंसा का विरोध किया जा सकता है. मैं सबसे कहूंगा कि वो मातम मनाएं. खासकर अपने ‘स्ट्रेट’ साथियों से. क्योंकि न जानते हुए भी वो 377 को तोड़ते हैं. क्योंकि यही एक तरीका है जिससे आप अपने आप को मुक्त कर सकते हैं. याद रहे, होमोफोबिया केवल समलैंगिकों के खिलाफ हिंसा नहीं. ये वो हिंसा है जिसे हमारे देश में अपराध तक नहीं माना जाता. स्टोनवाल से ऑरलैंडो से 377 तक, गे मर जाते हैं. वे मर जाते हैं चुंबन के पहले, प्रेम करने के पहले. वो मिलने के पहले बिछड़ जाते हैं.

-फेसबुक पर राहुल सेन

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सीरिया का पल्मिरा शहर. 32 साल के हवास मल्लाह से पूछा जाता है कि वो अपनी सजा से संतुष्ट है या नहीं. वो कहता है, ‘मुझे इस तरह मत मारो’. चाहो तो सर में गोली मार दो. उसके साथ सजा भुगत रहा 21 साल का मोहम्मद सलामे कहता है, ‘मुझे छोड़ दो. मैं दोबारा किसी पुरुष के साथ नहीं सोऊंगा.’

लेकिन जज दोनों की नहीं सुनता. ‘इन्हें ले जाकर फेंक दो’. कुछ नकाबपोश लोग मल्लाह और सलामे को पकड़ उनके हाथ बांध देते हैं. फिर उन्हें कुर्सी से बांध देते हैं. उनकी आंखों पर पट्टी बांध, उन्हें चार मंजिला इमारत से नीचे फेंक देते हैं.

दोनों नीचे गिरते हैं. मालूम नहीं पड़ता जिंदा हैं या मर गए. नीचे खड़ी भीड़ उन्हें पत्थर मार-मार निर्जीव कर देती है.

अगले दो दिनों तक उनके निर्जीव शरीर चौराहे पर लटके रहते हैं. और गर्दन में एक तख्ती टंगी होती है. जिसपर लिखा होता है. ‘मैंने ‘लूत’ के लोगों का गुनाह किया है. और मुझे उसी की सजा मिली है.’

दोनों के गुनाह: वो ‘गे’ थे.

जज कहता है, इनकी मौत इनके गुनाहों को धो देगी.

ISIS ने जो हत्याएं की हैं, उनमें गे लोगों को सबसे दर्दनाक मौतें नसीब हुई हैं. ISIS के वीडियोज में देखा जा सकता है, किस तरह कुर्सी से बांधकर गे आदमी को पांवों से लटका, उसको किसी ऊंची इमारत से नीचे फेंक देते हैं. आदमी सर के बल गिरता है. फिर नीचे खड़े लोग उसे पत्थर मारते हैं. और इस तरह एक गे को सज़ा दी जाती है. एसोसिएट प्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दिसंबर 2015 तक ISIS वाले 36 गे आदमी मार चुके थे. और ये सिर्फ वो नाम हैं जो रिकॉर्ड्स में दर्ज हैं.

घरवाले दुनिया को ये नहीं बताना चाहते कि मरने वाला उनका बेटा था. क्योंकि मरने वालों का गे होना उनके घर वालों के लिए सिर्फ शर्मिंदगी लेकर आता है. मरने वालों के लिए कोई नहीं रोता. वो जीते रहते, तो भी छिपकर रहते. लेकिन छिपकर रहना इस दर्दनाक मौत से कहीं बेहतर लगता है.

Still image from video shows men purported to be Egyptian Christians held captive by the Islamic State kneeling in front of armed men along a beach said to be near Tripoli

गे पुरुषों को हमेशा खतरा रहता है. मारे जाने से ज्यादा धोखे का. किसी घर वाले या रिश्तेदार को ही पता चल जाए तो भी वो उसे IS के हवाले कर सकते हैं. इसलिए नहीं कि वो ISIS के समर्थक हैं. बल्कि सिर्फ इसलिए कि उन्हें गे पुरुषों से नफरत होती है. वही लोग जो ISIS की हत्याओं की निंदा करते हैं, गे पुरुषों की मौत पर चूं तक नहीं करते. वो जो ISIS के मारने के तरीकों पर चौंक उठते हैं, मानते हैं कि गे लोगों को मारने में कुछ भी गलत नहीं है.

ISIS वाले गे पुरुषों को मार-मारकर उनके साथियों का नाम निकलवा लेता है. फिर उनके मोबाइल और लैपटॉप जब्त कर हर मुमकिन सबूत निकाल लेता है.

26 साल के डेनियल हैलेबी उस वक़्त सीरिया छोड़कर भागे थे, जब IS ठीक तरह से सीरिया पर कब्ज़ा तक नहीं जमा पाया था. ये नाम, डेनियल, उनका असली नाम नहीं है. बल्कि वो नाम है जो इन्होंने IS से बचने के लिए अपनाया है. डेनियल कहते हैं कि उनका एक बचपन का दोस्त था. जो उनके बारे में सब जानता था. डेनियल की मानें तो उनके दोस्त ने ही उनका नाम IS को दिया था.
डेनियल अलेपो शहर में रहता था. जब IS अलेपो पर कब्ज़ा जमा रहा था, विरोधियों ने बातचीत कर संधि करने की कोशिश की. IS ने एक लिस्ट थमाते हुए कहा, इन लोगों को हमारे हवाले कर दो. उस लिस्ट में डेनियल का नाम था. जिसका कारण सिर्फ एक था, डेनियल का गे होना. लेकिन समय रहते बात का पता चल गया. और डेनियल वहां भाग निकले.

डेनियल कहते हैं:

‘मैं आज भी नींद में चौंककर उठता हूं. मुझे लगता है मैं एक इमारत से उल्टा लटका हुआ हूं और नीचे गिरने वाला हूं.’

आज वो तुर्की में हैं. उनके बेडरूम में ISIS विरोधी झंडा और एक बड़ा सा ‘रेनबो’ बैनर लगा हुआ है. उनके माता-पिता उनसे बात नहीं करते. क्योंकि वो गे हैं.

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कहते हैं कि कुरआन में ‘सोडोमी’ को गुनाह माना गया है. और लिखा है कि ऐसा करने वालों को सजा मिलनी चाहिए. सजा क्या हो, इसका कोई ज़िक्र नहीं है. इस पंक्ति की सब अपनी-अपनी व्याख्याएं करते हैं. जो ज्यादा कट्टर नहीं हैं, वो ये मानते हैं कि गे पुरुषों को बस अकेला छोड़ देना चाहिए.

हालांकि ‘हदीस’ में गे होने की सजा लिखी हुई है. हदीस वो बातें हैं, जो मोहम्मद साहब ने कही हैं. इन्हें लिखने वाले अलग-अलग लोग हैं. अलग-अलग मुसलमान समुदाय अलग-अलग हदीसों को मानते हैं. लोगों को ऊंचाई से उल्टा फेंक देना, IS का तरीका है. इसके पहले ये तरीका अपनाते नहीं देखा गया था. जबकि तालिबानी गे पुरुषों को जमीन में गाड़कर उसको ईंटों से पाट देते थे.

 

इंसान तो छोड़िए, ऐसा बर्ताव कोई किसी जंगली जानवर के साथ भी कर दे तो देखने वाले का दिल बैठ जाए. लेकिन ऐसा कुछ तो होता है, जो इन्हें इतने हिंसक कदम उठाने पर मजबूर करता है? लेकिन वो चीज क्या है– धर्म, फ्रस्ट्रेशन, पश्चिमी देशों से अलग अपनी पहचान बनाने की इच्छा, या फिर हिंसा करने की कोई नैसर्गिक इच्छा?

पल्स गे क्लब में 50 हत्याएं करने वाला उमर मतीन कहता था वो IS से जुड़ा हुआ है. हालांकि इस बात की कोई पुष्टि नहीं हुई है. बल्कि एक्सपर्ट्स का कहना है कि ये झूठ है. IS का समर्थन करने वालों ने इस काम की तारीफ़ की है. लेकिन ये कैसी मानसिकता है, जो IS की आड़ में ही सही, किसी आम आदमी को किसी रैंडम दिन 50 लोगों की जान लेने पर मजबूर कर सकती है?

लेटेस्ट अपडेट के मुताबिक मतीन के फोन में कई गे-डेटिंग ऐप थे. वो खुद अक्सर पल्स गे क्लब जाया करता था. एक्स-वाइफ का कहना है वो खुद भी एक गे हो सकता है. उनकी शादी ज्यादा नहीं टिक पाई थी. एक्स-वाइफ का कहना है कि ये काम उसका धर्म नहीं करवा सकता था. ‘वो बाइपोलर था. मुझे भी पीटता था.’

तो क्या मतीन खुद गे था? क्या वो खुद को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था? इसलिए तय किया कि अपने जैसों को मारकर मरूंगा?

ये वो सवाल हैं, जिनके जवाब मतीन के साथ ही ख़त्म हो गए. लेकिन हर उस इंसान को उनकी रीढ़ की हड्डी में एक डर भरी सिहरन दे गए, जो अपनी मर्ज़ी से प्रेम करने का फैसला लेते हैं.

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