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महिलाओं का सम्मान न करने वाली पार्टियों में आखिर हम किसको चुनें?

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चुनाव का खेला जितना इंटरेस्टिंग है, उतना ही घटिया भी. जबतक जूतम-लात न हो जाए, गाली-गलौज न हो, और 4-5 महिला कैंडिडेट्स पर हद दर्ज़े की नीच टिप्पणियां न हों. तब तक पता कैसे चलेगा कि हमारे यहां चुनाव हुए हैं. पर तमाम घटिया, नफरत फैलाने वाले बयानों के बीच एक ऐसा बयान सुनने में आया. जिसने एक साथ आशा और निराशा से भर दिया.

PP KA COLUMN

महाराष्ट्र में बीजेपी का बड़ा चेहरा हैं शाइना एनसी. प्रवक्ता हैं. महाराष्ट्र बीजेपी की ट्रेजरार हैं. उन्होंने कहा:

‘हमें पॉलिटिकल इच्छाशक्ति की ज़रूरत है, महिलाओं की इज्जत की ज़रूरत है, वोटबैंक के तौर पर महिलाओं में भरोसे की ज़रूरत है, केवल हमारे कॉज के लिए बोलना काफी नहीं. मैनिफेस्टो दर मैनिफेस्टो पॉलिटिकल पार्टियों में पुरुषवादी मानसिकता देखने को मिलती है. इसलिए कहीं भी किसी महिला का नाम एक कैंडिडेट के तौर पर उभर कर सामने आता है, तो सवाल उठते हैं उसके जीतने की क्षमता पर, उसकी फंडिंग पर, जब तक वो किसी की बेटी, या बहू न हो. यहां से मैं आरक्षण के लिए आवाज़ उठाऊंगी, भले ही मुझे अपनी ही पार्टी या सभी पार्टियों की पुरुषवादी मानसिकता से लोहा क्यों न लेना पड़े.’

गौर करने की बात ये है. कि ये बयान किसी बाहरी व्यक्ति के पास से नहीं आ रहा है. शाइना ने सभी को ‘लिप सर्विस’ का दोषी बताया है. यानी औरतों के बारे में बड़ी-बड़ी बातें करना. पर खुद ही उनको कोई पॉलिटिकल रिप्रेजेंटेशन न देना.

कांग्रेस-बीजेपी, मोदी-राहुल, लगातार ये एक-दूसरे के लिए ये साबित करने में लगे रहते हैं कि अगला कामचोर है. नाकारा है. अच्छा नेता नहीं है. कहते हैं जो उन्होंने नहीं किया, वो हम कर के दिखाएंगे. पर कितनी महिलाओं को टिकट मिला. और कितनी महिलाएं जीतकर संसद में पहुंची. ये एक ऐसा मसला है, जिसमें बीजेपी-कांग्रेस एक दूसरे को कभी नहीं हराना चाहते.

कांग्रेस

पहले बात विपक्ष की. कांग्रेस ने अपने मेनिफेस्टो में कहा है कि जैसे ही वो सत्ता में आएंगे, संसद के पहले सत्र में विमेंस रिजर्वेशन बिल पास करवाएंगे. यानी वो बिल, जो औरतों को लोकसभा और विधान सभा में कुछ शर्तों समेत 33 फीसद आरक्षण दिलवा सकता है. वही बिल, जो पिछले 10 साल से लटका है. जिसपर संसद में आजतक कभी वोट नहीं हुआ. पर संसद में एक तिहाई औरतों के होने का मतलब ये कि उससे भी ज्यादा औरतें चुनाव लड़ें. जिस तरह कांग्रेस ने सीना ठोककर मैनिफेस्टो बढ़ाया है. काश उतने ही कॉन्फिडेंस से वे अपनी महिला कैंडिडेट्स की लिस्ट भी दिखा सकते. 33 तो छोड़िये, अभी तक कांग्रेस ने जितने टिकट महिलाओं को दिए हैं, वो कुल डिक्लेयर्ड कैंडिडेट्स का 15 फीसद भी नहीं है.

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प्रियंका के साथ शुरू हुए इस ‘नए’ दौर के महिलाओं के लिए क्या मायने हैं? कुछ भी नहीं.

बड़ी विडंबना है कि कांग्रेस पार्टी के 133 साल के इतिहास में, सबसे लंबे समय के लिए जिसने अध्यक्ष की कुर्सी संभाली है, वो एक महिला हैं. हां, सोनिया गांधी. जो लगभग 20 साल कांग्रेस की देखरेख करती रहीं. और आज भी उसका जरूरी हिस्सा हैं. कांग्रेस ने इस बार प्रियंका को अपने प्रचार का चेहरा बनाया है. पर महिलाओं के इन पदों पर होने के, महिलाओं के लिए ही कोई मायने नहीं हैं. हमें बस इतना पता पड़ता है कि वो ‘गांधी’ हैं.

बीजेपी

चलते हैं बीजेपी की ओर. इनकी भी महिला कैंडिडेट्स कुल मिलाकर 15 फीसद नहीं हैं अब तक. हालांकि कोई ठोस संख्या अभी तक नहीं दी जा सकती हैं. क्योंकि सभी कैंडिडेट्स डिक्लेअर नहीं हुए हैं. पर जितने भी हुए हैं, उसका टोटल आप देख सकते हैं.

कांग्रेस-बीजेपी जैसे नेशनल प्लेयर्स की लिस्ट में 15 फीसद महिलाएं भी नहीं हैं (साभार)
कांग्रेस-बीजेपी जैसे नेशनल प्लेयर्स की लिस्ट में 15 फीसद महिलाएं भी नहीं हैं (साभार)

मोदी की कैबिनेट ने जब एक महिला को रक्षामंत्री बनाया, ये देश के लिए एक ऐतिहासिक पल था. होना भी चाहिए. आज जब विपक्ष बालाकोट स्ट्राइक का सबूत मांगता है. तो निर्मला अपनी पार्टी की सरकार की तरफ से बोलती हैं. ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी, कि देशहित और देश की सुरक्षा के जिस नैरेटिव को बीजेपी ने ऐन चुनाव के समय बिल्ड किया है. उसमें निर्मला सीतारमण अहम हैं.

देशहित और देश की सुरक्षा के जिस नैरेटिव को बीजेपी ने ऐन चुनाव के समय बिल्ड किया है. उसमें निर्मला सीतारमण अहम हैं.
देशहित और देश की सुरक्षा के जिस नैरेटिव को बीजेपी ने ऐन चुनाव के समय बिल्ड किया है. उसमें निर्मला सीतारमण अहम हैं.

मोदी सरकार के बीते 5 साल में एक और महिला की अहम भूमिका रही है. बीजेपी की सीनियर नेता सुषमा स्वराज. 40 साल का पॉलिटिकल करियर. कभी कोई हलकी या छोटी बात कहने के लिए ख़बरों में नहीं रहीं. बल्कि एक मददगार और क्विक नेता के तौर पर इनकी हालिया पहचान है.

इन्हीं सुषमा स्वराज को जब बीते साल तन्वी सेठ पासपोर्ट मामले में इन्टरनेट पर ट्रोल किया गया. बीजेपी ने दिखा दिया कि अपनी महिला मिनिस्टर की वो कितनी इज्जत करते हैं. सुषमा स्वराज को बुरी बातें कही गईं. धोखेबाज़ कहा गया. कहा गया कि उनकी किडनी फिर से फेल हो जाए. ये कहा गया कि वे पाकिस्तान चली जाएं. और इस पूरे वक़्त सुषमा के बचाव में बीजेपी का एक भी नेता-मंत्री नहीं आया. न ही संघ का कोई चेहरा सामने आया.

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सुषमा स्वराज को जब बीते साल तन्वी सेठ पासपोर्ट मामले में इन्टरनेट पर ट्रोल किया गया, बीजेपी-संघ से कोई उनके बचाव में नहीं आया.

ये चौंकाने वाली बात नहीं है कि इस घटना के कुछ महीनों बाद सुषमा स्वराज ने मीडिया को बताया कि वो 2019 का चुनाव नहीं लड़ना चाहतीं. क्योंकि सेहत उनका साथ नहीं दे रही है.

सुषमा के साथ पत्ता कटा है सुमित्रा महाजन का. पार्टी ने उनको इतनी इज्ज़त भी नहीं दी कि उनसे बात करे. तब तक इंतज़ार करते रहे, जबतक सुमित्रा ने खुद ही चुनाव से किनारा नहीं कर लिया. 30 साल के पॉलिटिकल करियर में लगातार 8 बार वो लोकसभा में चुनकर आईं. मगर जाने के पहले सम्मानजनक विदाई भी नहीं मिली.

सुमित्रा महाजन चिट्ठी लिखकर खुद पीछे हटने को मजबूर हुईं.
सुमित्रा महाजन चिट्ठी लिखकर खुद पीछे हटने को मजबूर हुईं.

मोदी कैबिनेट के लगभग बड़े 40 मंत्रियों में महज़ 5 महिलाएं थीं. जिसमें से दो, यानी सुषमा स्वराज और उमा भारती 2019 के चुनाव से ड्रॉप हो चुकी हैं.

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शाइना एनसी, जिनके ज़िक्र से हमने शुरुआत की थी, उन्होंने एक और बड़ी बात कही है. वो ये, कि पार्टी लीडरों को महिलाओं पर यकीन ही नहीं है. उन्हें ये भरोसा ही नहीं है कि महिला अपने दम पर चुनाव जीत सकती है. वो कभी महिलाओं पर भरोसा नहीं दिखाते और अंततः जितनी महिलाओं को टिकट मिलता है वो अपने पति, पिता या ससुर का एजेंडा आगे बढ़ा रही होती हैं.

महाराष्ट्र की महिला कैंडिडेट्स को लेकर शाइना ने कहा:

‘सात महिला कैंडिडेट्स- आपको लगता है ये काफी हैं? उनमें से तीन – पूनम महाजन, प्रीतम मुंडे और हीना गावित, पार्टी लीडरों की बेटियां हैं. स्मिता वाघ पार्टी लीडर की पत्नी हैं. इसे आप औरतों का प्रतिनिधित्व कहते हैं? मुझे फैमिली कनेक्शन वाली महिलाओं से कोई परेशानी नहीं है. अगर वो टैलेंटेड हैं तो. लेकिन दूसरों को भी तो मौका मिलना चाहिए. लेकिन अगर आप उन औरतों को मौका नहीं देंगे जिनका कोई फैमिली कनेक्शन नहीं है, तो हम जैसी औरतें आगे कैसे बढ़ पाएंगी. ये मेरे बारे में या किसी एक पॉलिटिकल पार्टी के बारे में नहीं है. ये हर पार्टी की हालत है.’

इन चुनावों में ममता बनर्जी ने TMC में 41 फीसद टिकट औरतों को दिए हैं. नवीन पटनायक ने बीजू जनता दल में एक-तिहाई टिकट औरतों को दिए हैं. पर बीजेपी और कांग्रेस जैसे नेशनल प्लेयर्स अब भी इस आंकड़े से बहुत दूर हैं.

लोकतंत्र में औरतें बहुत जरूरी हैं. इसलिए खूब योजनाएं चलाई जाती हैं उनके लिए. पर उनकी जरूरत बस ‘वोटर’ के तौर पर दिखती है. ‘वोटेड’ के तौर पर नहीं. जब संसद में नए बिल पेश और पास होते हैं, उनको देखने, उनपर बहस करने के लिए महज 10 फीसद औरतें होती हैं. ये मनगढ़ंत बात नहीं है. 2014 चुनाव में लोकसभा के 543 सांसदों में से केवल 66 महिलाएं थीं. ऐसे में महिलाएं, महिला-प्रधान मुद्दों के लिए किसे वोट दें?

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बीते महीने न्यूजीलैंड में हुए आतंकी हमले पर ऑस्ट्रेलियाई सांसद फ्रेजर ऐनिंग ने कहा था कि ये तो होना ही था. क्योंकि मुसलमान शरणार्थी ही इतने ज्यादा हैं. ऑस्ट्रेलिया की पार्लियामेंट में ऐनिंग को खूब लताड़ा गया था. क्योंकि उनका कमेंट मुसलामानों के खिलाफ नफ़रत फैलाने वाला था. हमें देखना चाहिए कि महिला सांसदों ने किस तरह ऐनिंग को ‘पीस ऑफ़ माइंड’ दिया था. हालांकि ऑस्ट्रेलिया में भी उतनी महिला सांसद नहीं हैं, जितनी हम एक आदर्श समाज में चाहेंगे. पर 28% एक बेहतर संख्या है.


ये भी पढ़ेंलोकसभा चुनाव 2019: पॉलिटिक्स बाद में, पहले महिला नेताओं की ‘इज्जत’ का तमाशा बनाते हैं!

 

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meow: how women are getting meagre representation in loksabha elections 2019 yet again

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