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9 साल बाद रिहा हुए ले. कर्नल पुरोहित एक बदनसीब खुफिया एजेंट हैं या सेना में पहले आतंकवादी?

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किसी आतंकी हमले के मामले में आरोपी बनाए गए देश के पहले सैन्य अफसर लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित आखिर जेल से बाहर आ गए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने 21 अगस्त, 2017 की सुबह उन्हें 2008 में हुए मालेगांव ब्लास्ट केस में बेल दे दी थी. तब से 23 अगस्त, 2017 की सुबह तक का समय कागज़ी कार्यवाही में लगा. सेना पुलिस की एक टीम पुरोहित को मुंबई की तलोजा जेल से अपने साथ ले गई.

पुरोहित ने टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा कि वो अपने परेशानियों के लिए किसी को दोष नहीं देते, ये सब किस्मत का खेल था. पुरोहित के रिटायर होने में अभी 12 साल का वक्त है. पुरोहित ने कहा कि वो सेना में बने रहना चाहते हैं. सेना ने अपनी कोर्ट ऑफ इंक्वायरी के बाद पुरोहित को सेना से बर्खास्त करने का आदेश दिया था. फिलहाल सेना ने पुरोहित की बर्खास्तगी पर अंतिम निर्णय नहीं लिया है. सेना सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पढ़ने के बाद इस बारे में फैसला करने वाली है.

कौन हैं लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित?

पुरोहित को नवंबर, 2008 में गिरफ्तार किया गया था. लेकिन एक बात तय करना आज भी उतना ही मुश्किल है, जितना उनकी गिरफ्तारी वाले दिन था. वो ये कि लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित एक देशभक्त फौजी हैं, जो एक साजिश का शिकार हुए या फिर वो एक हिंदू चरमपंथी संगठन के हिंदुस्तानी की फौज में पैठ बनने की पहली मिसाल हैं.

लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित
लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित

लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित एक मध्यवर्गीय मराठी ब्राह्मण परिवार से आते हैं. पिता बैंक में नौकरी करते थे. उनकी पढ़ाई उनकी पैदाइश के शहर पुणे के ही अभिनव विद्यालय और गरवाड़े कॉलेज में हुई. पढ़ाई के बाद पुरोहित फौज में भर्ती हो गए. 1994 में उन्होंने ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी चेन्नई से अपनी ट्रेनिंग पूरी की. कमीशन मिला मराठा लाइट इन्फेंट्री में. कश्मीर में तैनाती के दौरान पुरोहित मेडिकली डाउनग्रेड हो गए. उनके घुटने में लगी चोट के बाद उन्हें फील्ड पोस्टिंग नहीं दी गई. फिर उन्हें मिलिट्री इंटेलिजेंस में शिफ्ट कर दिया गया. इंटेलिजेंस फील्ड सिक्यॉरिटी यूनिट (एमआई-21) में पुरोहित 2002 से 2005 तक रहे. इस यूनिट का काम सेना की आतंक-विरोधी कार्रवाई के लिए जानकारी जुटाना होता है.

सेना के अंदर और बाहर जिससे पूछो, वो यही बताता कि पुरोहित एक देशभक्त फौजी हैं, जो अपने काम को लेकर बेहद संजीदा थे.

मालेगांव ब्लास्ट 2008

लेकिन फिर साल 2008 आया. 29 सितंबर को शुक्रवार की नमाज़ के बाद नासिक के मालेगांव में भिक्कू चौक पर एक मोटरसाइकिल पर लगे बम में धमाका हो गया. सात लोगों की जान गई और सौ से ज़्यादा लोगों को चोट पहुंची. एक और बम गुजरात के मोदासा में फटा, जिसमें एक लड़के की जान गई. इसके ठीक तीन दिन पहले दिल्ली में भी इसी तरह के बम ब्लास्ट हुए थे.

मालेगांव ब्लास्ट 2008
मालेगांव ब्लास्ट 2008

आगरा से मुंबई जाने वाली मशहूर एबी रोड पर पड़ने वाला मालेगांव एक साधारण सा कस्बा है. यहां लोग हफ्ते में छह दिन पावरलूम पर काम करते हैं और एक दिन फिल्म देखते हैं. कई बार ये फिल्में हिट फिल्मों की पैरोडी होती हैं, जिन्हें मालेगांव में रहने वाले ही बनाते हैं. लेकिन अनुपात की दृष्टि से यहां की ‘बड़ी’ मुस्लिम आबादी इसे एक ‘संवेदनशील’ जगह बना देती है.

2006 में भी शब ए बारात के दिन यहां सीरियल ब्लास्ट हुए थे, जिनमें 37 लोग मारे गए थे. इसलिए 29 सितंबर 2008 के बम ब्लास्ट को गंभीरता से लिया गया. महाराष्ट्र पुलिस के आतंक विरोधी दस्ते (एटीएस) को जांच की ज़िम्मेदारी दी गई. इसके चीफ थे हेमंत करकरे. करकरे की अगुआई में ये जांच तब तक चली, जब तक 26 नवंबर 2008 को हुए मुंबई हमलों में उनकी जान नहीं चली गई.

‘हरा आतंक-भगवा आतंक’

शुरुआत में धमाकों का शक मुस्लिम चरमपंथियों पर किया गया, लेकिन ब्लास्ट में इस्तेमाल हुई बाइक की जांच ने पुलिस का ध्यान एक ऐसी संभावना की ओर कर दिया, जो तब तक नामुमकिन लगती थी- ऐसे हिंदू चरमपंथी संगठनों की मौजूदगी, जो बम ब्लास्ट जैसी गतिविधियों तक को अंजाम दे रहे थे. मोटरसाइकिल के ज़रिए पुलिस साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर तक पहुंची.

24 अक्टूबर 2008 को प्रज्ञा के साथ नारायण गोपाल सिंह कलसंघरा और श्याम भंवरलाल साहू को गिरफ्तार किया गया था. इन्होंने पूछताछ में राष्ट्रीय जागरण मंच, शारदा सर्वज्ञ पीठ, हिंदू राष्ट्र सेना और अभिनव भारत जैसे संगठनों का नाम लिया. अभिनव भारत ही वो नाम था, जिसने इस केस में एक और नायाब संभावना की ओर इशारा किया- फौज के एक अफसर के भारत के अंदर आतंकी गतिविधि में शामिल होना.

इस सब ने देश में आतंकवाद के रंग पर बहस को जन्म दे दिया. कहा जाने लगा कि मुस्लिम चरमपंथ हरा आतंकवाद है और अब हिंदू चरमपंथ, यानी भगवा आतंकवाद का उदय हो रहा है.

साध्वी प्रज्ञा
साध्वी प्रज्ञा

पुरोहित पर लगे इल्ज़ाम

4 नवंबर 2008 को एटीएस ने लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित को पूछताछ के लिए गिरफ्तार किया. ये इस केस से जुड़ी सबसे हाई प्रोफाइल गिरफ्तारी थी. कर्नल पुरोहित पर इल्ज़ाम लगा कि वो अपनी देवलाली में पोस्टिंग के दौरान रमेश उपाध्याय नाम के एक रिटायर्ड मेजर से मिले. उपाध्याय ने अभिनव भारत बनाया था, जिसमें पुरोहित भी शामिल हुए. कहा गया कि अभिनव भारत के ज़रिए इकट्ठा हुए पैसों से हथियार और गोला बारूद खरीदे, जिनका इस्तेमाल मालेगांव धमाकों में हुआ. पुरोहित पर सेना से 60 किलो आरडीएक्स चुराने का इल्ज़ाम भी लगा.

पुरोहित तक कैसे पहुंची पुलिस

गिरफ्तारी के वक्त पुरोहित आर्मी एजुकेशन कोर ट्रेनिंग कॉलेज एंड सेंटर, पचमढ़ी में अरबी सीख रहे थे. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मालेगांव ब्लास्ट के बाद पुरोहित ने कुछ SMS उपाध्याय को भेजे थे. इन्हीं को डिकोड करने पर पुलिस का शक पक्का हुआ और पुरोहित को गिरफ्तार किया गया. पुरोहित, साध्वी प्रज्ञा और बाकियों पर मकोका के तहत केस चलाया गया. केस की जांच एनआईए को दिए जाने के बाद साध्वी प्रज्ञा को क्लीन चिट मिल गई, लेकिन पुरोहित पर लगे आरोप बने रहे. मकोका के तहत केस चलाने को कोर्ट में चुनौती दी गई और आखिर में सुप्रीम कोर्ट ने केस में से मकोका की धाराएं हटवा ही दीं.

बाद में पुरोहित का नाम समझौता ब्लास्ट में भी सामने आया था.
बाद में पुरोहित का नाम समझौता ब्लास्ट में भी सामने आया था.

फौज की अपनी इन्क्वायरी भी हुई

आतंकी हमले में एक फौजी अफसर का नाम आया, तो फौज ने अपनी ओर से भी कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी बिठा दी. कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी 7 अप्रैल 2009 से शुरू होकर 1 सितंबर 2010 तक चली. आखिर में पुरोहित को फौज से बाहर करने की सिफारिश की गई. पुरोहित इस फैसले के खिलाफ आर्म्ड फोर्सेज़ ट्राइब्यूनल गए थे, जिसके बाद नए सिरे से कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी का गठन हुआ था. ये इन्क्वायरी 2012 तक चली.

लेकिन ये कहानी दूसरे ढंग से भी कही जाती है

अपनी गिरफ्तारी के बाद से ही पुरोहित कहते रहे हैं कि मिलिट्री इंटेलिजेंस के अधिकारी उन्हें फंसा रहे हैं. 2009 में ही उन्होंने इसे लेकर तब के आर्मी चीफ को एक लेटर भी लिखा था. 2012 में आउटलुक मैगज़ीन में उनका इंटरव्यू छपा. इसमें उन्होंने कहा कि वो अभिनव भारत में एक खुफिया मिशन के तहत शामिल हुए थे और इसकी पूरी जानकारी उनके वरिष्ठ फौजी अफसरों को थी. पुरोहित कहते हैं कि सेना के पास इसके रिकॉर्ड भी मौजूद हैं.

पुरोहित ने आर्म्ड फोर्सेज़ ट्राइब्यूनल से भी कहा था कि उन्होंने अपनी गिरफ्तारी के लगभग दो हफ्ते पहले ही मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में हिंदू चरमपंथियों की गतिविधियों की जानकारी मिलिट्री इंटेलिजेंस से साझा की थी. पुरोहित का कहना था कि ये जानकारी उन्होंने देवलाली में अपनी तैनाती के दौरान इकट्ठा की थी. (इसी पोस्टिंग के दौरान उनकी गतिविधियों को महाराष्ट्र एटीएस ने संदिग्ध माना था.)

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कर्नल पुरोहित की पत्नी अपर्णा पुरोहित लगातार अदालत दर अदालत केस लड़ती रहीं.

आउटलुक के मुताबिक सेना की कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी के सामने पेश हुए गवाहों में से एक को छोड़कर किसी ने भी पुरोहित के आतंकी होने की बात नहीं कही थी. तहलका की एक रिपोर्ट के मुताबिक जिस एक अफसर कैप्टन नितिन जोशी ने पुरोहित के खिलाफ बयान दिया था, उन्होंने बाद में महाराष्ट्र मानवाधिकार आयोग से शिकायत की कि उन पर पुरोहित के खिलाफ बयान देने के लिए एटीएस की ओर से दबाव बनाया गया था. उन्हें जान से मारने की धमकी दी गई थी. कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी के दौरान पुरोहित की कई बातें सही भी निकलीं. हिंदू चरमपंथियों के बारे में जबलपुर की लायसन यूनिट को लिखे गए उनके खत की भी तस्दीक हुई.

लेकिन इस सब के बावजूद पुरोहित और उनकी पत्नी अर्चना इन्क्वायरी की रिपोर्ट पाने के लिए भटकते रहे. 2016 में पुरोहित ने खत लिखकर तब के रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर से इसमें दखल देने को कहा था.

तहलका की रिपोर्ट में कई फौजी अफसरों के हवाले से कहा गया है कि पुरोहित एक शानदार करियर वाले खुफिया अधिकारी थे. उन्हें आईएसआई और सिमी पर विशेषज्ञ माना जाता था और उनकी एक के बाद एक एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट तारीफ से भरी हैं. पुरोहित के अभिनव भारत से जुड़ाव पर भी सबकी राय यही रही कि पुरोहित अपना काम कर रहे थे और उन्होंने अपने वरिष्ठों को अपनी बैठकों के बारे में बताया भी था. इस बात पर भी सवाल उठाए गए हैं कि पचमढ़ी में रहे पुरोहित मालेगांव में ब्लास्ट कराने में कितने समर्थ रहे होंगे.

एक वीडियो में अपर्णा पुरोहित ने दावा किया था कि एटीएस ने कर्नल पुरोहित को टॉर्चर किया थाः

पहले गिरफ्तारी पर राजनीति, अब बेल पर

साध्वी प्रज्ञा और पुरोहित की गिरफ्तारी के बाद भाजपा और शिवसेना ने आरोप लगाए थे कि कांग्रेस एटीएस का इस्तेमाल राजनीतिक फायदे के लिए कर रही है. पुरोहित का नाम समझौता ब्लास्ट में लिए जाने पर पुरोहित के नाम का इस्तेमाल पाकिस्तान भी करने लगा, ये कहने के लिए कि भारत का एक फौजी अफसर भारत में पाकिस्तानी नागरिकों की मौत के लिए ज़िम्मेदार है. अप्रैल 2016 में एनआईए ने पुरोहित को समझौता ब्लास्ट मामले में क्लीन चिट दे दी, लेकिन तब तक पर्याप्त बयानबाज़ी हो चुकी थी.

25 अप्रैल 2017 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने केस में पुरोहित की सहआरोपी साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को बेल दे दी. लेकिन पुरोहित को बेल नहीं दी गई. पुरोहित इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए. उनकी पैरवी की मशहूर वकील हरीश साल्वे ने. कोर्ट में अपनी बेल की सुनवाई के दौरान 17 अगस्त 2017 को भी पुरोहित ने यही कहा कि वो ‘पॉलिटिकल क्रॉसफायर’ में फंसे हुए हैं और 9 सालों में भी उनके खिलाफ आरोप तय न होना उनकी ज़मानत के लिए पर्याप्त कारण तैयार करता है. अब उन्हें देश की सबसे बड़ी अदालत से अंतरिम राहत मिल गई है, लेकिन बयानबाज़ी से नहीं. कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के ट्वीट्स मिसाल हैः

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कुछ लोग दूसरे पाले में हैं:

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लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित और 2008 के मालेगांव ब्लास्ट से उनके जुड़ाव की कहानी बहुत पेचीदा है. दो पक्ष हैं, दोनों के पास अपने तर्क हैं. कर्नल पुरोहित एक बदनसीब फौजी हैं, जो अपना काम करते हुए एक बड़ी साजिश के शिकार हुए हैं या फिर देश के सबसे इज़्ज़तदार संस्थान में दीमक लगने की मिसाल, ये 9 साल में सामने नहीं आया है और न ही उम्मीद की जा सकती है कि इसका पक्का जवाब जल्द ही मिलेगा.


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